मुखपृष्ठ
Bookmark and Share
ये जनतांत्रिक रुझान नहीं PDF Print E-mail
User Rating: / 2
PoorBest 
Monday, 15 September 2014 12:02

विकास नारायण राय

 जनसत्ता 15 सितंबर, 2014: ऐसा भी नहीं है कि देश में फैले भ्रष्टाचार के अंतहीन मरुस्थल में संजीव चतुर्वेदी जैसे

ईमानदारी के छोटे-मोटे नखलिस्तान के लिए बिल्कुल ही जगह न बची हो। ऐसे में केंद्रीय स्वास्थ्य मंत्री हर्षवर्धन जैसे एक विनम्र पृष्ठभूमि के राजनेता द्वारा एम्स के इस मुख्य सतर्कता अधिकारी को, उसी संस्थान के कुछ लोगों के प्रभाव में, उसके पद से अनायास बेदखल करने के प्रकरण को प्रेमचंद की कहानी ‘नशा’ के माध्यम से आत्मसात करना पड़ेगा। चतुर्वेदी प्रकरण को समझना हो तो फरवरी 1934 में ‘चांद’ में प्रकाशित इस वर्ग चेतना की कहानी से सटीक कुछ नहीं।

मार्क्स का मशहूर कथन है- ‘मनुष्यों की चेतना उनके अस्तित्व को निर्धारित नहीं करती, उलटे उनका सामाजिक अस्तित्व उनकी चेतना को निर्धारित करता है।’ लिहाजा, सत्ता का नशा प्रेमचंद की इस अमर रचना के बैरोमीटर से जांचना सहज बन पड़ता है। कहानी ‘नशा’ में एक गरीब क्लर्क का बेटा अपने अमीर सहपाठी ईश्वरी के साथ उसके गांव स्कूली छुटिटयां बिताने जाता है। इससे पहले वह ईश्वरी की कुलीन, दंभी, सामंती जीवन शैली का घोर आलोचक रहा है। पर ईश्वरी की बदौलत रेल के ऊंचे दर्जे में यात्रा से लेकर ऐशो-आराम से बीते छुट्टी के दिनों ने उस पर भी उन्हीं अभिजात मूल्यों का नशा चढ़ा दिया।

ईश्वरी ने गांव में सभी से उसका परिचय एक रियासतजादे कुंवर के रूप में दिया था और इस दौरान वह पूरी तरह से ‘कुंवर साहब’ को जीने भी लगा- मेज पर लैंप रखा था, दियासलाई भी वहीं थी, कुंवर साहब अखबार पढ़ने को भिन्ना रहे हैं, पर लैंप अपने हाथ से कैसे जलाएं। जब ईश्वरी ऐसा नहीं करता तभी ओहदेदार मुंशी रियासत अली आ निकले और ‘कुंवर साहब’ फट पड़े- ‘तुम लोगों को इतनी फिक्र भी नहीं कि लैंप जलवा दो। मालूम नहीं ऐसे कामचोर आदमियों का यहां कैसे गुजर होता है। मेरे यहां घंटे भर निर्वाह न हो।’ उसे वापसी की यात्रा, ऊंचे दर्जे का टिकट न मिलने से, भीड़-भड़क्के में तीसरे दर्जे में करनी पड़ी। धक्का-मुक्की से बौखलाए ‘कुंवर साहब’ ने एक ग्रामीण सहयात्री पर हाथ चला दिया तो कइयों ने उन्हें जमकर खरी-खरी सुनाई। अब उनका वर्गीय नशा उतरना शुरू हुआ और वे अपनी पुरानी दुनिया में वापस लौटे।

प्रेमचंद की उपरोक्त कहानी सत्ता के चरित्र को समझने में हमें मदद करती है। कमजोर पृष्ठभूमि के लोग भी सत्ता में पहुंच जाते हैं तो उनकी भाषा और सोच-व्यवहार आमतौर पर बदल जाते हैं। वे शाहखर्ची को बढ़ावा देते हैं और इस बात के लिए चिंतित रहते हैं कि अभिजात वर्ग के बीच उन्हें कितना पसंद किया जाता है।

नरेंद्र मोदी ने एक ‘चायवाला’ की अपनी पृष्ठभूमि को लोकसभा चुनाव में भुनाने में कोई कसर नहीं छोड़ी। पर प्रधानमंत्री बनने के बाद वे किनके लिए चिंतित हैं? प्रधानमंत्री विकास के नाम पर अपने घर के पिछवाड़े साठ हजार करोड़ की बुलेट ट्रेन चलवाने पर आमादा हैं, महज इसलिए कि कभी जापान यात्राओं में बुलेट ट्रेन की सवारी उन्हें बेतरह भा गई थी। जबकि आज के दिन देश में लगभग बारह हजार मानव-रहित रेलवे क्रॉसिंग हैं जिन पर चालीस फीसद रेल दुर्घटनाएं हो रही हैं! स्कूली बच्चों समेत सैकड़ों नागरिकों की जान लेने वाली इन तमाम जगहों को अंडरपास या ओवरब्रिज बना कर सुरक्षित करने की अनुमानित लागत बनती है कुल पचास हजार करोड़! यानी बुलेट ट्रेन की उपर्युक्त परियोजना से दस हजार करोड़ रुपए कम। लाल किले से प्रधानमंत्री ने स्वयं को देश का प्रधान सेवक कहा था। लेकिन उनकी सरकारी सभाओं में उनके समर्थक गैर-भाजपा मुख्यमंत्रियों तक को नहीं बोलने देते। यह सत्ता का नशा नहीं तो और क्या है! 

राजधानी में उच्च न्यायालय के एक आदेश के चलते लगभग एक लाख इ-रिक्शा चालक और उनके पारिवार संविधान की धारा चौदह में निहित आजीविका के मूलभूत अधिकार से वंचित हो गए हैं- जब तक केंद्रीय परिवहन मंत्रालय संबंधित कानूनों में संशोधन कर दिल्लीवासियों के लिए बेहद उपयोगी इन पर्यावरण-मित्र वाहनों के पंजीकरण की प्रणाली नहीं लागू करता। जो प्रक्रिया पूरी तरह सरकार के हाथ में है उसमें देरी की सजा इन एक लाख परिवारों को भुगतनी पड़ रही है।

कान में तेल डाल कर सोने वाली यह वही सरकार है जो प्रधानमंत्री कार्यालय में मोदी के मनपसंद अवकाशप्राप्तनौकरशाह की नियुक्तिके आड़े आ रही उसकी अपात्रता को हटाने के लिए रातोंरात अध्यादेश लाई थी। यह वही सरकार है जिसने उद्योगपति मुकेश अंबानी को गैस प्रकरण में आपराधिक जवाबदेही से बचाने के लिए दिल्ली सरकार के भ्रष्टाचार निरोधक ब्यूरो का अधिकार-क्षेत्र सीमित करने अध्यादेश जारी करने में तनिक विलंब नहीं किया था। लेकिन उसकी कार्यप्रणाली में तेजी ऐसे चुनिंदा मामलों में ही क्यों दिखती है? इ-रिक्शा चालकों को राहत दिलाने के लिए सरकार क्यों तत्पर नजर नहीं आती? 

मणिपुर की इरोम शर्मिला के अनशन को अक्षम्य मानते भी चौदह वर्ष हो चले है। मई, 2000 मई से वे अफस्पा यानी सशस्त्र बल विशेषाधिकार कानून की डायरशाही के विरोध में, एक भाजपाई सरकार के दौर की कैद से शुरू होकर कांग्रेसी सरकारों के दौर की कैद से गुजरते हुए पुन: एक और भाजपाई सरकार के दौर में कैद तक पहुंची हैं। क्या इस बीच इनमें से किसी भी सरकार को देश के नागरिकों को नहीं बताना चाहिए था कि अफस्पा हटाने की इरोम की मांग क्यों नहीं स्वीकारी जा सकी है? अगर सेना बिना सशस्त्र बल विशेषाधिकार


कानून के कथित अशांत इलाके में तैनात ही नहीं की जा सकती तो उसे हटा कर वहां कोई ऐसा बल क्यों नहीं तैनात किया जाता जो बिना अफस्पा के काम कर सकता हो? और सेना की अशांत इलाकों में तैनात होने वाली टुकड़ियों को बिना अफस्पा के काम करने का प्रशिक्षण क्यों नहीं दिया जा सकता? इस बीच, और इसे सत्ता की राजनीति का ही नशा कहा जाना चाहिए कि पूर्वोत्तर में सरकारी रिश्वत की बंदरबांट के दम पर वहां के विद्रोही हिंसक समूहों की राष्ट्रीय वफादारी खरीदी जाने की प्रथा परवान चढ़ती गई है। अब अगर सत्ता का नशा उतरे तो समझ में आए कि मणिपुर को अफस्पा चाहिए या शर्मिला।

फिलहाल तो भारत के विभिन्न शहरों में नरेंद्र मोदी के सत्तानशीन होने से मिले अभय का जश्न सरेआम प्रेमियों को ‘लव जिहादी’ के आरोप में अपमानित कर मनाया जा रहा है। यह कुछ वैसी ही स्थिति है जैसी उत्तर प्रदेश में समाजवादी पार्टी की जीत और अखिलेश यादव की ताजपोशी के बाद आई थी, जब समाजवादी पार्टी के कार्यकर्ता बेकाबू नजर आ रहे थे। सत्ता की विशिष्ट चेतना से फूटने वाला यह नशा सिर्फ इन्हीं तत्त्वों तक सीमित नहीं। ‘आप’ जैसी आम आदमी की बात करने वाली पार्टी का मंत्री नैतिक पहरेदारी करने आधी रात को दिल्ली के एक मोहल्ले पर चढ़ाई करने में अपनी शान समझता है। शिवसेना का एक सांसद भोजन की खराब गुणवत्ता के विरोधस्वरूप एक कैंटीन अधिकारी के मुंह में रोटी ठूंसने का फिल्मांकन कराता है। 

यूपीए सरकार के गृहमंत्री पी चिदंबरम पर यह नशा इस कदर सवार था कि पुलिस महानिदेशकों के वार्षिक सम्मलेन में माओवादियों के देशव्यापी सफाए की अंतिम समय-सीमा उन्होंने दो वर्ष घोषित की। छत्तीसगढ़ और झारखंड में खनिज संपदा की कॉरपोरेटी लूट के लिए उन्होंने एक बे-तैयार केंद्रीय पुलिस बल को अपने दावे के मुताबिक इस प्रयोग में झोंक दिया। आज पांच वर्ष के बाद, व्यापक जन-धन गंवाने के बावजूद, इस मोर्चे पर सामरिक गतिरोध ज्यों का त्यों कायम है। पछतावे का एक शब्द भी नहीं कहा गया है। 

मोदी ने अपनी प्रधानमंत्री की पारी की शुरुआत से ही देश के आम नागरिक के सिर पर अपराध-बोध लादना चालू किया हुआ है कि सार्वजनिक गंदगी और उत्पादन-कामचोरी के लिए वह जिम्मेवार है। जैसे सरकारी व्यवस्थाओं की कोई भूमिका ही नहीं बनती। अब वे अपने मंचों से इसी अंदाज में सर्वव्यापी भ्रष्टाचार को भी सरकारी दफ्तरों में महज ‘खाने और खिलाने वालों’ के मत्थे मढ़ कर इतरा रहे है। किशोर अपराधियों पर स्त्री-विरुद्ध बढ़ती हिंसा का ठीकरा एक ऐसी ही मदमस्त सरकार फोड़ सकती है। इस संबंध में किशोर संरक्षण कानून में प्रस्तावित नए कठोर प्रावधानों के पीछे उसका तर्क है कि उत्तरोत्तर अधिक से अधिक 16-18 वर्ष के किशोर यौनिक हिंसा में शामिल पाए जा रहे हैं, इसलिए उन्हें भी वयस्क अपराधियों की तर्ज पर सजा मिलनी चाहिए। तो क्या किशोरों के अपराधी बनने में वृद्धि को लेकर सरकार की कोई जवाबदेही नहीं बनती? किशोर अपराध में न उतरें या अपराध करते पकड़े जाने पर स्वस्थ समाज में वापसी कर सकें, इस पर खामोशी है!

मोदी के नेतृत्व में पूर्ण बहुमत की भाजपा सरकार बनने से अरसे बाद सत्ता-विमर्श में सत्ता के वर्गीय चरित्र की सहज पैठ सतह पर बजबजाने लगी है। भाजपा का एक बेहद तीखा कांग्रेसांतरण, शासकीय वर्गांतरण के अनुरूप, शासन के हर क्षेत्र में उजागर हो रहा है। धीरे-धीरे मोदी की सोनिया-राहुल से तुलना या मोदी सरकार से मनमोहन सरकार का अंतर सिर्फ प्रचारात्मक सिलसिला रह जाएगा। दोनों दौर में शासन की अंतर्वस्तु एक होने से मोदी इस अवतार में कॉरपोरेट जगत पर बेहतर छाप छोड़ने वाला मनमोहन सिंह ही साबित हो सकते हैं- एक तेज फाइलें निकालने वाले और मुखर मनमोहन सिंह!

सत्ता-विमर्श में आम आदमी के मतलब से वर्ग-विमर्श के प्रवेश का मतलब है, जनता का सत्ता के अंदरूनी चरित्र से साक्षात्कार, न कि सिर्फ उसके बाह्य फसाद से। इस विमर्श में सत्ता का मोदी-पहलू, स्वयं को मनमोहन-पहलू से अलग दिखाते हुए भी, एक जैसी ही बुनियादी प्राथमिकताओं का वाहक नजर आएगा। हालांकि ऐसा वर्ग-विमर्श स्वत: सत्ता-विमर्श में समाहित नहीं होगा; जनता का कोई भी विमर्श आसानी से हो भी नहीं सकता। उसे वांछित उत्प्रेरक उपकरण चाहिए जो आज न सत्ता के गलियारों में दिखते हैं और न समाज के कूचों में। प्रेमचंद ने साहित्य को राजनीति के आगे चलने वाली मशाल कहा था। उनकी वर्गीय चेतना की अप्रतिम कहानियां इस प्रवेशद्वार को खोलने में सहायक हैं। राजनीति के क्षेत्र में ही नहीं, हर क्षेत्र में। आइए ‘नशा’ दोबारा पढ़ें।


फेसबुक पेज को लाइक करने के लिए क्लिक करें- https://www.facebook.com/Jansatta

ट्विटर पेज पर फॉलो करने के लिए क्लिक करें- https://twitter.com/Jansatta 

             

आपके विचार

 
 

आप की राय

सोनिया गांधी ने आरोप लगाया है कि 'भाजपा के झूठे सपने के जाल में आम जनता फंस गई है' क्या आप उनकी बातों से सहमत हैं?