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पुस्तकायन: वैश्विक चिंता का वितान PDF Print E-mail
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Monday, 15 September 2014 17:20

ओम निश्चल

जनसत्ता 14 सितंबर, 2014: कविताओं में प्राय: प्रेम की पुलकित वसुंधरा का आख्यान रचने वाली पुष्पिता अवस्थी हिंदी की सुपरिचित कवयित्री हैं। उन्होंने प्रवास में रहते हुए भी भारतीय मन की संवेदना और वैश्विक चिंता की अनुभूतियों को खूबी से सिरजा है। वे सूरीनाम में रहीं तो सूरीनामी गंगा को काशी की गंगा सरीखा मान दिया। इन दिनों नीदरलैंड में रह रही हैं तो वहां की प्रेमपगी धरती को अपने भीतर रचा-बसा रखा है। विश्व के अनेक देशों में यायावरी करती हुई आखिरकार जिस चिंता और संवेदना के तहत वे रचती-बुनती हैं वह उनकी आत्मा की ही उपज है। उनकी कविताओं में स्त्री का अनुराग भरा चित्त प्रतिबिंबित होता है तो भारतीय विवृत्ति भी, जो समूची वसुधा को अपना नीड़ मानती आई है। शब्दों में रहती है वह संग्रह से पुष्पिता अवस्थी ने यह जताने की चेष्टा की है कि वे विश्व को अपनी कवि-आंखों से निरखती-परखती हुई धरती के सौंदर्य को अपनी कविताओं में अक्षुण्ण रूप में सहेज लेना चाहती हैं। 

दरअसल, भारतीयों के लिए जो विदेश है, पुष्पिता के लिए वह भी स्वदेश सरीखा है-आत्मीय और अपना। विदेश में भी अपनी पहचान रचने की प्रक्रिया में वे शब्दों में प्रवेश करती हैं। पूरी आत्मीयता के साथ उनका अपनापन कविताओं में धड़कता है। उनकी कविताओं की संरचना लालित्य के प्रत्ययों से निर्मित होती है और अक्सर किफायतसारी की हिमायती उनकी कविता के पीछे एक चुप्पी-सी छाई रहती है। लेकिन उनका मौन मुखर होता है। वे अपने अर्थ खुलने पर बोलती हैं- चुप-चुप-सी रहती हुई। वे अनायास ही नहीं कहतीं: ‘शक्तियां चुपचाप जन्म लेती हैं/ और अपनी चुप्पी में ही पैदा करती हैं- शक्ति।’ 

विश्वनाथ प्रसाद तिवारी ने प्रकृति को देवता का काव्य कहे जाने का उल्लेख करते हुए पुष्पिता की कविताओं में प्रकृति प्रेम की तसदीक की है। अपनी विश्व यायावरी के दौरान देश के कोने-अंतरों का भ्रमण करते हुए पुष्पिता ने प्रकृति को कहीं चित्रकार की तरह, कहीं लोकगायक की तरह, तो कहीं वहीं के बाशिंदे की तरह उसे उकेरा है। अपने शब्दों के अंकवार में समेटा है। मसलन, अमर इंडियन परिवारों के बारे में उनका एक कवितांश देखें: ‘सघन घन-बीच/ मछली-सी बिछलती तैरती/ जंगली मानसूनी बरसात पीकर जीवन जीती नदियों में/ अपने जीवन की कटिया डाले हुए जीती है वन जाति।’ 

ब्राजील के जंगलों का यह दृश्य है तो यूरोप के तीन देशों के संधिस्थल- इटली, फ्रांस और आस्ट्रिया- पर स्थित नाउदर्स गांव का चित्र उकेरती हुई वे लिखती हैं: ‘नाउदर्स के पेड़ों में/ फलों की तरह लदी रहती हैं चिड़ियां/ जो अपने नीड़ बनाती हैं- होटलों के गोखों और छत-ऊपर/ जंगल की प्रमुख नागरिक हैं मधुमक्खियां/ मौका पड़ते ही झपट लेती हैं पर्यटकों पर/ नाउदर्स निवासियों का गोपालन/ और होटल सेवा प्रमुख जीवन साधन।’ 

यहां कथा, कोमो झील, झील का अनहद नाद, स्नो बेल्स (बर्फ की घंटियां), नर्सेस (आत्मरति), ब्राजील की रियो नीग्रो जैसी प्रकृतिपरक गहरी संवेदनशील कविताएं हैं, तो त्रिनिदाद और टुबैगो, सेंट लूशिया और अंजोरे द्वीप पर कविताएं लिख कर उन्होंने अंतलांतिक महासागर और कैरीबियाई सागर के इन द्वीपसदृश उतराते द्वीपों का साक्षात प्रस्तुत कर दिया है। दरअसल, दो-तीन वर्ष पूर्व प्रकाशित संग्रह ‘शैल प्रतिमाओं से’ (डच-अंगरेजी-हिंदी) में प्रकाशित ‘पृथ्वी’ कविता में कवयित्री ने पृथ्वी को उस अकेली औरत के रूप में देखा है, जो जीने का दुख चुपचाप सह रही है। 

इधर पृथ्वी पर तरह-तरह के खतरे बढ़े हैं। ग्लोबल वार्मिंग, प्रदूषण, एक और महायुद्ध की तरफ बढ़ती हुई महाशक्तियां और जलसंकट। इस चिंता का वितान वैश्विक है, जिसमें प्रकृति और उसके सारे उपादान समाहित हैं। पृथ्वी, स्त्री, बच्चे पुष्पिता की प्रकृति के प्राणतत्त्व हैं। इसी में सृष्टि है, संवेदनाएं हैं, प्रेम, पीड़ा, हर्ष और विषाद है। सुख है, सुख के स्वप्न हैं। मन के शृंगार का रचाव है, आत्मा के आनंद का


व्याख्यान है। संग्रह में भ्रमण के परिभ्रमण का चाक्षुष आह्लाद है, जीवन और जगत की गूंज है, संवेदना की राग-रागिनियां हैं और उदासियां भी। शब्दों के प्रति आस्थावान कवयित्री शायद इन्हीं तत्त्वों से तादात्म्य महसूस करती है। 

प्रकृति से तादात्म्य के साथ-साथ पुष्पिता की कविताओं का जीवन और विश्व की वैचारिकता से संश्लिष्ट रिश्ता है। वे विभेदकारी और विभाजनमूलक विचारों को कौतुक से परखते हुए सृजन और निर्माण के लिए प्रतिश्रुत दिखाई देती है। उन्हें यह दुखद लगता है कि कोई हमेशा भीतर से छीनता रहता है, इंसान का अपनापन जो हमेशा उसका अपना घोंसला है। पुष्पिता अवस्थी ने इन कविताओं में विदेशी धरती के मानवीय प्रसंगों को पूरी संजीदगी से समेटा है। यहां अश्वेत शिशु के जन्म पर मां का संतोष है तो ‘पेट भरों की भूख’ में दुनिया की अमिट भूख का एक लोमहर्षक जायजा भी। 

पुष्पिता जगह-जगह भारतवंशियों की पीड़ा का आख्यान रचते हुए भूलती नहीं कि सूरीनाम और हालैंड जैसे देशों का नख-शिख भारतीय मजदूरों ने अपने श्रम और पसीने से संवारा है। एक ओर मकबूल फिदा हुसेन की चित्रकारी, तो दूसरी ओर जाकिर हुसैन का तबलावादन उनकी कविता में गूंजता है। यूरोप की साइकिल की महिमा का गान है, तो फुटबाल खेल की विरासत का वैभव भी। मां की लेगेसी है तो स्त्री का इंद्रधनुष भी भूमंडल के चतुर्दिक उनकी कविताओं के माध्यम से अनुभव होता है। गर्भ की उतरन में स्त्री होने की व्यथा दर्ज है। पाश्चात्य और दक्षिण एशियाई देशों के युवाओं के लिए उभर रही दासता-दबोच के तेवर हैं। ब्राजील की रियो नीग्रो नदी की श्यामाभा है, तो न्यूजीलैंड की माओरी जाति (अमर इंडियन) की धड़कती दास्तान है। प्रणयगर्भी कविताओं में उनके मन का ब्रह्मांड है। नवातुर गर्भिणी स्त्री के आह्लाद का अद्भुत उन्माद है। आल्पस संवाद कविता को पढ़ते हुए कोई भी पाठक स्वयं को आल्पस से संवाद करते हुए अनुभव कर सकता है। 

अपने अनुभव और संवेदना की आंखों से दुनिया को निहारते हुए कवयित्री अक्सर अपनी स्त्री-देह में लौटती और तब जो महसूस करती है वह दुनिया भर की स्त्रियों की चरितगाथा लगने लगती है। वे कहती हैं: ‘औरत की देह ही/ औरत का ताबूत है/ जिसे वह जान पाती है- उम्र ढलने के बाद/ जीवन भर एक ही यात्रा/ भौतिक ताबूत से दैहिक ताबूत तक।’ इसी तरह वे एक ग्रेवयार्ड से गुजरते हुए सोचती हैं: ‘चलती हुई कारों के उस पार/ मृतकों का ग्रेवयार्ड है/ और इस पार चलते और चलाते हुए मनुष्यों का जिंदा ग्रेवयार्ड।’ उन्होंने अब तक के प्रवास में कैरेबियाई धरती की संवेदना को गहराई से महसूस किया और औपनिवेशिक दासता के इतिहास को जैसे निकट से गुजरते हुए देखा है। कहना न होगा कि वे शब्दों की धातु को पहचानने वाली कवयित्री हैं और शब्दों की अक्षय देह में ही जैसे दुबक कर रहने में गहरे सुकून और संजीवनी का अनुभव करती हैं। 


शब्दों में रहती है वह: पुष्पिता अवस्थी; किताबघर प्रकाशन, 4855-56/24, दरियागंज, नई दिल्ली; 390 रुपए। 


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