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नदियों के साथ PDF Print E-mail
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Tuesday, 16 September 2014 11:40

जनसत्ता 16 सितंबर, 2014: सुभाष शर्मा ने ‘गूंगा: आस्था और आजीविका के दायरे’ (जनसत्ता रविवारी, 31 अगस्त) में  प्रदूषण के बढ़ते खतरों का जो व्यापक चित्रण किया है वह आंखें खोलने वाला है बशर्ते  विकास के मारे ‘आंख के अंधे नाम नयनसुख’ हमारे सत्ताधीशों की आंखें खोलने का कोई जतन संभव हो। दरअसल, यह मसला केवल गंगा तक सीमित नहीं है। जो बात गंगा के संदर्भ में कही गई है वह देश की सभी नदियों और जलाशयों पर लागू होती है। गंगा, यमुना, नर्मदा आदि नदियों को, इनके विशाल आकार और क्षेत्रफल के कारण जो महत्त्व और धार्मिक पवित्रता का दर्जा दिया गया है वही अन्य नदियों और जलाशयों को देने की जरूरत क्यों नहीं है? इन नदियों के संबंध में कहा जा सकता है कि जितनी बड़ी नदी, उतना ही उसका धार्मिक महत्त्व और धार्मिक उन्माद के कारण उसी अनुपात में उसकी दुर्दशा करने का लाइसेंस हमारे समाज को दैवीय कृपा से मिला है! 

एक ‘सिरफिरा’ विचार यह भी हो सकता है कि यदि गंगा सहित सभी नदियों को बचाना है तो उन्हें मैया मानना बंद कर व्यावहारिक धरातल पर समाज को इनके साथ शराफत का


सुलूक करना सीखना होगा और विकास की दिशा बदलनी होगी। आखिर ऐसा क्यों और कब तक संभव होना चाहिए कि हम धार्मिक कर्मकांडों से कचरा नदियों में फेंकते रहें और विकास के नाम पर जंगलों का विनाश करते रहें? साथ ही उद्योगों, अस्पतालों और शहरों-कस्बों का कचराघर भी इन्हें बनाते रहें और फिर भी ये हमारा कल्याण करती रहें?

श्याम बोहरे, बावड़ियाकलां, भोपाल


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