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वक्त की धड़कन PDF Print E-mail
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Monday, 15 September 2014 11:54

सोमेश गोयल

जनसत्ता 15 सितंबर, 2014: कुछ वाकये ऐसे होते हैं या कुछ खबरें ऐसी होती हैं, जिनको सुन कर आप सन्न रह जाते हैं, मानो दिल की धड़कन ही रुक गई हो। ऐसा ही कुछ हुआ एचएमटी घड़ियों का उत्पादन बंद होने की खबर मिलने के बाद। मेरे जैसे अनेक लोगों की मानो ‘धड़कन’ ही बंद हो गई, जिन्होंने अपनी कलाई पर सबसे पहले एचएमटी की घड़ी बांधी थी। इस घड़ी का जन्म भी मेरे ही जन्म वर्ष यानी 1961 में हुआ। इसलिए मुझे तो यह और अधिक कचोटता है कि इस नायाब और गुणवत्ता से परिपूर्ण उत्पाद को असमय यमराज के द्वार पर धकेल दिया गया है। 

भारतवर्ष के अधेड़ों की बहुत सारी मीठी यादें एचएमटी से जुड़ी हैं। एक तो घड़ी की वजह से, दूसरे इसके शक्तिशाली ट्रैक्टरों की वजह से। जिस तरह एचएमटी की घड़ियां हमारे यहां समय का पर्याय हो गई थीं, उसी तरह खेती-किसानी में इस कंपनी के ट्रैक्टरों ने अपनी जगह बना रखी थी। इसका आकलन शायद ही कहीं हुआ हो कि भारत की हरित क्रांति में एचएमटी के ट्रैक्टरों का क्या योगदान रहा। 

मुझे याद है कि दसवीं कक्षा की परीक्षा के बाद गरमी की छुट्टियों में वार्षिक यात्रा पर अपने पैतृक निवास पर गया था। उन्हीं दिनों मेरे दादा ने एक दिन अपनी बड़ी-सी तिजोरी से एक छोटा-सा डिब्बा निकाला और उसमें से निकाल कर एचएमटी की घड़ी मुझे भेंट की थी। मां कहती हैं कि उनके सभी पोतों में से इस घड़ी को प्राप्त करने का सौभाग्य केवल मेरा रहा। इस भेंट से भी महत्त्वपूर्ण उनका संदेश था, जो मैं भुलाए नहीं भूलता कि यह घड़ी कभी गलत समय नहीं बताती और तुम्हें याद रखना है कि कभी तय समय से देर न हो और कोई गलत काम न करो। लगभग चालीस वसंत बाद भी वह घड़ी मैंने सहेज कर रखी है और अब भी उसकी धड़कन बरकरार है। 

उन दिनों एचएमटी की घड़ी भेंट में प्राप्त करना या भेंट स्वरूप देना एक रिवाज-सा बन चला था। तब शायद ही कोई ऐसी शादी होती होगी, जिसमें वर-वधू ने एचएमटी की घड़ी न पहनी हो। इसके विभिन्न मॉडल- सोना, जनता और विजय विशेषकर पसंद किए जाते थे। 

एक बार हम कॉलेज से एक दल के रूप में नेपाल घूमने गए। काठमांडो उस समय ताइवान निर्मित वस्तुओं का गढ़ हुआ करता था और सभी यात्रियों को वहां से छोटी-छोटी इलेक्ट्रॉनिक वस्तुएं और घड़ियां लाने का शौक होता था। मुझे अच्छी तरह याद है कि मैंने भी एक प्लास्टिक की घड़ी खरीदने का फैसला किया। घड़ी खरीदते हुए दुकानदार से पूछा कि यह ठीक टाईम


तो देगी? दुकानदार ने तपाक से कहा- साहब आपके यहां तो दुनिया की सबसे अच्छी घड़ी बनती है एचएमटी। उसका मुकाबला तो यह घड़ी नहीं कर सकती। 

मेरे खयाल में एचएमटी अपने समय का बहुत दुर्लभ साझा उद्यम यानी ज्वाइंट वैंचर था, जिसे तकनीकी सहायता जापान की सिटिजन घड़ी निर्माताओं से प्राप्त हुई। जाहिर है कि इसकी गुणवत्ता विश्वस्तरीय रही। मगर चाबी भरने वाली घड़ियों के युग की समाप्ति सत्तर के दशक में हो गई, जब एचएमटी ने अपनी आॅटोमैटिक और क्वार्ट्ज घड़ियों का उत्पादन शुरू किया। 

सभी सरकारी संयंत्रों और विभागों की तरह एचएमटी भी उदासीनता का शिकार हुई। उदारीकरण के दानव के सामने यह नन्ही-सी जान कब तक टिकी रह पाती। बड़े-बड़े औद्योगिक घरानों द्वारा निर्मित घड़ियों के इतने विज्ञापन बाजार में आए कि एचएमटी की घड़ियां उस कोलाहल में कहीं दब-सी गर्इं। ‘देश की धड़कन’ कही जाने वाली एचएमटी घड़ियों को ग्रहण लग गया और उसे ऐसा लगने लगा कि किसी बाइपास की आवश्यकता है। मगर देश की पहचान की किसे फिक्र थी। यहां तो देशी और विदेशी पूंजीपतियों को निवेश का न्योता देने की अंधाधुंध दौड़ शुरू हो चुकी थी। नई सदी की शुरुआत में एक बार फिर एचएमटी की घड़ियों को दुबारा बाजार में लाने की छोटी-सी कोशिश हुई, लेकिन तब तक काफी देर हो चुकी थी। जहां देश के बाबू साठ-पैंसठ सालों में देश की गरीबी दूर नहीं कर सके, सभी नागरिकों को शिक्षा नहीं दे सके, सभी हाथों को काम नही दे सके, वहां ओमेगा और रोलेक्स पहनने वालों से एचएमटी को जीवनदान देने की कल्पना करना व्यर्थ ही था। 

आज किसी मफस्सिल कस्बे में घड़ीसाज के यहां कोई एचएमटी घड़ी देखता हूं या अपनी घड़ी में चाबी भरता हूं, तो बचपन की बहुत सारी यादें ताजा हो जाती हैं। 

एचएमटी तुम्हारा धन्यवाद कि तुम देश की धड़कन बनी। अब जहां रहो, प्रसन्न रहो। 


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