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विकल्प की चिकित्सा PDF Print E-mail
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Monday, 15 September 2014 12:08

जनसत्ता 15 सितंबर, 2014: अभी यह नहीं कहा जा सकता कि शिक्षा के क्रांतिकारी बदलाव का दौर शुरू हो चुका है। तमाम क्षेत्र ऐसे हैं, जहां वाकई क्रांति का सूत्रपात किया जाना आवश्यक है। देश में उदारीकरण का सर्वाधिक फायदा इंजीनियरिंग शिक्षा को मिला है। एक समय देश में इंजीनियरिंग कॉलेज खोलने की झड़ी लग गई थी। उन जगहों पर भी तकनीकी संस्थानों की बहुमंजिली इमारत खड़ी हो गई, जहां खोजने से कायदे का प्राथमिक विद्यालय भी नहीं मिलता था। पर लाख प्रयास के बावजूद देश में मांग के अनुरूप मेडिकल कॉलेज नहीं खोले जा सके। आखिर कमी कहां है? 

आखिर कारण क्या है कि विश्व को चकित करने वाली विलक्षण पद्धति आयुर्वेद और योग के बावजूद हम ऐलोपैथी के प्रवक्ता बन गए। इस अबूझ पहेली को समझने के लिए हमें अड़सठ साल पहले भारत में जनस्वास्थ्य की अवधारणा और स्थिति पर जोसेफ भोरे समिति की सिफारिशों पर ध्यान देना होगा। समिति ने जोर देकर कहा कि रोग निवारण और रोग निरोधक का कार्य एक ही संस्था द्वारा परिचालित किया जाए। वैसे इसने अन्य जनकल्याणकारी सुझाव भी दिया। लेकिन एलोपैथी को सर्वाधिक महत्त्व देने से हमारे स्वास्थ्य का पूरा ढांचा एलोपैथी की बुनियाद पर खड़ा हो गया।

 माना कि मेडिकल कॉलेजों की संख्या उस तरह नहीं बढ़ाई जा सकती, जैसा कि इंजीनियरिंग कॉलेजों के संदर्भ में किया जा रहा है। लेकिन मेडिकल काउंसिल आॅफ इंडिया को यह सोचने-समझने की आवश्यकता है कि वह कोई विकसित देश की संस्था नहीं है। उसे एक ऐसे देश की स्वास्थ्य शिक्षा में क्रांतिकारी बदलाव लाने की जिम्मेदारी दी गई जो निर्धन है और जिसके प्रतिभाशाली छात्रों की बड़ी आबादी मेडिकल की पढ़ाई करना चाहती है। इस ऊर्जावान वर्ग की गंभीर समस्या है कि अति सीमित सीट की वजह से इनका प्रवेश मेडिकल कॉलेज में नहीं हो पा रहा है, जबकि इनके अंदर डॉक्टर बनने की पूरी काबिलियत है। 

विश्व स्वास्थ्य संगठन की रिर्पोट के अनुसार डॉक्टर और जनसंख्या के अनुपात के लिहाज से हमारी स्थिति अफ्रीका महाद्वीप के सहारा क्षेत्र से कोई अच्छी नहीं है। रिर्पोट के अनुसार भारत


में दो हजार की संख्या पर एक डॉक्टर है। योजना आयोग के अनुसार देश में छह लाख डॉक्टरों की कमी है। पिछले साल स्वास्थ्य मंत्रालय के एक विशेष आदेश से सभी सरकारी मेडिकल कॉलेजों की पचास सीट बढ़ गई थी। इस कदम से देश में एमबीबीएस की लगभग चार हजार सीटों का इजाफा हुआ।

 बहरहाल, खस्ताहाल स्वास्थ्य ढांचे में सुधार के लिए यह बेहतरीन शुरुआत थी। पर स्वास्थ्य मंत्रालय और मेडिकल काउंसिल ऑफ इंडिया के आपसी झगड़े ने नए मेडिकल कॉलेज की संभावना पर कुठाराघात किया। सवाल है कि वर्चस्व की इस लड़ाई में आखिर फायदा किसको मिला। आलम यह है कि देश में दस में से आठ डॉक्टर और अस्सी प्रतिशत अस्पताल शहरों में हैं। जबकि देश की बहुसंख्यक आबादी ग्रामीण क्षेत्रों में निवास करती है। 

प्रश्न है कि इस समस्या से निजात कैसे मिले। इसके समाधान का एक बेहतर तरीका यह हो सकता है कि आयुर्वेद और योग की शिक्षा स्कूल स्तर से शुरू की जाए। इससे जहां लोगों को अपने स्वास्थ्य की रक्षा करने में सहूलियत मिलेगी तो दूसरी तरफ भारतीय प्राचीन प्रणाली को आत्मसात करने से एलोपैथी का वर्चस्व टूटेगा। कोई कारण नहीं कि देश के नीति-नियंता अगर दृढ़ इच्छाशक्ति का प्रदर्शन करें तो आयुर्वेद हमारे लोगों के स्वास्थ्य की रक्षा न कर सके। 

धर्मेंद्र कुमार दूबे, वाराणसी


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