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वंचित बचपन PDF Print E-mail
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Monday, 15 September 2014 12:04

जनसत्ता 15 सितंबर, 2014: यूनिसेफ की ताजा रिपोर्ट दक्षिण एशिया के अन्य देशों के साथ-साथ भारत के लिए भी चिंताजनक है। इस रिपोर्ट के मुताबिक दक्षिण एशिया में हर साल बीस लाख से ज्यादा बच्चे ऐसी बीमारियों की चपेट में आकर दम तोड़ देते हैं जिनका आसानी से इलाज संभव है। दुनिया के इस क्षेत्र के पैंतीस फीसद बच्चे घोर कुपोषण के शिकार हैं। इनमें भारत की हालत कोई बेहतर नहीं है, बल्कि श्रीलंका और बांग्लादेश जैसे पड़ोसी देशों से गई-बीती है। यूनिसेफ की रिपोर्ट के अलावा और भी कई अध्ययन इस सिलसिले में आ चुके हैं। इन सब के आंकड़ों में थोड़े-बहुत फर्क के बावजूद सामान्य निष्कर्ष यही रहा है कि भारत में कुपोषणग्रस्त बच्चों का अनुपात चालीस से पैंतालीस फीसद के बीच है। ऐसी ही एक रिपोर्ट का लोकार्पण करते हुए तत्कालीन प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने कुपोषण को देश के माथे पर कलंक करार दिया था। पर उनकी सरकार के दस साल के दौरान इस कलंक को क्यों नहीं मिटाया जा सका, जबकि उनके कार्यकाल के आखिरी दो साल को छोड़ दें, तो देश ने आठ से नौ फीसद की विकास दर हासिल की। यह विरोधाभास इसलिए नजर आता है क्योंकि विकास को सामाजिक मानकों और वंचित वर्गों की बेहतरी की कसौटी पर नहीं कसा जाता। विश्व स्वास्थ्य संगठन के अध्ययनों और संयुक्त राष्ट्र की मानव विकास रिपोर्टों ने भारत के बच्चों में कुपोषण की व्यापकता के साथ-साथ बाल मृत्यु दर और मातृ मृत्यु दर का ग्राफ काफी ऊंचा रहने के तथ्य भी बार-बार जाहिर किए हैं। यूनिसेफ की रिपोर्ट बताती है कि लड़कियों की दशा और भी खराब है। 

पाकिस्तान और अफगानिस्तान के बाद, बालिग होने से पहले लड़कियों को ब्याह देने के मामले दक्षिण में सबसे ज्यादा भारत में होते हैं। मातृ मृत्यु दर और शिशु मृत्यु दर का एक प्रमुख कारक यह भी है। यह रिपोर्ट ऐसे समय जारी हुई है जब बच्चों के अधिकारों से संबंधित वैश्विक घोषणापत्र के पच्चीस साल पूरे हो रहे हैं। इस घोषणापत्र


पर भारत और दक्षिण एशिया के अन्य देशों ने भी हस्ताक्षर किए थे। इसका यह असर जरूर हुआ कि बच्चों की सेहत, शिक्षा, सुरक्षा से संबंधित नए कानून बने, मंत्रालय या विभाग गठित हुए, संस्थाएं और आयोग बने। घोषणापत्र से पहले की तुलना में कुछ सुधार भी दर्ज हुआ है। पर इसके बरक्स बहुत सारी बातें विचलित करने वाली हैं। मसलन, देश में हर साल लाखों बच्चे गुम हो जाते हैं। लाखों बच्चे अब भी स्कूलों से बाहर हैं। श्रम-शोषण के लिए विवश बच्चों की तादाद इससे भी अधिक है। वे स्कूल में पिटाई से लेकर घरेलू हिंसा के शिकार होते रहते हैं। बच्चों के खिलाफ यौन-अपराध की घटनाएं काफी बढ़ी हैं। जब बंगलुरु के एक आभिजात्य स्कूल में एक बच्ची के साथ बलात्कार की घटना सामने आई, तो समाज में सिहरन पैदा हुई। पर ऐसे किसी वाकये पर थोड़े समय के विरोध-प्रदर्शन के बाद बच्चों की हालत पर खामोशी छा जाती है। परिवार के स्तर पर देखें तो संतान का मोह काफी प्रबल दिखाई देगा, मगर दूसरी ओर, बच्चों के प्रति सामाजिक संवेदनशीलता बहुत क्षीण है। कमजोर तबकों के बच्चों के प्रति तो बाकी समाज का रवैया अमूमन असहिष्णुता का ही रहता है। क्या ये स्वस्थ समाज के लक्षण हैं? 


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