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नफरत और दहशत PDF Print E-mail
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Monday, 15 September 2014 11:58

विशाल कसौधन

जनसत्ता 15 सितंबर, 2014: सुबह-सुबह घर से निकल कर थोड़ी दूर ही चला था कि कदम अचानक थम गए। कानों में चाय की दुकान से उठती मजहब, कौम और दंगों को लेकर चल रही गुफ्तगू में शरीक होने पहुंच गया। गांवों में चाय की दुकानों पर संसद की तरह ही तीखी बहसें हुआ करती हैं, जो हमेशा बेनतीजा रहती हैं। उस दिन बहस का मुद्दा अखबारों के पन्नों में दहकती सांप्रदायिक दंगों की आग थी। चाय की चुस्की के साथ कुरबान अली ने पूछा- ‘भइया जुम्मन, ई प्रदेश का ऐसे ही जलता रहेगा! अभी मुजफ्फरनगर में कितने लोग मर गए, और अब सहारनपुर।’ कुरबान की बातों में एक दर्द छिपा था, जिसे महसूस करते हुए जुम्मन ने कहा- ‘क्या करोगे कुरबान! भाई भाई के नहीं रह गए, यह तो दो धर्मों का झगड़ा है!’ 

मेरे पास वक्त कम था, इसलिए मैं वहां से निकल पड़ा। रास्ते भर जुम्मन और कुरबान की बातें गूंजती रहीं। समझ में नहीं आ रहा था कि क्या यह मसला सिर्फ हिंदू और मुसलमान का है! क्या मजहब की लंबी होती लकीर कहीं न कहीं हमारे वतन में एक और पाकिस्तान की रूपरेखा तैयार कर रही है? दरअसल, जिस पाकिस्तान की बुनियाद के लिए अंगरेजों ने तमाम कूटनीतिक और राजनीतिक साजिशों की बिसात बिछाई थी, उसे उन्होंने धर्म का लबादा ओढ़ा कर ही कामयाब बनाया था। धर्म की इस दोधारी तलवारों ने एक तरफ जहां विश्व के नक्शे पर लकीर खींचने का काम किया है, वहीं संस्कृति को भी जख्मी कर दिया है। इस पतन के साथ ही मिस्र, तुर्की, अफगानिस्तान, इंडोनेशिया, लेबनान, बोस्निया, इराक, सीरिया समेत अनेक देशों में एक नया देश बनाने की कोशिश परवान चढ़ रही है, तो कई देशों के भीतर एक नया देश वजूद में भी आ गया है। कौमें हमेशा संस्कृति और आपसी भाईचारे की चादर में जब तक लिपटी होती हैं, तब तक वे महफूज रहती हैं। लेकिन जैसे ही उस पर मजहबी रंग चढ़ाया जाता है, तो वह चादर फटने लगता है और उसके बाद तार-तार होने लगती है मुल्क की इज्जत!

अंगरेजों ने मुसलिम लीग के बहाने उसी मजहबी बिसात पर मोहरे बिछा कर हिंदुस्तान की बादशाही


की मिट्टी पलीद कर दी। वह बादशाही, जिसके तहत मुगल शासक भी यहीं की संस्कृति में घुल-मिल गए थे। हिंदुस्तान की पीठ में अंगरेजों ने जो खंजर घोंपा, उससे निकले खून से पाकिस्तान का नक्शा तो बन गया, लेकिन आज तक उस खून का रिसना जारी है। जख्म से रिसते खून को रोकने के लिए विभाजन के अड़सठ साल बाद भी सियासी जमातों ने कोई कदम न उठा कर अपने सियासी फायदे के लिए घावों को और कुरेदना जारी रखा है। बाबरी मस्जिद को ढहाने से लेकर अक्सर होने वाले दंगे उसी मजहबी घाव पर नमक डालने की तरह हैं, जिसने पूरे विश्व में गौतम बुद्ध के संदेश का मजाक बना रखा है और हर दिन इसी की आड़ में देश के भीतर एक अलग देश की मांग की बुनियाद तैयार कर रहा है। 

उत्तर प्रदेश में पिछले कुछ समय में हुए दंगों की तादाद ने कुरबान और जुम्मन जैसे लोगों के मन में एक अनदेखी-सी लकीर खींच दी है। ऐसी लकीर, जिसे न चाहते हुए भी वे अपने साथ ढो रहे हैं। लोगों के मन में डाले गए मजहब के बीज ने इन अड़सठ सालों में एक विशाल वृक्ष की शक्ल ले ली है, जिस पर लगने वाले फल वातानुकूलित कमरों में बैठ कर दंगों के साजिशकर्ता खा रहे हैं और देश के भीतर नए देश के वजूद में आने की दावत दे रहे हैं!    


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