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पुस्तकायन: आलोचना में अनुसंधान PDF Print E-mail
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Monday, 15 September 2014 17:19

अनंत विजय पालीवाल

जनसत्ता 14 सितंबर, 2014: आज की बाजारीकृत व्यवस्था में नएपन के नाम पर मनगढ़ंत लिखने की मानो होड़-सी लगी है। सर्वेक्षण और साक्ष्यों के जरिए साहित्य को समृद्ध करने वाली पुस्तकें कम ही नजर आती हैं। ऐसे में सत्यकेतु सांकृत की पुस्तक हिंदी कथा साहित्य: एक दृष्टि इस दिशा में संक्षिप्त, लेकिन मुकम्मल प्रयास है। 

इस पुस्तक का पहला अध्याय 1975 से लेकर 2000 तक के उपन्यासों के व्यापक फलक को समेटता है। इतने बड़े फलक को आलोचक ने जिस तरह बांधने का काम किया है, वह निश्चय ही बहुत मुश्किल भरा रहा होगा। इसके लिए उन्होंने तत्कालीन राजनीतिक, सामाजिक और आर्थिक परिस्थितियों को लगभग आठ पृष्ठों में बताया है। फिर इन बदलती परिस्थितियों में उपन्यासकारों का अपनी समकालीन प्रवृत्तियों के साथ सीधा साक्षात्कार पेश किया गया है। यह इसलिए भी जरूरी हो जाता है कि किसी रचना का सही मूल्यांकन उसे उसकी समकालीन प्रवृत्तियों के बरक्स रख कर ही किया जा सकता है। साहित्यिक दशा-दिशा प्रवृत्तियों के अनुरूप कैसे ढलती है, इससे सत्यकेतुजी भली-भांति परिचित हैं, इसलिए उन्होंने सर्वेक्षण के अलग-अलग ढांचों का बखूबी इस्तेमाल किया है। 

पुस्तक का दूसरा अध्याय माखनलाल चतुर्वेदी की गद्य भाषा पर है, जिसका आधार ‘साहित्य देवता’ को बनाया गया है। इसमें चतुर्वेदीजी की गद्य भाषा की पड़ताल के लिए सत्यकेतुजी ने भाषा और शैली के सभी उपकरणों का प्रयोग किया है। ध्वनिरूपक, शब्द रूपक, अर्थ रूपक और वाक्यात्मक शैली के सभी विभागों का खुलासा करते हुए एक-एक विभाग को उदाहरणों द्वारा स्पष्ट किया गया है। चतुर्वेदीजी की गद्य भाषा की लयात्मकता पर विशेष बल देते हुए वे इसे उनकी गद्य शैली की प्रमुख पहचान मानते हैं। भाषा की यह पड़ताल कितनी बारीक और शोधपरक है, इसका अनुमान पुस्तक की इस पंक्ति से ही लग जाता है कि ‘गणित की भाषा का प्रयोग करें तो उनके संज्ञा और विशेषण पदों का 56 प्रतिशत तत्सम, 32.5 प्रतिशत तद्भव और 11.5 प्रतिशत विदेशज होता है’। इसी प्रकार प्रत्यय, भाव निर्मिति, अलंकार, लय, ध्वनि, रीति, व्यक्ति वैशिष्ट्य, आवृत्ति, शब्द शक्ति, पर्याय वक्रता, पदोचित्य आदि शैलीय उपकरणों द्वारा चतुर्वेदीजी की गद्य भाषा का बारीक परीक्षण इस अध्याय में किया गया है। 

इसके बाद के नौ अध्यायों को मुख्यत: तीन भागों में बांट कर देखा जा सकता है। जिसके पहले भाग में साहित्यिक दृष्टि से एकदम अलग दो अध्याय हैं- ‘समय का यथार्थ परिसर जीवन और हिंदी उपन्यास’ और ‘शैक्षणिक परिसर का सुनामी’। विश्वविद्यालयी राजनीति और परिसर जीवन के यथार्थ को उद्घाटित करते ये दो अध्याय इस पुस्तक को भीड़ से अलग खड़ा कर देते हैं। विश्वविद्यालयी जीवन और उसके अपने समय के यथार्थ से टकराव को जिस भी उपन्यास ने दर्ज किया उसका खुलासा यह अध्याय अपनी मुक्त आलोचना के साथ करता है। यहीं सत्यकेतुजी उपन्यास विधा के प्रति अपना लगाव प्रकट करते हुए कहते हैं कि ‘जिंदगी में जो कुछ भी घटित होता है, वह चाहे कविता, नाटक या अन्य किसी साहित्यिक विधा की पकड़ से बच जाए, पर उपन्यास से बच निकलना संभव नहीं है। दरअसल, औपन्यासिक कलेवर ने तत्कालीन राजनीति के एक बड़े फलक को समेटते हुए लगभग हर समस्या से रूबरू होने की कोशिश की थी। फिर भी सत्यकेतुजी ने यह प्रमाण के साथ प्रस्तुत किया है कि परिसर जीवन की चर्चा सातवें दशक तक आनुषंगिक रूप में होती रही। प्रेमचंद के उपन्यासों तक में परिसर जीवन प्राय: गायब है, लेकिन यहीं सातवां दशक परिसर जीवन में विक्षोभकारी बदलाव लेकर आया और आठवें-नौवें दशक तक वह अपनी चरम तक पहुंच गया। 

इसी संदर्भ में आलोचक ने ‘राग दरबारी’, ‘अपना मोर्चा’, ‘कांच घर’, ‘गुरुकुल’, ‘परिशिष्ट’, ‘चक्रव्यूह’, ‘समर शेष है’, ‘दीक्षांत’, ‘कितने नीलकंठ’ आदि उपन्यासों में परिसर जीवन पर आलोचनात्मक दृष्टि डाली है। परिसर जीवन से संबंधित इन उपन्यासों में कितना यथार्थ है या कितना भोंडा-सपाट अंकन है या बाहरी पक्ष के साथ-साथ इसने पात्रों की मानसिकता में कितना प्रवेश किया है, इसका मूल्यांकन ये अध्याय प्रस्तुत करते हैं। दरअसल, यह मूल्यांकन आलोचक के अकादमिक अनुभव और आलोचनात्मक विवेक दोनों को दर्शाता है। 

दूसरा खंड प्रेमचंद के पूरे साहित्यिक संसार को तीन अध्यायों में बांटता है, जो एक संक्षिप्त लेकिन असरदार प्रयास है। ये अध्याय प्रेमचंद के


निबंध, अनुवाद, पत्रकारिता, नाटक, कहानी और उपन्यासों की रूपरेखा को भारतीय स्वाधीनता आंदोलन के एक ब्योरे के रूप में पेश करते हैं। वे प्रेमचंद के उस रूप को प्रतिस्थापित करने में भी सफल रहे हैं, जो राजनीतिक रूप से उतना ही प्रतिबद्ध रहा है जितना कि सामाजिक रूप से। वे प्रेमचंद के पात्रों के माध्यम से ही प्रेमचंद की उस मन:स्थिति को उद्घाटित करते हैं कि ‘यह अकर्मण्यता का समय नहीं है। इस समय तटस्थ बैठे रहना अपने देशवासियों पर घोर अत्याचार है।’ इतना ही नहीं आजादी की जंग पर केंद्रित तत्कालीन कहानियों का अतिरिक्त मूल्यांकन भी वे इसी के साथ करते हैं, जो इस तारतम्यता को कहीं अधिक यथार्थपरक बनाता है। 

पुस्तक का तीसरा खंड उपन्यास और कहानी के विकास की एक नई पड़ताल है, जिसमें मधुरेश की पुस्तक ‘हिंदी उपन्यास के विकास’ और ‘हिंदी कहानी के विकास’ पर दो समीक्षात्मक लेख हैं। यह लेख इस दृष्टि से भी उल्लेखनीय है कि यह इतिहास और विकास के फर्क को बाकायदा जानता और दर्ज करता है। इसी कारण आलोचक  को यह कहने में जरा भी झिझक नहीं है कि ‘ये पुस्तकें न ‘इतिहास’ हैं, न ‘विकास’।... ये ‘इतिहास’ लिखने और ‘विकास’ दिखाने वाले आलोचकों के लिए आधारभूत ग्रंथ बन सकती हैं।’ 

दरअसल, यह पुस्तक उपन्यास और कहानियों की उनके समसामयिक संदर्भों में एक विस्तृत पड़ताल है, जो रचना और रचनाकार दोनों को यथार्थ की तुला पर तौलती हुई आगे बढ़ती है। इन विधाओं के शिल्पगत परीक्षण से लेकर सामाजिक सरोकारों तक को जांचती है। पुस्तक का अंतिम पड़ाव भी जांच की इसी प्रक्रिया में ‘कहानी’ और ‘कथा’ के शिल्पगत मूलभूत अंतरों को दर्शाते हुए राहुल सांकृत्यायन और संजीव की कहानियों में सामयिक यथार्थ को जांचता चलता है। दरअसल, सत्यकेतु राहुलजी की कहानियों को जहां एक दृष्टि में उपन्यासों का ही लघु रूप मानते हैं, वहीं संजीव की कहानियों में उन्हें ‘कथा’ और ‘कहानी’ का घालमेल दिखाई पड़ता है। 

इस संदर्भ में वे लिखते हैं कि ‘कहानी में रचना के केंद्र में कोई एक संवेदना या भाव या अनुभूति का एक क्षण होता है। उसमें कथा का अंश नाममात्र का ही होता है।’ यहीं वे ‘कथा’ की संभावित विशेषताएं भी स्पष्ट करते हैं- मसलन, कौतूहल पैदा करने के लिए रहस्य सृष्टि, संयोगाधृत घटनाएं, रोमांच, रोमांस, नाटकीयता आदि। इन शिल्पगत द्वंद्वों के बावजूद वे अपने मूल्यांकन द्वारा सिद्ध करते हैं कि ‘वोल्गा से गंगा’, ‘बहुरंगी मधुपुरी’ और ‘सतमी के बच्चे’ राहुल सांकृत्यायन की समकालीन यथार्थ से संबद्ध मानवतावादी रचनाएं हैं। इसी प्रकार संजीव भी ‘समकालीन जीवन के अद्भुत चितेरे’ हैं। यह बात आलोचक ने संजीव की कहानियों में कहीं गहरे उतर कर कही है। संजीव की आदिवासी, नक्सलवादी, दलित संवेदना, अति पिछड़े और पूंजीवादी सभ्यता को आंख तरेरती कितनी ही रचनाओं को केंद्र में रख कर सत्यकेतुजी इस निष्कर्ष पर पहुंचते हैं कि ‘समाज की शायद ही कोई ऐसी समस्या हो, जिस पर संजीव की पैनी निगाह न पड़ी हो।’ 

कुल मिला कर पुस्तक अपने पंद्रह अध्यायों में इसी प्रकार के सर्वेक्षणों से गुजरती है। पुस्तक का हर अध्याय किसी लेख या निबंध से अधिक प्रस्तुत विषय पर एक गहन शोध-सा लगता है। शायद यही कारण है कि यह पुस्तक साहित्य की बारीक से बारीक सूचनाओं, तथ्यों और संवेदनाओं को मापती-तौलती चलती है। 


हिंदी कथा साहित्य- एक दृष्टि: सत्यकेतु सांकृत; राधाकृष्ण प्रकाशन, 7/31, अंसारी मार्ग, दरियागंज, नई दिल्ली; 350 रुपए। 


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