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अप्रासंगिक: सोचने की जिम्मेदारी PDF Print E-mail
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Friday, 12 September 2014 18:46

अपूर्वानंद

जनसत्ता, 7 सितंबर, 2014: ‘‘यह एक दिलचस्प संयोग है कि स्थापित व्यवस्था के प्राय: सभी पक्षों में सोचने का फिजूलपन एक तरह से मूल प्रतिज्ञा है। जातिप्रथा, नौकरशाही, गोहत्या विरोध, सांप्रदायिक दंगे- इन सबकी पकड़ हिंदुस्तानी नागरिक पर इसलिए है कि उसने सोचना फिजूल मान लिया है। विवेक की ओर हल्की कोशिश भी इन पर, यानी स्थापित व्यवस्था पर चोट करती है। उस समाज में जिसमें अधिकतर लोगों को सिर्फ अविवेक और अबुद्धि के कारण अमानवीय जिंदगी बिताने, ‘मनुष्य से एक दर्जा नीचे’ रहने को बाध्य होना पड़ता है, सोचने को फिजूल मानना (भले ही इस धारणा में कितना ही विद्रोह लटका हो) इस अमानवीयता का समर्थन करना है, स्थापित व्यवस्था को मुंहमांगा सहयोग देना है, उस सबके प्रति सहानुभूति रखना है, जो हमारे जीवन में मनुष्य विरोधी है।’’ 

तकरीबन पचास साल पहले अशोक वाजपेयी ने युवा लेखन की क्रांतिकारी मुद्रा के पीछे छिपी प्रतिक्रियावादिता का पर्दाफाश करते हुए विचारों से विदाई नामक लेख में यह लिखा था। जो लेखन ऊपर-ऊपर व्यवस्था पर आक्रमण करता हुआ दीखता है, दरअसल दकियानूसीपन से ग्रस्त है, स्त्री-विरोधी है और पुरुषत्व के अहंकार की अभिव्यक्ति है, यह अशोकजी ने तत्कालीन युवा कविता की पड़ताल करते हुए लिखा। 

सोचना सिर्फ लेखकों के लिए आवश्यक नहीं। बचपन से ही हमें बताया गया है कि मनुष्य अन्य प्राणियों से इस कारण अलग है कि वह सोचता है। वह विचारशील प्राणी है। लेकिन क्या यह बात आमतौर पर सही है? क्या सोचना मनुष्य के लिए इतना ही सहज है? क्या सभी समाज और समाज का हर सदस्य सोचने का काम करता है? उससे एक कदम आगे बढ़ कर इस पर विचार करना व्यर्थ न होगा कि क्या हर कोई सोचने को अपना दायित्व मानता है? 

सोचना स्वाभाविक क्रिया नहीं है। अगर सामाजिक घटनाओं का अध्ययन किया जाए और उनमें लोगों की भूमिका पर विचार किया जाए तो पाया जा सकता है कि प्राय: लोग सोचने से भागते हैं। सोचने में मेहनत लगती है। सोचने के लिए हमें अपने तात्कालिक परिवेश से बाहर निकलना पड़ता है। चीजों और घटनाओं के बीच के उस संबंध का उद्घाटन करना पड़ता है, जो हमेशा जाहिर नहीं होता। सोचने के क्रम में ऐतिहासिकता के बोध का उदय होता है और हम परिप्रेक्ष्य हासिल करते हैं। 

परिप्रेक्ष्य उपलब्ध करना इतना आसान नहीं। चित्रकला या कला मात्र के इतिहास से परिचित व्यक्ति को यह समस्या मालूम है। मनुष्य द्विआयामिता की अपनी सीमा का अतिक्रमण करके जिस दिन तीसरा आयाम उद्घाटित कर लेता है उस दिन से उसके लिए कई समस्याएं भी खड़ी होने लगती हैं। द्विआयामिता अगर एक बंधन है तो दूसरी तरफ उसमें इत्मीनान भी है। वह एक सुरक्षित घेरा है। इस पर हमने गौर नहीं किया है कि हमारे व्यक्ति बनने और आधुनिकता की यात्रा में परिप्रेक्ष्य की इस खोज ने कैसी भूमिका का निर्वाह किया है। 

परिप्रेक्ष्य को दूसरे शब्दों में गहराई भी कह सकते हैं। तीसरे आयाम ने मानवीय दृष्टि को गहराई दी। और दूरी का एक बोध भी। इसके बाद से ही हम सतहीपन को बुरा मानने लगे हैं और उसे हीनतर मानते हैं, जो मात्र सतह देख पाता है। 

तीसरे आयाम के बाद काल का एक चौथा आयाम भी उद्घाटित किया गया, जिसके बिना आइन्स्टीन का सापेक्षिकता का सिद्धांत संभव न था। यह मानवीय संज्ञानात्मकता को समझने के लिहाज से क्रांतिकारी आविष्कार था। काल या समय के आयाम की संवेदना के अभाव में दृष्टि संकुचित रहती है और समझ अपूर्ण। 

यह पूरा संघर्ष, जैसा क्रिस्टोफर टाइलर अपने एक निबंध में कहते हैं, प्रेरणा और रेखागणितीय विश्लेषण के बीच का संघर्ष है। थोड़ा सरलीकृत तरीके से कहें तो यह सहज बोध और विश्लेषणात्मक बुद्धि के बीच का संघर्ष है। मानवीय चिंतन के इतिहास में गणितीय या रेखागणितीय चिंतन को सर्वश्रेष्ठ माना जाता रहा है और ज्ञान का प्रत्येक क्षेत्र उस क्षमता को प्राप्त करने की स्पर्द्धा करता रहा है, लेकिन हम इतिहास से ही जानते हैं कि वह इतना आसान नहीं रहा है। 

परिप्रेक्ष्य के साथ ही एक अन्य महत्त्वपूर्ण बात है, दृष्टिकोण और दृष्टिपथ। दृश्यकला को इनके संबंध को ठीक-ठीक समझने में सदियों की यात्रा करनी पड़ी। क्या कलाकृति में एक ही केंद्रीय बिंदु होगा? और वह कहां होगा? केंद्रीय अगर है तो किसकी अपेक्षा? इस केंद्रीयता को प्राप्त करना जितना जरूरी था और उसके लिए जो संघर्ष किया गया उससे ज्यादा उस केंद्रीयता से मुक्ति प्राप्त करने के लिए। यह क्या आजादी है, लचीलापन है या असल में किसी केंद्रीय बोध का अभाव


है? 

बीसवीं सदी ने एक वचन की जगह परिप्रेक्ष्यों के संदर्भ का ध्यान रखना उचित समझा। इसे एक तरह से जटिलता के तत्त्व का प्रवेश भी कह सकते हैं। 

परिप्रेक्ष्य, दृष्टिकोण और विश्लेषण के बोध से युक्त व्यक्ति के लिए सोचना इतना सरल नहीं, उसमें समय लगता है और श्रम भी। इसी वजह से उसके लिए किसी चीज पर फैसला सुना देना इतना आसान नहीं रह जाता। आंख के बदले आंख, हाथ के बदले हाथ और जान के बदले जान का सिद्धांत इसी कारण अब स्वीकार्य नहीं लगता। यह भी अगर आपने आंख के आगे हत्या होते देखी भी हो तो आपका वर्णन ही उसके लिए जिम्मेदारी तय करने में आखिरी सबूत हो, आवश्यक नहीं। 

बीसवीं सदी के इतिहास ने ही बताया है कि जब-जब परिप्रेक्ष्यों, दृष्टिबहुलता, विश्लेषणात्मकता और जटिलता के प्रति हम उदासीन होने लगते हैं, तब-तब हम अपनी आजादी खोने लगते हैं। आश्चर्य नहीं कि सत्ता मात्र सरल व्याख्या के प्रति पक्षपाती होती है और निरंकुशता तब तक संभव नहीं जब तक हर व्याख्या बिल्कुल सतह पर न हो। सोचना इसीलिए मानवीय उत्तरदायित्व से जुड़ा मसला है और वह सरल नहीं है। अशोक वाजपेयी ने ठीक ही कहा था कि सोचना अपने आप में यथास्थितिवाद पर चोट करता है। सोचना हर किसी की जिम्मेदारी है। सोचना अगर अधिकार है तो जिम्मेदारी भी। इसे हम किसी और के हवाले नहीं कर सकते। 

यह विचारणीय है कि सोचने की बुनियादी इकाई क्या होगी? व्यक्ति, समुदाय या व्यापक अर्थ में समाज? व्यक्ति के बदले समाज, वह किसी भी प्रकार का क्यों न हो, क्या सोचने का यह काम कर सकता है? यह इसलिए भी कि सोचना एक नैतिक कार्य भी है। और सोचने के अपने परिणाम हैं। हर कार्य किसी विचार-प्रक्रिया का फल है। जब हम किसी कार्य को अविचारित कहते हैं तो क्या यह कहते हैं कि उस क्षण विचार स्थगित कर दिया गया था? या यह कि वह विचार, जो इस कार्य की ओर ले गया, दोषपूर्ण था? 

बीती सदी को जनसंहारों की सदी कहा जा सकता है। ध्यान करें तो मालूम होता है कि प्राय: हर धार्मिक और सांस्कृतिक समुदाय के अपने-अपने जनसंहार हैं। एक सदी पहले लाखों आर्मेनियायियों के, जो प्राय: ईसाई थे, जनसंहार की जिम्मेदारी अब तक तुर्की या इस्लामी दुनिया नहीं ले सकी है। यहूदियों के जनसंहार की याद को तो जीवित रखा जा सका है, लेकिन उसकी जिम्मेदारी हिटलर पर मढ़ कर पश्चिमी, ईसाई समाज ने अपनी आत्मा को समझा लिया है। इसका उत्तर अब तक वह नहीं खोज पाया है कि क्यों यूरोप यहूदियों को जगह नहीं दे पाया और क्यों उन्हें उसने अरबों पर थोप दिया। अब वे ही यहूदी फिलस्तीनी मुसलमानों के एक अधिक व्यवस्थित जनसंहार में लिप्त हैं और मजा यह कि सूए संहार कहने पर खफा हो उठते हैं। 

भारत को, और उसमें भी हिंदुओं को यह खुशफहमी रही है कि वे किसी भी अन्य समाज के मुकाबले अधिक मानवीय और उदार हैं। जयरुस बानाजी ने ध्यान दिलाया है कि हिंदुओं ने जनसंहार की पद्धति बदल दी है। छोटे-छोटे संहारों का एक सिलसिला है, जो आजादी के बाद से चला आ रहा है, जिसमें वे हमलावर रहे हैं। उनकी पूरी शृंखला मिल कर जनसंहारात्मक हो उठती है।

थियोडोर अडोर्नो और उनके मित्रों ने इस समस्या पर विचार किया कि जनसंहारों से कैसे बचा जा सकता है? उनका सुझाव है कि यह तभी संभव है, जब प्रत्येक व्यक्ति और व्यक्तियों के समूह के तौर पर समाज सोचने के कार्य को अनिवार्य माने। इसका आशय यह है कि कोई भी कदम सोचने की लंबी, श्रमसाध्य प्रक्रिया के बिना न उठाया जाए। सोचना अनिवार्य है और वह व्यक्तिगत जिम्मेदारी का मामला है, शिक्षा जब तक इस विचार को सहज बोध का अंग नहीं बना देती, अपना काम नहीं करती। 


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