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निनाद: हिंदी बनाम उर्दू PDF Print E-mail
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Friday, 12 September 2014 18:47

कुलदीप कुमार

जनसत्ता, 7 सितंबर, 2014: सर्वोच्च न्यायालय की पांच सदस्यीय संविधान पीठ का फैसला आ गया है कि उत्तर प्रदेश सरकारी भाषा (संशोधन) कानून 1989 संविधानसम्मत है और राज्य में उर्दू को सरकारी कामकाज की दूसरी भाषा घोषित करने का फैसला सही है। इस मामले में ध्यान देने की बात है कि कानून को संविधान के विरुद्ध बता कर मुकदमा लड़ने वाला कोई व्यक्ति नहीं, बल्कि उत्तर प्रदेश हिंदी साहित्य सम्मेलन था। यानी हिंदी-उर्दू की लड़ाई अभी तक जारी है। उर्दू अगर उत्तर प्रदेश में सरकारी कामकाज की दूसरी भाषा बन जाती है, तो इससे हिंदी को क्या नुकसान होने वाला है? 

आजादी मिलने के बाद उत्तर प्रदेश ही नहीं, समूचे भारत की राजभाषा का दर्जा पाने के बाद भी हिंदी को उर्दू के कारण इतनी असुरक्षा क्यों महसूस होती है? क्या इस ग्रंथि के पीछे केवल ऐतिहासिक कारण हैं या सांप्रदायिक सोच भी है, क्योंकि उर्दू अब केवल मुसलमानों की भाषा बन कर रह गई है? दूसरे, यह देखना भी जरूरी होगा कि क्या बार-बार सुना जाने वाला यह विलाप वास्तविकता पर आधारित है कि स्वाधीन भारत में उर्दू की हालत बहुत खराब है? 

2001 में हुई जनगणना में जो आंकड़े सामने आए उनसे पता चलता है कि बाईस अनुसूचित भाषाओं में हिंदी, बांग्ला, तेलुगू, मराठी और तमिल के बाद उर्दू छठे स्थान पर है। यानी वह गुजराती, कन्नड़, मलयालम, ओड़िया, पंजाबी और असमिया से ऊपर है। 2001 की इस जनगणना का यह भी कहना है कि पूरे देश की आबादी का 5.01 प्रतिशत उर्दूभाषी था और पांच करोड़ पंद्रह लाख व्यक्तियों ने उर्दू को अपनी मातृभाषा के रूप में दर्ज कराया था। उत्तर प्रदेश, बिहार, मध्यप्रदेश, राजस्थान, आंध्र प्रदेश, झारखंड, कर्नाटक, तमिलनाडु, महाराष्ट्र और पश्चिम बंगाल-ये दस राज्य ऐसे हैं जिनमें पूरे देश में उर्दू बोलने वालों की संख्या के एक प्रतिशत से अधिक लोग रहते हैं। इनमें भी उत्तर प्रदेश, बिहार, महाराष्ट्र, आंध्र प्रदेश, कर्नाटक और झारखंड में देश की कुल उर्दूभाषी आबादी का 85.8 प्रतिशत लोग रहते हैं। अकेले उत्तर प्रदेश में उर्दूभाषियों की संख्या देश की कुल उर्दूभाषी आबादी के एक चौथाई से भी अधिक है। 

जनगणना से एक महत्त्वपूर्ण बात यह भी पता चली है कि हालांकि भारत में रहने वाले सभी मुसलमानों की भाषा उर्दू नहीं है, लेकिन केवल मुसलमानों ने उर्दू को अपनी मातृभाषा के रूप में दर्ज कराया है। यानी उर्दू का मुसलिम समुदाय के साथ नाता वास्तविक है। उन्नीसवीं सदी के उत्तरार्ध और पूरी बीसवीं सदी का इतिहास साक्षी है कि हिंदी और उर्दू के कंधों पर बंदूक रख कर हिंदू और मुसलिम सांप्रदायिकता ने अपनी लड़ाइयां लड़ी हैं। लेकिन क्या अब समय नहीं आ गया, जब इस निरर्थक झगड़े को समाप्त किया जाए और लोकतांत्रिक भारत में हिंदी के साथ-साथ उर्दू को भी उचित स्थान दिया जाए? 

हिंदी और उर्दू को एक ही भाषा की दो शैलियां या जुड़वां बहनें कहने वालों की भी कमी नहीं है। क्या ऐसी स्थिति स्वीकार्य हो सकती है, जिसमें एक शैली या एक बहन सिंहासन पर बैठी हो और दूसरी को अपने अस्तित्व के लिए लड़ना पड़ रहा हो? दरअसल हिंदी और उर्दू को एक ही भाषा की दो शैलियां कहने के पीछे भी कई बार यह दृष्टि होती है कि एक भाषा के रूप में उर्दू का स्वतंत्र अस्तित्व ही नहीं है और वह तो खड़ी बोली हिंदी की ही एक शैली है। लेकिन 1932 में प्रकाशित पुस्तक ‘हिंदी, उर्दू और हिंदुस्तानी’ में पद्मसिंह शर्मा ने इस सच्चाई को स्वीकार कर लिया था कि ‘हिंदी-उर्दू बिल्कुल जुदा दो भाषाएं बन गई हैं।... प्रचलित ठेठ हिंदी शब्दों का बहिष्कार और उनकी जगह अरबी, फारसी या संस्कृत शब्दों की भरमार भाषा-भेद का एक प्रधान कारण है। यह प्रवृत्ति पहले नहीं थी।’ 

जिस तरह हिंदी के झंडाबरदार उसकी प्रगति की राह में रोड़े अटकाते रहे हैं, उसी तरह उर्दू के हिमायती उसे आगे बढ़ने से रोकते रहे हैं। दोनों की पूरी कोशिश एक ऐसी भाषा गढ़ने की है जिसे कम से कम लोग समझ सकें यानी जो भाषा के उद्भव की बुनियादी शर्त के ही विरुद्ध हो। हमें भाषा की जरूरत इसलिए पड़ती है ताकि हम दूसरों के साथ संवाद कर सकें, उनकी बात समझ सकें और अपनी बात समझा


सकें। लगभग बारह-तेरह साल पुरानी बात है। मुझे पता चला कि इंडिया इंटरनेशनल सेंटर में उर्दू पर एक सेमिनार हो रहा है, जिसमें देशी-विदेशी विद्वान, कुछ राजनेता और हिंदी के जाने-माने साहित्यकार राजेंद्र यादव भाग ले रहे हैं। उत्सुकतावश मैं भी चला गया। 

सैयद शहाबुद्दीन समेत कई मुसलिम वक्ता बोले, जिनमें खुर्शीद आलम खां भी शामिल थे। मैं औरों की बात को काफी कुछ समझ गया, लेकिन खुर्शीद आलम खां का अधिकांश भाषण मेरे पल्ले नहीं पड़ा, क्योंकि वे इतनी अरबी-फारसी में लिपटी उर्दू बोल रहे थे जिसे समझना मेरे लिए संभव नहीं था। जब राजेंद्र यादव ने बोलना शुरू किया, तो उपस्थित उर्दूप्रेमी समुदाय ने टोका-टोकी शुरू कर दी। वापस आते हुए मैं पूरे रास्ते सोचता रहा कि क्या इसी रास्ते पर चल कर उर्दू तरक्की करेगी? 

मुझे आज तक समझ में नहीं आया कि खड़ी बोली के स्वभाव के विपरीत उर्दू वाले एकवचन को बहुवचन बनाते समय फारसी की नकल क्यों करते हैं? खुर्शीद आलम खां का पहला वाक्य ही था: ‘अभी आप हजरात ने जो तकारीर सुनी...’। और मैं सोचने लगा कि तकारीर की जगह तकरीरें क्यों नहीं कहा जा सकता, जो खड़ी बोली की प्रकृति के अनुरूप है। अक्सर आपने लोगों को ‘हालातों’ बोलते हुए सुना होगा। दरअसल, वे खड़ी बोली के स्वभाव के अनुसार हालात को एकवचन समझ कर उसका बहुवचन बनाते हैं। हिंदी और उर्दू संभवत: विश्व की अकेली ऐसी दो भाषाएं हैं, जिनका भाषिक आधार एक है। ‘मैं बाजार जा रहा हूं’ हिंदी का वाक्य है या उर्दू का? 

फिराक गोरखपुरी का कहना था कि भाषा क्रियापद के कारण अलग होती है और अगर किसी वाक्य में अधिकांश शब्द किसी दूसरी भाषा के हों, तो भी उसे उसी भाषा का वाक्य माना जाएगा जिस भाषा के क्रियापद का इस्तेमाल किया गया है। इस दृष्टि से हिंदी और उर्दू वास्तव में एक ही भाषा हैं। लेकिन यह भी वास्तविकता है कि उनका साहित्यिक और वैचारिक रूप एक-दूसरे से बिल्कुल भिन्न हो चुका है और अब घड़ी की सुइयों को पीछे नहीं घुमाया जा सकता। लेकिन इस बात की कोशिश तो की ही जा सकती है कि इन दो रूपों के बीच का फासला जितना कम किया जा सके, किया जाए। और इसके लिए हिंदीवालों और उर्दूवालों, दोनों को कोशिश करनी होगी। 

जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय में जब 1974 में भारतीय भाषा केंद्र खुला, तो उसमें हिंदी और उर्दू के दो प्रख्यात आलोचक- नामवर सिंह और मुहम्मद हसन- प्रोफेसर बन कर आए। उन्होंने जो पाठ्यक्रम तैयार किया, वह बेहद आधुनिक और लगभग क्रांतिकारी था। हिंदी के विद्यार्थियों के लिए उर्दू सीखना और उसके बेसिक कोर्स में उत्तीर्ण होना अनिवार्य था और उर्दू के विद्यार्थियों के लिए हिंदी का। आज भी शायद ही देश का कोई और विश्वविद्यालय हो जहां ऐसी व्यवस्था है। 

क्या उत्तर प्रदेश और बिहार जैसे राज्यों में पहली कक्षा से ही स्कूली बच्चों को हिंदी और उर्दू- दोनों भाषाएं नहीं पढ़ाई जा सकतीं? दोनों भाषाओं का ज्ञान ही उन्हें इस क्षेत्र की गंगा-जमुनी कही जाने वाली संस्कृति से परिचित करा सकता है। इस बात से शायद ही कोई इनकार कर सके कि उर्दू जानने वाले हिंदी लेखकों का गद्य बहुत साफ-सुथरा होता है, क्योंकि उसमें दोनों भाषाओं के शब्द इस तरह मिल कर आते हैं जैसे दूध में चीनी। प्रेमचंद, शमशेर और नामवर सिंह का गद्य इसकी मिसाल है। उर्दू की जानकारी के अभाव में हिंदी वाली ‘खुलासा’ और ‘खिलाफत’ जैसे शब्दों को उन अर्थों में इस्तेमाल करते जाएंगे, जिन्हें सुन कर उर्दू वाले गश खाकर गिर पड़ें। 


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