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प्रसंग: काजर की कोठरी में धवल सयाने PDF Print E-mail
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Friday, 12 September 2014 18:44

सुधीर चंद्र

जनसत्ता, 7 सितंबर, 2014: हम अपनी कहानी कैसे कहते हैं वह हमारे बारे में बहुत कुछ बता देता है। उससे बहुत ज्यादा जो हम समझते हैं हम बता रहे हैं, और उससे बहुत अलग भी जो हम बताना चाह रहे हैं। बड़ा जोखिम का काम होता है आत्मकथा लिखना। हम बताने कुछ चलते हैं, बता बैठते हैं कुछ और। बेनकाब करने निकलते हैं दूसरों को, हो जाते हैं बेनकाब खुद। कुंवर नटवर सिंह की ‘वन लाइफ इज नॉट इनफ’ में कुछ ऐसा ही हो गया है। 

अफलातून के प्रसिद्ध कथन ‘अपरीक्षित जीवन जीने योग्य नहीं है’- से अपनी कहानी का श्रीगणेश कर, नटवर सिंह शुरू में ही हमें बता देते हैं कि वह सत्य और साहस के पुजारी हैं। कहीं बीच में कहते हैं कि वह असल भरतपुर वाले हैं, और अंत में घोषणा करते हैं: ‘मेरी शिराओं में मेरे पूर्वजों का रक्त प्रवाहित होता है।’ इसी के साथ, यह बताने के बाद कि राजाजी न्यूयार्क में उनके मेहमान रहे थे कुछ दिनों, नटवर सिंह कहते हैं: ‘मुझे विजडम धीरे-धीरे मिली; इसमें से कुछ निश्चय ही राजाजी की मारिफत आई।’ 

अब जबकि कोई व्यक्ति ‘वाइज’, सच्चा और साहसी होने का दावा करे और अपने लंबे सार्वजनिक जीवन का हमारे सामने परीक्षण करे तो उसकी अनदेखी तो नहीं होनी चाहिए। हुई भी नहीं। बड़ी चर्चा हुई इस किताब पर। पर सारी चर्चा सिमटी रही इस पर कि सोनिया गांधी के बारे में नटवर सिंह क्या कह रहे हैं। 

सच यह है कि कुछ विशिष्ट ब्योरों के अलावा इस किताब में कुछ भी ऐसा नहीं है, जो सोनिया गांधी के चरित्र, स्वभाव और उनकी राजनीतिक उपस्थिति के बारे में कोई नई रोशनी डालता हो। न ही उन ब्योरों में ऐसा कुछ है कि हाड़-मांस की जीती-जागती सोनिया गांधी का थोड़ा भी आभास करा दे हमें। 

अगर कोई दिखाई देता है जीता-जागता सोनिया के वर्णन के दौरान तो वह हैं खुद कुंवर नटवर सिंह। और जैसे वह दिखाई देते हैं सोनिया को हमें दिखाने के दौरान, वैसे ही अपनी पूरी कहानी में दिखाई देते रहते हैं। बड़ी भयंकर आलोचना है सोनिया की इस किताब में। पर गौर करने की बात यह है कि पूरी किताब में एक भी उदाहरण ऐसा नहीं है जब नटवर सिंह ने इशारे से भी सोनिया को जताया हो कि वे गलत काम कर रही हैं। अंदर ही अंदर जो भी सोचा हो- या आज सोचते हैं कि तब सोचा था- प्रसन्न वदन ठकुरसुहाती करते रहे। मसलन, यह बताने के बाद कि सोनिया गांधी ने कोई त्याग-व्याग नहीं किया था, अपने बेटे की जबरदस्त जिद की वजह से प्रधानमंत्रित्व छोड़ दिया था। नटवर सिंह बताते हैं कि उन्होंने एक दिन सोनिया से कहा कि इतिहास में सिर्फ दो लोगों ने ताज ठुकराया है और दोनों ही जन्म से इतालवी रहे हैं। सोनिया के पूछने पर कि दूसरा कौन था, नटवर सिंह ने कहा: ‘जूलियस सीज़र।’ 

मजे की बात यह है कि इस घटना का जिक्र करते हुए नटवर सिंह कहते हैं कि वे सोनिया की टांग खींच रहे थे। मान भी लें कि यही- या ऐसा भी- भाव था उनका, तो भी जिस तरह का रिश्ता दोनों के बीच उभर कर आता है इस किताब में, उससे यही लगता है कि सारी बात कुछ ऐसे अंदाज में कही गई होगी कि कहने वाला टांग खींच ले और सुनने वाले की प्रशंसा हो जाए। बरसों विदेश सेवा में रह कर इतनी कूटनीति तो आ ही गई होगी। 

आ ही नहीं गई थी, खासी महारथ भी हासिल हो गई थी। काफी जल्दी ही। 1969 की बात है। नटवर सिंह प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी की अफगानिस्तान यात्रा में उनके साथ थे। एक दिन इंदिरा गांधी इनको लेकर ड्राइव के लिए निकल पड़ीं। काबुल से कुछ मील दूर उन्हें एक भग्न इमारत दिखाई दी। पता लगा कि यह बाग-ए-बाबर है। इंदिरा गांधी बाबर की कब्र को देखने के लिए बढ़ लीं। कब्र के आगे मौन ध्यानमग्न होने के बाद उन्होंने नटवर सिंह से कहा: ‘इतिहास से आज मुठभेड़ हुई है मेरी।’ ‘और मेरी दो’, तपाक से बोले नटवर सिंह। ‘क्या मतलब?’ जवाब था: ‘भारत की महारानी के साथ बाबर को नमन करने का सौभाग्य मिला है मुझे आज।’ 

भारत की महारानी! कुछ ही साल बाद महारानी ने आपातकाल की घोषणा कर दी। नटवर सिंह उस वक्त लंदन में उप उच्चायुक्त थे। कोई वहां आपातकाल के पक्ष में कुछ सुनने को तैयार नहीं था। असंभव को संभव बनाने की कोशिश में लगे रहे नटवर सिंह उच्चायुक्त बीके नेहरू के साथ। जब आपातकाल हट गया तब लगा कि अपनी आत्मा को दबाए रहे थे उस दौरान। 

अपनी इस कहानी में भी, आज सैंतीस साल बाद, कह रहे हैं कि आपातकाल ही एक दौर है उनकी जिंदगी का जिसे वह गर्व से नहीं देख


सकते। इस पर अविश्वास किए बगैर, और बाकी कहानी के परिप्रेक्ष्य को ध्यान में रखते हुए, ऐसा महसूस होता है कि आपातकाल को लेकर हुई उनकी परेशानी खास गहरी है नहीं। सोचें तो यह तथ्य बहुत महत्त्वपूर्ण बन जाता है कि आपातकाल पर लिखा गया अध्याय शुरू ही होता है पीएन धर की पुस्तक, ‘इंदिरा गांधी, द इमरजेंसी ऐंड इंडियन डिमॉक्रेसी’, से एक लंबे उद्धरण से। यह कहते हुए कि इस विषय पर धर की पुस्तक सबसे ज्यादा प्रामाणिक और तथ्यगत है, नटवर सिंह इस उद्धरण के सहारे हमें समझाते हैं कि अगर इमरजेंसी का मतलब है उस सिद्धांत- कानून का शासन- का धीरे-धीरे संकुचित होना जो लोकतंत्र का आधार है, तो यह सिलसिला 26 जून, 1975 से बहुत पहले ही शुरू हो गया था। 26 जून को जो हुआ वह सिर्फ इतना था कि यह सिलसिला नाटकीय ढंग से लोगों की चेतना में आ टपका। पीएन धर इंदिरा गांधी के सलाहकार थे, और बहुत चतुर व्यक्ति थे। इससे कुशल पैरवी आपातकाल की हो नहीं सकती। 

नटवर सिंह किस चेतन या अवचेतन प्रेरणा से इस पैरवी से शुरू करते हैं अगर आपातकाल से वह वाकई संतप्त हैं? इसी संदर्भ में एक और महत्त्वपूर्ण तथ्य आता है उनकी कहानी में। 1981 के अंत में, जब वह पाकिस्तान में उच्चायुक्त थे, जिया-उल-हक के परेशान होने पर कि पाकिस्तान में चुनाव कराना बड़ी मुश्किल का काम था, नटवर सिंह ने जनरल जिया को समझाया था कि हिंदुस्तान में लोकतांत्रिक संस्थाएं सुचारु रूप से चल रही थीं चूंकि इंदिरा गांधी ने उन्हें मजबूत कर दिया था। 

इसे ही परीक्षित जीवन कहते हैं? एक ऐसी चेतना का विकास कि अपने सही होने की संभावना विपरीत से विपरीत स्थिति में भी सदा बनी रहे। जब मनमोहन सिंह के लंबे प्रधानमंत्रित्व का लेखा-जोखा करना हो तो सारी गलती मनमोहन सिंह की हो। (वह प्रारंभिक भूल नहीं, जब सारी स्थिति को भलीभांति समझते हुए भी वे प्रधानमंत्री बनने को तैयार हो गए। चूंकि इसी किताब के मुताबिक, मनमोहनजी ने तो ना-नुच की थी उस वक्त, लेकिन नटवर सिंह ने सही तर्क देकर समझा लिया था उन्हें।) तब दस जनपथ या और मंत्रियों की कोई जिम्मेदारी न हो। लेकिन जब नटवर सिंह का अपना मामला आ फंसे, और उन पर भ्रष्टाचार का आरोप लगे, तो एक ही अचूक तर्क हो: ‘कांग्रेस में कुछ भी नहीं होता बिना सोनिया गांधी की जानकारी और हामी के।’ 

2014 में हुई कांग्रेस की अभूतपूर्व पराजय हो तो जिम्मेदार ठहरें सोनिया गांधी। तब न मनमोहन याद आएं और न ही अपने समेत वे सब जो सोनिया गांधी को संभव बनाए हुए थे। संभव बनाए हुए थे सब कुछ न सिर्फ सहते हुए, बल्कि सराहते हुए भी।

यह कैसे हुआ और किस तरह के लोगों का होना जरूरी था ऐसा होने के लिए, इसका खासा अंदाज तो सभी को है। पर इसको नजदीक से होता हुआ देखना चाहें तो नटवर सिंह की आत्मकथा में घटित होते देख सकते हैं। उस लिहाज से यह केवल एक व्यक्ति की कहानी नहीं है, हमारे शासक वर्ग की कहानी है। पढ़े-लिखे वर्ग की भी कहानी है कमोबेश। याद दिलाती है गांधी की चेतावनी की कि अंगरेजों से निजात पाने के बाद एक नई लड़ाई छेड़नी होगी। देश के पढ़े-लिखे लोगों के खिलाफ लड़ाई।

वे जिन्हें याद है अफलातून का कथन, उन्हें अपने आप से लड़नी होगी यही लड़ाई। अपनी विजडम, अपने साहस और अपनी सच्चाई का हवाला देते हुए नहीं, अपने प्रति अतिरिक्त संदेह बरतते हुए। ऐसा किया तो यह न कर पाएंगे कि मौत के इंतजार में जीवन की नश्वरता की दार्शनिक व्याख्या करें और नरेंद्र मोदी से समय मांग कर मिलने जाएं, बगैर स्वीकार किए कि मोह और तृष्णा अब भी जमे बैठे हैं अंदर। 

नटवर सिंह की कहानी का समापन इसी तरह होता है। सो, जिज्ञासा होती है कि एक जिंदगी किस कारण से नाकाफी लगती है उन्हें। कौन-सी अतृप्त इच्छाएं पैदा करती हैं इस नाकाफियत का अहसास?

अचरज न करिएगा अगर इस कहानी को पढ़ते-पढ़ते आप अपने अंदर के नटवर को टटोलने लगें। 


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