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संवाद: भाषा की जमीन PDF Print E-mail
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Monday, 15 September 2014 17:32

लक्ष्मीधर मालवीय

जनसत्ता 14 सितंबर, 2014: कुलदीप कुमार के स्तंभ में ‘हिंदी बनाम उर्दू’ (7 सितंबर) पढ़ने तक मुझे यह जानकारी न थी कि सन् 74 में जेएनयू में हिंदी उर्दू विद्यार्थियों के लिए ये दोनों भाषाएं सीखना अनिवार्य कर दिया गया था। इसका उद्देश्य क्या था पता नहीं, पर मेरा अनुमान है कि यह प्रस्ताव लागू न किया गया होगा। जापान में हिंदी सीखने वाले छात्रों को उर्दू वर्णमाला का अभ्यास कराया जाता है ताकि वे प्लाट्स और फेलन के कोशों का फायदा उठा सकें। हिंदी शब्दकोशों पर कैसे भरोसा किया जाए जबकि, हिंदी के सारे शब्दकोश खोल कर देख डालें, वहां तो नागरी की बारहखड़ी लड़खड़ा और भहरा रही है- ‘अ’ के बाद ‘आ’ नहीं ‘अं’ कूद पड़ता है! 

हिंदी बनाम उर्दू जैसे प्रसंगों में मेरे मन में सदा यह संदेह पैदा होता है कि हमारे देश में भाषा और मातृभाषा में सचमुच क्या कोई तात्त्विक और व्यावहारिक भेद नहीं है? 

पूर्वी उत्तर प्रदेश के पडरौना निवासी मुन्ना खां ने अपनी मातृभाषा उर्दू दर्ज कराई है तो इसका कारण मेरी समझ में यह आता है कि- एक, वह मुसलमान हैं और दो, कि वह पढ़े-लिखे हैं और लिखते-पढ़ते हैं उर्दू लिपि में। वास्तव में उनकी मातृभाषा भोजपुरी है। उनके पड़ोसी मुन्ना लाल ने अपनी मातृभाषा हिंदी लिखाई है तो ऊपर की वजहों में अंतर हिंदू और नागरी लिपि का है। 

नहीं, ये दोनों- मुन्ना लाल और मुन्ना खां साकिन हैं झांसी के और अपनी मातृभाषा क्रमश: हिंदी उर्दू लिखा रहे हैं तो यह गलत बयानी है- दोनों ही बुंदेली बोलते हैं, बुंदेली उनकी मातृभाषा है। यहां तक कि दोनों अकोला, महाराष्ट्र, में जा बसें तो उनकी मातृभाषा वहीं की बोली होगी जहां से ये उठ कर आए हैं- वह पडरौना हो कि ललितपुर कि उन्नाव। फिर इन दो अकोला वासियों के लिए मराठी का दरजा क्या होगा? मराठी भाषा इनके लिए उपकरण है, तर्जुमाकार- वैसे ही जैसे कलछी उपकरण है, बटलोई से दाल या रसा निकाल कर परसन्े का। (चाकू कांटा हो कि जापानी सलाइयां, भोजन करते समय इनके किसी काम की न होंगी!) 

मोन्ना मोशाय के सामने बांग्ला छोड़ भाषा का कोई दूसरा नाम है ही नहीं- वह चिटगांव के हों कि बर्दवान के। यही बात मोन्नामा की तमिल पर लागू होती है। थोड़ा-बहुत बारीक भेद भले ही हो, घर-बाहर उसी भाषा का चलन है, जो उनकी मातृभाषा भी है। यों कहें कि मुन्ना द्वय से मातृभाषा और भाषा में भेद पहचानने में चूक हुई। 

हरियाणवी बोलने वाले बालमुकुंद गुप्त की डलमऊ उन्नाव के बैसवाड़ीभाषी महावीर प्रसाद द्विवेदी से जब इतनी गर्मागर्मी हो गई, तब कल्पना करें, झांसी वाले मुन्ना पडरौना के मुन्ना से आपसी हाथापाई से बचने के लिए किस बोली में बोलें! 

सैकड़ों बरसों से राजधानी बने रहे नगर दिल्ली के पड़ोस में होने के सबब मेरठ अलीगढ़ के छोटे से इलाके की बोली को इसी उद्देश्य से काट-तराश कर खड़ी बोली के रूप में गढ़ा गया। इस गढ़ंत रूप का एक नमूना गिलक्रिस्ट की ‘हिंदी स्टोरी टेलर’ (1806) में देखें- 

ऐक औरत बेवकूफ अपने फूहड़पने से चलते हुए गिर गिर पड़ती- और अपनी नजाकत पर बहान: करती- किसूने दरयाफ्त किया कि यिह आपसे गिरती है- और नजाकत को बदनाम करती है- हंस कर कहने लगा सच है नाच न जाने आंगन टेढ़ा 

यह जबान हिंदू के लिए है और न मुसलमान के लिए- यह भाषा ‘हिंदी’ अब के उत्तर भारत में कहीं के भी निवासी से, जिनकी मातृभाषा भोजपुरी से लेकर बीकानेरी तक कोई भी बोली हो सकती है, कंपनी के अंगरेज साहब बहादुर के लिए तर्जुमा करने के लिए गढ़ी गई थी। इसका प्रकट प्रमाण है कि एक बंगाली बांग्ला बोल कर अपना मंतव्य पठान तक नहीं पहुंचा पाता, मगर वह भले ही टूटी-फूटी ‘हिंदी’ में बोले, उसकी कही हुई बात का आधे से अधिक हिस्सा पश्तो बोलने वाला पठान समझ जाएगा। इसी प्रकार तमिल बोल कर एक कश्मीरी को बात नहीं समझाई जा सकती, ‘हिंदी’ दोनों के बीच संवाद करा देती है। अगर एक मथुरा वासी, एक मंगलूर का, एक अरुणाचल का, ये तीन इकट्ठा बैठ कर बातें करना चाहें तो उनके वार्तालाप बखूबी करा देगी ‘हिंदी’! उनकी मंडली में एक नेपाली के आ मिलने से भी बात वही रहेगी! 

वह गढ़ी जाती हुई खुरदुरी दुभाषिया ‘हिंदी’ पहाड़ी नदी में ढुलकते-बहते रोड़ों की भांति गोल और चिकनी होती जा रही थी, इसके नमूने 1850 के आसपास छपी पुस्तकों में देखने को मिल जाते हैं। सन् 1900 के इधर-उधर ‘सरस्वती’ ‘भारत मित्र’ वह कहां से कहां पहुंच गई! (‘‘हम वही भाषा लिखते हैं, जो हम बोलते हैं’’- बालमुकुंद गुप्त) 

हिंदी एक तो तितलौकी, फिर चढ़ी नीम!


कैसे चढ़ी नीम का खुलासा करते थोड़ा संकोच होता है, क्योंकि मेरे अपने गुरु तथा गुरुस्थानीय जनों के नाम भी साथ ही जाहिर होते हैं। 

बनारस विश्वविद्यालय में हिंदी विभाग खुला, सन् 1921 में। (अब से महज छह बरस बाद वहां आयोजित शताब्दी समारोह की मन गुदगुदाने वाली कल्पना तो कीजिए!) बाबू श्यामसुंदर दास विभाग के अध्यक्ष। ‘हिंदी साहित्य कोश’ (प्रकाशक ज्ञानमंडल) भाग दो, पेज 569 पर आपके द्वारा रचे गए ग्रंथों की सूची छपी है- इसमें ‘पाठ्यपुस्तकें’ के आगे तीस से ऊपर पुस्तकें हैं! (मैंने कुल ग्रंथों की संख्या जानने के लिए गिनना शुरू किया, मगर बीच में हिम्मत छूट गई!) हिंदी में हर विषय पर प्रकाशित साहित्य, पुस्तक, पत्र, पत्रिका के रूप में सन् 21 में मौजूद था तो! नहीं, इस बाजारू माल को विश्वविद्यालय स्तरीय नहीं माना जा सकता! विश्वविद्यालय में वही पुस्तक मान्य हो सकती है, जिसे विश्वविद्यालय तक शिक्षा प्राप्त और इसके भी ऊपर विश्वविद्यालय में पदासीन अध्यापक ने लिखा हो! इसका सबूत चाहिए? राहुलजी और किशोरीदास वाजपेयी के नाम याद करिए! 

मेरे गुरु श्री धीरेंद्र वर्मा ने सन् 1921 में इलाहाबाद युनिवर्सिटी से एमए किया था, संस्कृत में। महामहोपाध्याय सर डॉ. गंगानाथ झा के शिष्य थे। गंगानाथजी युनिवर्सिटी के वाइस चांसलर, तब सीनेट में तूती बोलती थी, डॉ. ताराचंद, डॉ. ईश्वरी प्रसाद, डॉ. गणेश प्रसाद- पूरा दल-बल था इनका! धीरेंद्रजी ने दल-बल के साथ गंगानाथजी से लड़-झगड़ कर (जी हां, लड़-झगड़ कर) अलग हिंदी विभाग खुलवाया। जो कार्य बनारस में दासजी ने किया था, उसी के जोड़ का काम धीरेंद्रजी ने शोध परंपरा कायम करने- और अपने शिष्य, प्रशिष्य की लंबी पांत खड़ी कर देने में किया! सन् साठ में मैं वहां लेक्चरर था, तब डॉ. धीरेंद्र वर्माजी अध्यक्ष थे, और उनसे दोयम डॉ माताप्रसाद गुप्त से लेकर मुझ तक, सब धीरेंद्र वर्माजी के और एक से दूसरे से तीसरे के पढ़ाए हुए प्राध्यापक थे! इसमें आपत्तिजनक तो कुछ भी नहीं! सारे उत्तर भारत (और नीचे भी!) डंका बजता था विश्वविद्यालयी हिंदी का! 

भाषा- मातृभाषा भी- प्रकृत्या अनुकरण मूलक, नकलची होती है! यही विभागी हिंदी आकाशवाणी बनी, दफ्तरों में हिंदी अफसर बनी, संपादकों की व्यास पीठ पर विराजी, टीवी पर वेदपाठियों के सामान हस्त संचालन करती लंगर बन कर खड़ी हुई- आज भी यह क्रम चल रहा है और भविष्य में भी चलता रहेगा। ‘नल की औ नलनीर की एकै सी गति होय!’ निरंतर अधोगति पाती भई अब तो विश्वविद्यालयी हिंदी ‘जमीनी हकीकत’ से टेक आॅफ कर, अर्थ- अर्थात मायने- के दायरे से बाहर निकल गई! लिखे हुए का अर्थ या तो स्वयं उसका लेखक समझे या खुदा समझे! 

यह हश्र है सारे संसार में बेजोड़ और अनोखी ऐसी अमरबेल सम भाषा का जिसने अपना व्याकरण संस्कृत तक को ठेंगा दिखाते हुए, केवल श्रुत के सहारे तैयार किया था! इसके प्रयोक्ता हम यदि कर्मदरिद्री न हुए होते तो आज के दिन यह चार ठौर मजूरी करते हुए भी तमाम बोलियों की अर्थ गौरव से संपन्न शब्द संपदा को बटोरती समेटती हुई, अंगरेजी और चीनी भाषाओं को पीछे छोड़ गई होती! 

उर्दू को भी उचित स्थान दिया जाए- भला क्यों नहीं! हिंदी के साथ-साथ- जी नहीं! मुझे क्षमा करें, आप फिर वही भूल कर रहे हैं! भाषा और लिपि में घालमेल कर। मेरे मन तो कुछ और ही है! विश्वविद्यालय स्तर के हिंदी प्राध्यापक को उर्दू क्या, फारसी भाषा में भी दक्ष होना चाहिए। हरिऔध, चंद्रबली पांडेय, काशिकेय शिवप्रसाद मिश्र ‘रुद्र’, हिंदी के ये प्रतिष्ठित लेखक संस्कृत, फारसी, अरबी के पारदर्शी विद्वान तेहरान युनिवर्सिटी के स्नातक न थे! और नहीं तो वासुदेवशरण अग्रवालजी की पदमावत पर टीका के एकाध पन्ने उलट-पलट कर देख लीजिए। जापान में उर्दू के एक प्राध्यापक ने मुझ हिंदी वाले से सही उत्तर पाने की उम्मीद रखते हुए पूछा था कि ‘दाग़’ संस्कृत मूल का शब्द होकर भी फारसी में ‘ग़ैन’ से क्यों लिखा जाता है! 


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