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प्रसंग: क्रांति के कपड़े PDF Print E-mail
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Monday, 15 September 2014 17:26

अर्चना वर्मा

जनसत्ता 14 सितंबर, 2014: अंतरराष्ट्रीय व्यापार मेला-2007 के समय ‘हिंदुस्तान टाइम्स’ में एक रिपोर्ट प्रकाशित हुई थी, जिसमें अठारह दिसंबर, दो हजार पांच के ‘हिंदुस्तान टाइम्स’ की रिपोर्ट को उद्धृत करते हुए बताया गया था कि सन दो हजार तीन के मेले में सेल्स-गर्ल की स्कर्ट की लंबाई अठारह इंच और दैनिक भुगतान पंद्रह सौ रुपए था, जो दो हजार पांच में बढ़ कर दो हजार रुपए हो गया था। उस समय, 2007 में, चालू मेले में स्कर्ट की लंबाई बारह इंच और दैनिक भुगतान तीन हजार रुपए था। लेकिन यह भुगतान सबके लिए समान दर से होने वाला नहीं था। 

मेले के दौरान दिल्ली शहर के युवा छात्र-छात्राएं वहां अस्थायी रोजगार के तौर पर जेबखर्च कमाने के लिए ‘सेल्स बॉयज’ और ‘सेल्स गर्ल्स’ की हैसियत से काम कर लिया करते हैं। भुगतान की दर अलग-अलग किस्म की दुकानों पर अलग-अलग किस्म के ड्रेस कोड के अनुसार तय हुआ करती है। घरेलू उपयोग का साजो-सामान बेचने वाली दुकान पर साड़ी या सलवार-कमीज में उपस्थित विक्रय-परिचारिका का वेतन उस रिपोर्ट के अनुसार तब तीन सौ रुपए प्रतिदिन था और ‘इलेक्ट्रॉनिक गुड्स’ की दुकान पर ‘मिनी स्कर्ट’ में आपका स्वागत करने वाली ‘सेल्सगर्ल’ तब दिन भर की मेहनत के बदले तीन हजार रुपए पाती थी। जाहिर है कि वहां पर खरीद में सामान के साथ सुंदर, सुडौल, अनावृत्त टांगों का दर्शन अतिरिक्त पाया जाता रहा होगा और कुछ न भी खरीदना हो तो दुकान तक जाने का एक आकर्षण तो रहता ही होगा। चले ही गए होंगे लोग तो क्या पता कुछ खरीद भी लाए होंगे। बहेलिए तो लासा लगा कर जाल फैलाते ही हैं। 

तब से अब तक सात या आठ बरस और बीत गए हैं। तब से अब तक में हमारी रिहाइशी दुनिया की सूरत ही एक लंबे लगातार मेले में बदल चुकी है और उसके अनुरूप समाज के एक वर्ग में हमारी जीवन पद्धति भी। उस वर्ग में अब हमें याद भी नहीं आता कि मेला रहने की नहीं, थोड़ी देर घूम कर लौट आने की जगह है। लेकिन लौट कर अब आएं कहां? मेले ने तो घर में भी घर कर लिया है। इस मेले की न कोई चौहद्दी, न चारदीवारी। लेकिन बेहतर है कि इस पैमाने के मेले में मौका है, हर एक के लिए। बेहतर है कि यह खेल का, ‘सेल’ का एक समतल मैदान है। उनके लिए यह मौका और मैदान कुछ और अधिक बेहतर और समतल है, जिनके पास बोलने के लिए अंगरेजी और दिखाने के लिए सुंदर, सुडौल, अनावृत्त टांगें मौजूद हैं। 

मुझे अहसास है कि मेरी ये टिप्पणियां हद दर्जे की ‘सेक्सिस्ट’ करार दी जाने वाली हैं। अहसास है इस बात का भी कि अपने बारे में खुले दिमाग का मेरा मुगालता भी बस चकनाचूर किए जाने को है, लेकिन फिर भी मैं पूछूंगी अपना सवाल कि आदमी ने कपड़ा आखिर बनाया ही क्यों? यह जवाब पुराना और अप्रासंगिक हो चुका है कि नग्नता उसके लिए असहनीय रूप से बदसूरत थी और सभ्यता की दिशा में पहला कदम उसने शरीर को ढंक कर बढ़ाया था। जी नहीं, इस अंतरराष्ट्रीय व्यापार मेले का जवाब शायद यह होगा कि वही एक उत्पाद था, जिसको सबसे पहले ‘मार्केट’ किया जा सकता था। सिर से पांव तक ढंकने की संस्कृति क्यों आई? क्योंकि कपड़ा बेचना था। कहां से आई? कपड़े का बाजार बढ़ाने की जरूरत से। अब क्यों गायब होती जा रही है? क्योंकि कपड़े के अलावा अब इतना बहुत कुछ है बेचने के लिए, जिसे बेचने में कपड़े कम से कम होकर ज्यादा से ज्यादा मददगार हैं। भूमंडलीय ग्राम के व्यापार मेले की दिशा में गंतव्य तक दौड़ के लिए देह सबसे सहज सवारी है। 

सच कहूं तो लड़कियों का अपनी देह में यह सहज, स्वच्छंद, निस्संकोच वास मन को मुग्ध करता है। भले अभी समाज के कुछ ही हिस्सों में व्याप्त हो, लेकिन है यह सचमुच क्रांति। लेकिन क्रांति क्या किसी खास


नाप या डिजाइन के ही कपड़े पहनती है तभी क्रांति कहलाती है? मामला जब ‘लाइफ स्टाइल’ और ‘स्टैंडर्ड आॅफ लिविंग’ का बना दिया जाए और ‘स्टैंडर्ड ऑफ लिविंग’ जब ‘क्वालिटी ऑफ लाइफ’ का स्थानापन्न बन जाए तब ऐसी भी परिणतियां होती हैं। ये वाक्यांश इसलिए अंगरेजी में दिए जा रहे हैं, क्योंकि उस वर्ग के ये प्रचलित मुहावरे हैं और हिंदी में अनूदित होकर अपनी आन-बान-शान खो बैठते हैं, तो बिल्कुल जरूरी नहीं रहता कि स्पगेट्टी स्ट्रैप, हेल्टर टॉप, बैकलेस ब्लाउज में पीठ, कंधे या वक्ष को खुला/ अधखुला छोड़ने वाला शरीर दिमाग से भी खुला हो। बल्कि शायद वह सहज-स्वच्छंद की ठीक उलटी दिशा में असहज-स्वच्छंद होने की कोशिश कर रहा हो। अनावश्यक ही आत्म-सजग। एक साथ विरोधी दिशाओं में दौड़ता हुआ। कोई देख तो नहीं रहा? कोई देख क्यों नहीं रहा? देख रहा है तो ऐसे क्यों देख रहा है? 

कैसे भूला जा सकता है कि हम किसी सामाजिक-सांस्कृतिक शून्य में नहीं रहते और हमारी स्वच्छंदता किसी शून्य में सक्रिय नहीं होती। समाज के अलग-अलग इलाकों में अलग-अलग संस्कृति के पास अपनी अलग-अलग आचरण संहिता या ‘कोड आॅफ कंडक्ट’ है। खेल के मैदान में सानिया मिर्जा के स्कर्ट की नाप को लेकर मचाया गया हल्ला गलत और बेकार था, क्योंकि स्कर्ट की वह नाप अन्य प्रतियोगियों के साथ उसकी प्रतिद्वंद्विता को अधिक समतल धरातल पर स्थापित करती है और खेल के संदर्भ-समाज में ‘कोड आॅफ कंडक्ट’ के अधीन है। 

जिस समुद्रतट पर पूरी की पूरी भीड़ स्विमिंग सूट में हो, वहां किसी का शरीर अलग से नहीं दिखता, न्यूड-फार्म पर किसी की नग्नता महसूस नहीं होती, अपने घर पर पार्टी की निजता में या पांच सितारा होटल में पार्टी की सामूहिकता में जो स्पगेट्टी स्ट्रैप, हेल्टर टॉप, बैकलेस ब्लाउज और उनमें खुले/ अधखुले पीठ, कंधे या वक्ष सहज होते हैं वे ही सड़क पर, कॉलेज में या मेट्रो और बस में आक्रामक हो उठते हैं। हर खंभे, हर दीवार, हर बिल-बोर्ड, हर संभव जगह पर टंगा और घूरता सौंदर्य और शृंगार पहले कभी इतना आक्रामक नहीं रहा होगा, जितना अब है। प्रतिक्रिया में प्रत्याक्रमण भी प्रत्याशित ही होगा। नहीं, इस बात की कोई गारंटी नहीं कि शरीर ढंका होगा तो बलात्कार से सुरक्षित भी होगा। वह असुरक्षा तो स्त्री-शरीर नाम के जन्मजात वस्त्र की है। मैं बात अपनी आजादी और क्रांति के चुनाव-चिह्न की कर रही हूं। 

किसी सामाजिक ‘कोड ऑफ कंडक्ट’ की बुनियाद में अन्याय निहित हो तो उसे ललकारने और बदलने की जरूरत होती है। लेकिन हम उसे कैसे चुनते हैं? हमारी प्राथमिकताएं क्या हैं? जब घूंघट उठाना ही विद्रोह हो तब इस ललकार की कीमत समझी जा सकती है। लेकिन घूंघट में कैद हो सीता, तो राधा कपड़े उतार कर सीता की आजादी का बिगुल नहीं बजा सकती। यह शायद पिछली सदी से आई एक औरत का पूर्वग्रह ही हो, लेकिन मुझे लगता है कि जब स्वच्छंदता का बोलबाला हो चुका हो तब स्वेच्छा से कुछ निषेधों का चुनाव उचित है। स्वेच्छा में स्वतंत्रता सुरक्षित है अन्यथा विधेयों की कीमत भी जाती रहती है और आखिरकार उस स्वच्छंदता की भी, जिसे हमारी पिछली पीढ़ी ने महंगे मोल कमाया और विरासत में हमें दिया। 


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