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दक्षिणावर्त: जन मन का धन PDF Print E-mail
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Monday, 15 September 2014 17:39

तरुण विजय

जनसत्ता 14 सितंबर, 2014: येसे दरजे थोंगशी अरुणाचल प्रदेश के लेखक हैं। वहां की मूल संस्कृति, सामाजिक चेतना और प्रकृति उपासना में रत लाखों अरुणाचलवासियों को बचाने के लिए दिल्ली में मंत्रियों से मिलने का समय मांगते रहे। उनके साथ अरुणाचल की मूल आस्था और संस्कृति समिति के वरिष्ठ नेता गिचिक ताझा भी थे। थोंगशी अरुणाचल प्रदेश में वरिष्ठ अधिकारी और सचिव भी रह चुके हैं। कई उपन्यास लिखे हैं, जिनमें से दो का अनुवाद वाणी प्रकाशन ने छापा है, यह आश्चर्य की बात है। अरुणाचल हो या पूर्वांचल के किसी भी हिस्से का व्यक्ति। वह पढ़ा-लिखा होगा यह माना जा सकता है, लेकिन उसकी किसी कृति का हिंदी में प्रकाशन, असमिया या बांग्ला के अलावा, कम ही देखा-सुना जाता है। 

थोंगशी का एक उपन्यास है सोनम, जो हिंदी में छपा और दूसरा है शव काटने वाला आदमी। बड़ा भयानक शीर्षक है। मंत्रियों से बड़ी मुश्किल से भेंट के बाद अपनी ये दोनों पुस्तकें देने घर आए, तो मैंने यही पूछा कि इतना कठोर शीर्षक क्यों रखा? बोले 1962 के समय की कथा है, आसान कैसे हो सकता था। 

अरुणाचल में अब कुछ भी आसान नहीं है। उनका धर्म, आस्था, संस्कृति, परंपरा, लोक इतिहास और कथाएं ईसाइयत के तीव्र प्रवाह में दब रही है, बदल रही है, जमीन गांव और मानस से पुस्तकों में बंद हो रही हैं। कोई उनकी सुनेगा नहीं। पार्टी कोई भी हो- हम सब अपने-अपने विनाश और लुप्त होते जाने के वृत्तांत लिखने में सिद्धहस्त हो गए हैं। अगर इन परंपराओं की मूल सुगंध बचाने के लिए कुछ कहा जाए तो आक्रामक उदारवादी कहते हैं कि हिंदूकरण किया जा रहा है। हिंदुस्तान में हिंदूकरण से बढ़ कर अपराध और कुछ हो नहीं सकता। हम लोग मिमिया कर या अर्थहीन मोहल्ला स्तर की बहादुरी दिखा कर रजाई ओढ़ लेते हैं। फिर एक किताब छाप देंगे, जो पुस्तकालयों को कमीशन देकर बेच दी जाएगी, पढ़ने-पढ़ाने के काम शायद कम ही आएगी। सेक्युलर उदारवाद और अनुशासित बहुलतावाद का संवैधानिक सहमति जताते हुए पक्ष सिर्फ एक ही है कि जनजातियों में डच, जर्मन, स्वीडिश, ब्रिटिश और खासतौर पर अमेरिकी वैप्टिस्टों का अपार धन निर्बाध आता रहे। 

अब अरुणाचल के अनेक पूर्व मुख्यमंत्री (एक भी भाजपा से नहीं), लेखक वरिष्ठ अधिकारी दिल्ली से एक ही बात पूछते हैं कि क्या उन्हें अपनी आस्था और उपासना-पद्धति बचाने का अधिकार है? उनके यहां डोनी पोलो संप्रदाय, रंगफ्रा, नानीइंटा पंथ, अमिकमाटा पंथ जैसे सैकड़ों मत हैं। आपस में कभी द्वंद्व हुआ, न झगड़ा। दिल्ली या उत्तर भारत कभी इस बात में दिलचस्पी ही नहीं लेते रहे कि इनके मंदिर, उपासना घर या नामघर कैसे होते हैं, इनका देवपूजन कैसे संपन्न होता है, इनकी आस्था के आधार और उपासना संसार क्या है। कभी उनको आदर और सम्मान के साथ लिपिबद्ध कर श्रद्धा और विश्वास बचाते हुए किसी को बताने-पढ़ाने या समझाने की जरूरत महसूस नहीं की गई। 

संभवत: देश की राजनीति में पैसे का सबसे ज्यादा विद्रूप और वीभत्स चलन अगर कहीं है तो पूर्वांचल के इन्हीं राज्यों में देखने को मिलता है। इसके प्रति भी कभी चिंता व्यक्त नहीं की गई। मान लिया जाता है कि ये तो बस ऐसे हैं। चुनाव जीतने के लिए गांव के हर नौजवान को हीरो होंडा की मोटर बाइक और बड़े लोगों को मारुति जिप्सी या होंडा तक बांटना, चुनाव से पहले के दिनों में पूर्वोत्तर के कार विक्रेताओं की बिक्री के आश्चर्यजनक आंकड़ों से समझा जा सकता है। 

तेजू, पापूमपारें, तवांग, वॉलोंग, चुमाथांग जैसे इलाकों से डिब्रूगढ़, गुवाहाटी होते हुए दिल्ली आने का अर्थ यहां मंत्रालय में बैठे अफसर, मंत्री उनके सहायक या सड़कों पर चल रहे वे लोग, जिनसे कभी-कभी अरुणाचल जैसे इलाकों से आने वाले रास्ता पूछ लेते हैं, समझ पाते हैं, यह कहना कठिन है। अरुणाचल के हर गांव में हिंदी बोली जाती है। सब जगह जयहिंद चलता है- नमस्ते से भी ज्यादा। लेकिन उनकी हिंदी का उच्चारण अरुणाचल के हिसाब से होता है। कई


बार समझने के लिए प्रयास करना पड़ता है। उनके नाम यहां के भारतीय महानुभाव कम समझते हैं। दलालों और संपर्क सूत्रों से भरी काम-काज कराने और सुविधाएं जुटाने वाले राजनीतिक कार्यकर्ताओं की संवेदनहीन राजधानी में अक्सर इनका तिरस्कार भी होता है। पर फर्क क्या पड़ता है?  कितने वोट हैं, कितनी लोकसभा सीटें? साउथ पर जोर दो, रणनीति के हिसाब से इंपॉर्टेंट है या कऊबेल्ट के बनिया, ठाकुर, अनुसूचित जाति वाले हिस्सों को राजनीतिक पकड़ में लो। नॉर्थ ईस्ट का मामला थोड़ा-बहुत फाइल-वाइल घुमा कर सुलटाया जा सकता है। 

घर के छज्जे और कंगूरे जब कमजोर होकर दरदराने लगें, तो बैठक में उसकी कंपकंपाहट सुनाई देनी चाहिए। अरुणाचल, मणिपुर, त्रिपुरा, नगालैंड जैसे इलाकों में दिल्ली के बड़े लोगों को जाने का वक्त मिलता नहीं है। तावाहारे या येसे दरजे थोंगशी के धीरे-धीरे अपनी पीढ़ी खत्म होते जाने की वेदना किसे समझ में आएगी? यह कहना अपराध हो गया है कि हमें विदेशी धन और विदेशी मन लेकर आ रहे आक्रामक परावर्तन वादियों से बचाया जाए। पिछले दिनों उन्हें गृहमंत्री से मिलने का मौका मिला। गृह राज्य मंत्री तो अरुणाचल से हैं। 

अरुणाचल के बौद्ध परेशान हैं। उन्हें कौन रक्षा कवच देगा। वहां जनजातियों का लाभ देने के साथ अल्पसंख्यक होने का लाभ भी उन्हें मिल रहा है, जो अपना मत या आस्था बदल रहे हैं। वे पूछते हैं कि क्या दोहरा लाभ संविधान के अंतर्गत है? अब सरकार भी मूल आस्थावादियों के नौजवानों को धर्म परिवर्तन करने के लिए प्रोत्साहन दे रही है। जब तक तुम अपनी आस्था पर कायम रहोगे, तो केवल जनजातीय के रूप में इकहरा लाभ मिलेगा। जब आस्था बदल लोगे तो भारत के संविधान का दुरुपयोग करते हुए दोहरा लाभ मिलेगा। विदेश जाकर पढ़ाई का मौका मिलेगा। 

सिर्फ इतना नहीं हो रहा है, सैकड़ों वर्षों से अरुणाचल की जनजातियां परशुराम कुंड, जो लोहित यानी ब्रह्मपुत्र के किनारे ही है, नए जल विद्युत बांधों से समाप्त किया जा रहा है। इतने अधिक बांध और जल विद्युत परियोजनाएं परशुराम कुंड के आठ सौ मीटर से दो किलोमीटर की परिधि में स्वीकृत कर दी गई हैं कि परशुराम कुंड समाप्त हो जाए। वहां की पवित्रता और पर्यावरण के प्रति किसी की दिलचस्पी नहीं है। वहां की जनजातियां दिल्ली आ नहीं सकतीं। उनकी इ-मेल और चिट्ठियों का दिल्ली से जवाब तक नहीं दिया जाता। ईटानगर में सरकार इस बारे में दिलचस्पी ले भी क्यों। तमाम स्वीकृतियों के पीछे तो उसी का मन है। 

आस्था पर आक्रमण है। पर्यावरण, जमीन और जंगल पर हमला है। भाषा, भूषा, परंपरा और मूल चेतना अरक्षित हैं। केवल राजनीति जिंदा है। इस राजनीति के दायरे में वे सब नहीं आते, जिनके समाप्त होने से सरकार के चलने या न चलने पर फर्क ही नहीं पड़ता। अरुणाचल के थोंगशी उपन्यास लिखते रहेंगे। दिल्ली में शायद कोई उस उपन्यास की समीक्षा भी न छापे या छापे भी तो बुझे हुए, अहसान जताते हुए भाव से- तुम नॉर्थ ईस्ट वालों के लिए हमने भी कुछ कर दिया। लेकिन इस इलाके में हिंदुस्तान की रक्षा सिर्फ वायुसेना के नए हवाई अड्डे या सीमा तक अब बनाई जा रही सड़कों से नहीं की जा सकती। जन मन का धन नहीं बचेगा तो बचेगा क्या? 


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