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तमिल राजनीति की रूढ़ियां PDF Print E-mail
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Tuesday, 16 September 2014 11:33

शंकर शरण

 जनसत्ता 16 सितंबर, 2014: लगभग पचास वर्ष पहले की बात है। वात्स्यायनजी (कवि अज्ञेय) कोट्रालम गए हुए थे।

तब प्रसिद्ध तमिल विद्वान और भाषाप्रेमी रामस्वामी नायकर (पेरियार) वहीं थे। अज्ञेय उनसे मिलना चाहते थे। अज्ञेय के एक मित्र पेरियार से पूछने गए, लेकिन उन्होंने यह कह कर मना कर दिया कि वे ‘किसी उत्तरी साम्राज्यवादी लेखक से मिलना नहीं चाहते।’ मित्र संकुचित होकर लौटे। तब इस पर अज्ञेय ने उनसे कुछ चर्चा की। वह आज भी सामयिक है, जब तमिलनाडु के दोनों प्रमुख दलों के सर्वोच्च नेताओं ने हिंदी और संस्कृत को उत्तर के साम्राज्यवाद का उपकरण मान कर विरोध जताया है। 

तब डॉ राधाकृष्णन देश के राष्ट्रपति थे। वित्तमंत्री कृष्णमाचारी भी तमिल थे। उस समय हाल तक विदेशमंत्री भी दक्षिण के कृष्ण मेनन थे। शिक्षामंत्री दक्षिण के न सही, लेकिन हिंदी समर्थक भी नहीं थे। इन सब हवाले से अज्ञेय ने पूछा, यह कैसा उत्तरी साम्राज्यवाद है जिसमें शासन शिखर पर प्रमुख नीति-नियंता दक्षिणी हों! तब मित्र ने कहा, कि बात सांस्कृतिक साम्राज्यवाद की है। तब अज्ञेय ने पूछा कि जिस आदि शंकराचार्य ने भारत दिग्विजय की, वे दक्षिण के थे। देश के सबसे उत्तरी तीर्थ बदरीनाथ पर दक्षिण का राज है। भारत का सबसे बड़ा सांस्कृतिक आंदोलन- भक्ति आंदोलन- दक्षिण से फैला। फिर वेदपाठी विद्वान जितने भी हैं, वे काशी के साथ-साथ कांची को भी उतना ही प्रमाण मानते हैं। विष्णु पुराण और भागवत पुराण, दोनों दक्षिण के हैं। तो भैया, यह उत्तर का साम्राज्य है कहां? पूर्वी क्षेत्र भी देखें, तो वे दक्षिण वाली भंगिमा ही रखते हैं, और किसी भी हाल में हिंदी के साथ तो नहीं ही हैं। 

मित्र से अज्ञेय ने भी वह पूछा था, जो अभी सुब्रह्मण्यम स्वामी ने करुणानिधि और जयललिता से पूछा है कि तमिल श्रेष्ठतावादी का नाम रामस्वामी नायकर कैसे हुआ, जब कि न ‘राम’ तमिल का है, न ‘स्वामी’, न ‘नायक’। दक्षिण के महानुभावों के ऐसे नाम तो आखिर किसी उत्तर वाले ने नहीं रखे। इन स्थितियों, तथ्यों आदि के मद््देनजर क्या वास्तविकता कुछ और नहीं हो सकती? 

यानी कि मामला किसी उत्तरी साम्राज्यवाद या हिंदी साम्राज्यवाद का न होकर, किसी बड़े भारी भ्रम का हो? स्पष्टत: तमिल राजनीति आज भी दशकों पुरानी रूढ़ियों से जकड़ी हुई है। विडंबना यह कि वे रूढ़ियां भी उनकी अपनी नहीं, न ही किसी प्राचीन या स्वदेशी तमिल परंपरा का अंग हैं। संस्कृत विद्वत्ता के दो सबसे बड़े केंद्रों में एक स्वयं तमिलनाडु में स्थित है। यह कोई आज की बात नहीं; सदियों से दक्षिण भारत संस्कृत का उत्कृष्ट ज्ञानपीठ रहा है। 

इससे साफ दिखता है कि संस्कृत का विरोध कोई ‘तमिल परंपरा’ नहीं है। मामूली खोजबीन से पता चलता है कि यह तो मात्र सौ साल पहले उपजी राजनीति है। इसके जनक मूलत: कोई तमिल विद्वान या नेता नहीं, बल्कि ईसाई मिशनरी थे। ऐतिहासिक दृष्टि से यह इतने हाल की घटना है जिसके सभी प्रमाण मौजूद हैं। इनकी पड़ताल मामूली अध्येता भी कर सकता है। यह पड़ताल कि तमिल भाषा, साहित्य और राजनीति को संस्कृत भाषा, भारत देश और हिंदू धर्म के विरुद्ध खड़ा करने का कार्य मिशनरियों और ब्रिटिश शासकों ने किया। जिसे ‘द्रविड़वाद’ कहते हैं, उसका पूरा ताना-बाना, यहां तक कि शब्दावली और मुहावरे भी मिशनरी लेखकों ने तैयार किए थे। 

किसी मूल तमिल स्रोत में संस्कृत, भारतीयता, या हिंदू धर्म का विरोध नहीं मिलता, जो पिछले कई दशकों से तमिल राजनीति का मूलाधार रहा है। साथ ही यह भी उतना ही अकाट्य है कि द्रविड़वाद का प्रत्येक तामझाम विविध ईसाई मिशनरी विद्वानों की पुस्तकों में है, कहीं और नहीं! इस सचाई की पूरी परख की जानी चाहिए और निकलने वाले निष्कर्षों को तमिल जन-गण समेत संपूर्ण भारतीय जनता को बताया जाना चाहिए।

यह इसलिए आवश्यक है कि द्रविड़वाद समेत हर प्रकार के अलगाववाद की वैचारिक जड़ें उन्हीं रूढ़ियों में हैं, जो ईसाइयत-विस्तार के खुले उद्देश्य से मिशनरियों ने तैयार की थीं। तत्कालीन ब्रिटिश शासकों ने ‘फूट डालो, राज करो’ की अपनी नीति के अंतर्गत उसे प्रचारित करने में सहयोग किया था। कहने का अर्थ यह नहीं कि सारे मिशनरी लेखक षड्यंत्रकारी थे, बल्कि यह कि अपने ईसाई विश्वासों (या अंधविश्वासों) के प्रचार के लिए उन्होंने परिश्रमपूर्वक संस्कृत, तमिल आदि भाषा-साहित्यों का अध्ययन किया, ताकि किसी न किसी प्रकार भारत को हिंदू धर्म के ‘अंधकार’ से मुक्त कर ईसाइयत के ‘प्रकाश’ में लाएं। यह उन्होंने स्वयं बारंबार दुहराया है कि भारत संबंधी उनके संपूर्ण शोध का लक्ष्य यही था। मैक्स मूलर जैसे गैर-मिशनरी विद्वानों ने भी यहां ईसाइयत-विस्तार को ही अपने विद्वत-कार्य का प्रमुख मकसद बताया था। 

इन प्रेरित रूढ़ियों की परीक्षा का कार्य आज तक तमिल राजनीतिकों, बुद्धिजीवियों ने क्यों नहीं किया? संभवत: उन्हें भी मार्क्सवादियों और जातिवादियों की तरह विभेदकारी राजनीति की सुविधा की आदत हो गई है। अगर वे मिशनरियों द्वारा तैयार द्रविड़वाद की नकली वैचारिकता छोड़ दें, तो नए सिरे से अपना आधार खड़ा करने का कोई मार्ग उन्हें नहीं सूझता। तब तमिलनाडु के प्रमुख दल हमारे कम्युनिस्टों से भिन्न नहीं, जिन्हें अपनी पिटी-पिटाई लीक छोड़ कर नया सोचने का मार्ग नहीं सूझता। 

द्रविड़वादी अलगाववाद की सच्चाई अच्छी तरह जानना जरूरी है। न केवल इसलिए कि यह निपट अज्ञान, अनुमान और मनगढ़ंत आधारों पर खड़ी की गई है, बल्कि इसलिए भी कि अंतरराष्ट्रीय मिशनरी शक्तियां आज भी उन विभेदकारी आधारों को नया-नया खाद-पानी देकर


बढ़ाने की कोशिश कर रही हैं। विदेशी पैसे से चलने वाले एनजीओ उद्योग का सबसे बड़ा हिस्सा ईसाई मिशनरी तंत्र ही है, यह तो स्वयं गृह मंत्रालय द्वारा दशकों से दी जाती रही सालाना सूचना से स्पष्ट है। 

ध्यान दें कि उस ईसाई संसाधन का एक प्रमुख कार्य अकादमिक, शैक्षिक परियोजनाएं हैं जो ‘दलित विमर्श’, ‘मानव अधिकार शिक्षण’, ‘एमपावरमेंट ऑफ मार्जिनलाइज्ड’, आदि नामों से हर तरह की विभाजनकारी राजनीति को हवा देती हैं, जिसका उद्देश्य आज भी वही है जो सौ साल पहले था। यानी हिंदू धर्म, भारतीय राष्ट्र को दुर्बल या खत्म करके ईसाइयत का राज-समाज कायम करना। चाहे यह भारत के टुकड़े-टुकड़े करके भी हो। दलितवाद, द्रविड़वाद, सेक्युलरवाद, माओवाद, अल्पसंख्यकवाद, आदि ऐसा कोई विभेदकारी आंदोलन या विचारधारा नहीं जिसके पीछे यहां मिशनरी समर्थन, संसाधन और सक्रियता न चल रही हो। क्या इस गंभीर सच्चाई या आरोप की परख नहीं होनी चाहिए?

उदाहरण के लिए, इस द्रविड़वादी अलगाव और विरोध को ही लें, जो संस्कृत, हिंदी से लेकर भारतीय राष्ट्र की एकता तक का विरोध करती रहती है। इसका मूल किसी मौलिक तमिल लेखक, विद्वान या शोध में नहीं है। तब किसने सबसे पहले यह कहा कि तमिल भाषा का संस्कृत से कोई संबंध नहीं? सबसे पहले किसने लिखा कि द्रविड़ अलग मानव-समुदाय हैं जो शेष भारतवासियों से अलग हैं? किसने आर्य-द्रविड़ विभेद की प्रस्थापना दी? सर्वप्रथम यह दावा किसने किया कि तमिल शैव-मत पर मूलत: ईसाई प्रभाव है? किस पुस्तक में सबसे पहले यह लिखा मिलता है कि दक्षिण का भक्ति-आंदोलन किसी वैष्णव नहीं, बल्कि बाइबिल के ‘सरमन आॅफ द माउंट’ से प्रेरित था? वह कौन था जिसने सबसे पहले दावा किया कि तमिल समाज की वर्तमान कमियां हिंदू संस्कृति और वैदिक मत का दुष्प्रभाव हैं? 

अंतत: यह किसका सुझाव था कि तमिल भाषा, संस्कृति, समाज को हिंदू, वैदिक, संस्कृत दुष्प्रभावों से ‘मुक्त’ करके ‘सभ्य धर्मों’ यानी ईसाइयत, इस्लाम के साथ मोर्चा बनाना चाहिए या उसमें विलीन हो जाना चाहिए? हम पाते हैं कि उपर्युक्त सभी बातें प्रसिद्ध ईसाई मिशनरी विद्वानों और तत्कालीन ब्रिटिश शासकों के लेखन में ही मिलती हैं। 

फ्रांसिस एलिस, एलेक्जेंडर कैंपबेल, बिशप रॉबर्ट काल्डवेल, रेवरेंड जॉन स्टीवेंसन, ब्रायन हॉजसन और जॉर्ज उग्लो पोप कुछ प्रमुख नाम हैं जिनकी रचनाओं में ऊपर रखे गए सभी प्रश्नों का सविस्तार उत्तर मिलता है। उन्हें कितना महत्त्व मिला, यह इससे भी दिख सकता है कि चेन्नई के सबसे महत्त्वपूर्ण पर्यटक स्थल मरीना समुद्रतट पर जिन दो विभूतियों के शानदार मूर्ति-स्तंभ लगे हैं वे बिशप काल्डवेल और जॉर्ज पोप हैं। किस सेवा के लिए द्रविड़ राजनीति करने वालों ने उन्हें इतना सम्मानित स्थान दिया? 

दुखद उत्तर है कि तमिलों को शेष भारत से अलग, श्रेष्ठ मानने की मानसिकता उन्हीं पादरियों की देन है, जिसके कारण आज भी तमिल नेतागण संस्कृत, हिंदी और भारतीयता का विरोध करते रहे हैं। क्या यह हैरत की बात नहीं कि स्वतंत्र होने के सात दशक बाद भी तमिल नेता उन मिशनरियों को ही अपना मार्गदर्शक माने हुए हैं, जिन्होंने ईसाइयत-विस्तार का अपना लक्ष्य कभी नहीं छिपाया? 

तमिल राजनीति पुरानी, झूठी रूढ़ियों में जकड़ी हुई है। उस पर श्रेष्ठता की, अलगाव की, संस्कृत-हिंदी के विरोध की भावना औपनिवेशिक-मिशनरी सत्ताधारियों की देन है। किसी अपने विद्वान या मार्गदर्शक ने उन्हें यह मिथ्या विचारधारा नहीं दी है। सर्वाधिक लोकप्रिय और सम्मानित तमिल ग्रंथ थिरुकुरल (संक्षेप में कुरल) का मूल दर्शन रामायण और महाभारत से तनिक भिन्न नहीं है। पारंपरिक तमिल संतों ने वही गीत गाए हैं जो तुलसी, मीरा और कबीर में भी यथावत मिलते हैं। आज भी तमिलनाडु में ही सर्वाधिक संख्या में, अट््ठाईस हजार, शिव-मंदिर हैं, जिनमें सैकड़ों वर्षों से वही अभ्यर्थना होती है जो कश्मीर से कन्याकुमारी तक हरेक शिवालय में की जाती है। शंकराचार्य, थिरुवल्लूवर, नारायण गुरु, रमण महर्षि या सुब्रह्मण्यम भारती- किसी की शिक्षाओं में उन वैदिक ऋचाओं से दूरी नहीं मिलती, जिनसे संपूर्ण भारत अनुप्राणित होता रहा है। समय की मार और विदेशी आक्रमणों के कुठाराघात से वे शिक्षाएं समय-समय पर दुर्बल जरूर हुर्इं लेकिन उनका प्रभाव कभी खत्म नहीं हुआ। 

अब तमिल राजनीति को अपनी रूढ़ियों की समीक्षा करने का साहस दिखाना चाहिए। तभी उसे अपनी जनता का सच्चा नेतृत्व करने का अधिकार मिल सकता है। मिथ्या और जड़ धारणाओं पर आधारित राजनीति सदैव नहीं चलती रह सकेगी। तैश और अंध-विरोध नकारात्मक राजनीति के लक्षण हैं जो आज नहीं तो कल अपना मूल्य खो देंगे। वैसे भी, अगर तमिल भाषा का मान-सम्मान बचाना है तो उसे खतरा अंगरेजी से है, संस्कृत या हिंदी से नहीं, जो उसके अपने हैं। इस सच्चाई को तमिल जनता समझने भी लगी है। क्या उसके मार्गदर्शक नहीं समझ सकते?


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