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भाषा: चटकीले जुमलों की जादूगरी PDF Print E-mail
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Friday, 12 September 2014 18:39

प्रभु जोशी

जनसत्ता, 7 सितंबर, 2014: यह बात इस समय खासतौर पर ध्यान देने योग्य है कि जब जवाहरलाल नेहरू या सरदार पटेल देश से संवाद करने के लिए हिंदी में बोलते थे तो उनका हिंदी में बोलना किसी अप्रत्याशित घटना की तरह मीडिया में सुर्खियां नहीं बनता था। यहां तक कि इंदिरा गांधी के हिंदी बोलने पर भी तब के समाचार-पत्र न तो विस्मय प्रकट करते थे, न ही सराहनाओं की सुर्खियां गढ़ा करते थे। लेकिन अब यह चौंकाता है कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के हिंदी बोलने पर भारत के तमाम चैनलों और अखबारों में एक तह-ओ-बाल मच रहा है। 

सवाल है कि प्रधानमंत्री का हिंदी में बोलना अब खबर क्यों बन रही है? क्या यह परंपरा से हट कर की गई, कोई संविधान विरुद्ध कार्यवाही है? कहीं ऐसा तो नहीं हो गया कि पिछले डेढ़-दो दशक में हिंदी इतनी कठिन भाषा हो गई है कि देश का प्रधानमंत्री उसमें बोलने पर उत्तीर्ण घोषित किया जा रहा है, या फिर हिंदी में बोलने का अर्थ और अभिप्राय अंगरेजी में अनुत्तीर्ण होने की घोषणा है? सब जानते हैं कि हिंदी भारतीय संविधान की आठवीं अनुसूची की प्रथम भाषा है और उसमें अगर एक राष्ट्र-पुरुष अपने देश से संवाद कर रहा है, तो भला इसमें आश्चर्यजनक क्या है? इसमें न तो कोई उसकी स्तुति गायन की जरूरत है, न ही किसी किस्म की आलोचना की। क्योंकि वह देश के ‘अधिकतम लोगों से अधिकतम संवाद’ करने की इच्छा से भरा हुआ है। 

बहरहाल, प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के हिंदी बोलने पर मीडिया में उठते तह-ओ-बाल से कुल मिला कर, हमारे मीडिया की एक विशिष्ट-राजनीतिक दृष्टिकोण की पुष्टि भर होती है। वह दृष्टिकोण यह है कि भूमंडलीकरण के जरिए ‘उदारीकृत बनाए जा चुके भारत’ के लिए हिंदी एक अनावश्यक व्यवधान है और दुर्भाग्यवश ‘स्वतंत्र भारत’ में जन्मा यह मौजूदा प्रधानमंत्री उस नई और अघोषित भाषा-नीति में उलटफेर कर रहा है, जिसे शिकागो स्कूल के शातिरों ने सत्ता में आने के बाद लागू कर दिया था। क्योंकि भूमंडलीकरण की प्रक्रिया को गति देने में सर्वाधिक सफल उपकरण अंगरेजी ही रही है। 

इसीलिए पिछले दो दशकों में भाषा चिंतक भाषा की बहुलता को खतरनाक घोषित करते हुए एक ही भाषा, जो कि निस्संदेह भारत में अंगरेजी है, को भारत में ‘वैकासिक आधुनिकता’ का आधार मानते और बताते आ रहे हैं। नतीजतन, ऐसे में अचानक हिंदी की बात करना उपद्रवी होना है। निस्संदेह इसे पिछली सरकार के कारिंदों ने योजनाबद्ध तरीके से शिक्षा नीति में सफलता के साथ क्रियान्वित किया। उन्होंने प्राथमिक शिक्षा में से ही अंगरेजी की पढ़ाई को अनिवार्य करके, सर्वशिक्षा अभियान बनाम ‘एजुकेशन फॉर आल’ नहीं, इंग्लिश फॉर आल’ के अभीष्ट को पूरा कर दिखाया, जो अंतरराष्ट्रीय वित्त-संस्था की अघोषित कूटनीतिक शर्त थी। इसलिए पिछले दस-पंद्रह वर्षों में पल-बढ़ कर बड़ी हुई पीढ़ी के लिए सप्ताह के दिनों, रंगों, सब्जियों-फलों, पशु-पक्षियों ही नहीं, रिश्तों के भी हिंदी नाम अबोधगम्य और कठिन हो चुके हैं। उसने हिंदी में ‘डब’ की गई कार्टून फिल्मों के पात्रों से ही भाषा सीखी है। बच्चों की कार्टून फिल्मों को भारत में भाषा-विस्थापन के एजेंडे का पहला मोर्चा माना जाता है। 

जहां तक युवाओं की भाषा-स्थिति का प्रश्न है, उन्हें इलेक्ट्रॉनिक और प्रिंट मीडिया, दोनों ने अपने प्रसारणों और जीवन-शैली पर एकाग्र रंगीन परिशिष्टों ने यह बात पूरी तरह गले उतार दी है कि भारत में युवा होने का वास्तविक प्रमाण-पत्र है, पश्चिम की सांस्कृतिकता और अंगरेजी। ऐसे में उनकी भाषा, भूषा और भोजन तीनों बदल गए हैं। इसलिए आज ऐसी स्थिति बनी है कि युवा पीढ़ी भारतीय भाषाओं को आमतौर पर और हिंदी को खासतौर पर, नहाने-धोने, खाने-पीने, मौज-मस्ती भर की भाषा मानती हैं। यही अंगरेजी के साम्राज्यवाद की नीति है, जिसे मनोरंजन के जरिए सांस्कृतिक संहार कहा जाता है। 

नील पोस्टमेन ने इसे ‘आनंदवाद द्वारा दमन की सैद्धांतिकी’ कहा है। इसका इस्तेमाल अंगरेजी के विस्तारवादी एजेंडे ने अफ्रीकी भाषाओं को समाप्त करने में, ‘एफएम प्रसारण’ के जरिए ‘लैंग्विज विलेज’ (भाषा ग्राम) बना कर किया था। इस पीढ़ी को उन्होंने ‘विचारहीन विचार से भरी नकलची पीढ़ी’ की संज्ञा दी थी। नतीजतन, हिंदी को मसखरी के धंधे में कच्चे माल की तरह इस्तेमाल करते हुए,


अब ‘विचार की क्षमता से शून्य भाषा’ बताया और बनाया जा रहा है। 

मसलन, कोई गंभीर या अवधारणात्मक बात करनी हो, तुरंत अंगरेजी की शब्दावली की तरफ चले जाइए। जैसे हिंदी में उनके लिए कोई शब्द ही नहीं हैं। लेकिन मजेदार बात यह कि युवा पीढ़ी के पास ‘विचारधारात्मक चिंतन’ की जगह अब फंडे हैं। जुमले हैं। ऐसे जुमले जो कि ‘भाषा के खेल’ से बनते हैं। इनमें एक ‘मनोरंजनधर्मी’ ऐसी समासिकता होती है, जो बोलने के बाद श्रोताओं के बीच तालीकूट क्षण को उपस्थित कर देती है। 

बहरहाल, हमें यह मान लेना चाहिए कि मोदी जो भाषा बोल रहे हैं, वह आजादी के बाद पैदा हुए, प्रधानमंत्री बनने वाले युवा की भाषा नहीं है, बल्कि ‘उपभोगवाद’ और ‘पश्चिम की सांस्कृतिकता’ द्वारा उपनिवेशित बना दी गई, तीसरे दर्जे की घटिया ‘प्रतिलिपि-पीढ़ी’ की भाषा है, जिसमें चंद चुटीले और चटकीले जुमलों की जादूगरी है। वह विचारवान भाषा में अपने ‘चिंतन’ को रखने के बजाय, अंगरेजी के ‘फंडों’ और ‘जुमलों’ को उलट-फेर करते विज्ञापनों की ‘कॉपीराइटिंग’ वाली भाषा है। ‘स्कैम इंडिया’ नहीं, ‘स्किल इंडिया’ या ‘मेड इन इंडिया’ के बजाय ‘मेक इन इंडिया’ जैसे वाक्यांश किसी गहरी सामाजिक-आर्थिक वैचारिकी को प्रस्तुत नहीं करते, बल्कि ‘सामान्य विचारों के मिस्त्री’ की छवि का चित्र बनता है। ऐसे जुमले सिर्फ ‘तालीकूट’ किस्म की प्रभावोत्पादकता पैदा करते हैं। 

यह हमें जरूर चौंकाता है एक महान जनतांत्रिक राष्ट्र के ‘शिखर-पुरुष’ के पास ‘चिंतन-प्रधान भाषा’ का अभाव है और वह साम्राज्यवादी सत्ता को इस देश से उखाड़ फेंकने वाले पर्व पर इस शैली में अपना ‘राष्ट्र-संबोधन’ दे रहा है। निश्चय ही एक नीति-निर्माता की भाषा, जुमलों से नहीं, बल्कि स्पष्ट अवधारणाओं और एक सुचिंतित विचार-सारणी से बनती है। लेनिन, फिदेल कास्त्रो या चर्चिल जैसे विश्व नेताओं के स्तर वाले संबोधन, ‘बाजारवाद की बौराई भाषा’ से नहीं बनते। 

कुल मिला कर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की भाषा से एक बहुत साफ सूचना आती है कि हिंदी चिंतन के स्तर पर एक अक्षम भाषा है, और ज्यों ही आप काम की कोई सारवान बात करें तो तुरंत अंगरेजी की शब्दावली की तरफ मुड़ जाइए। इस भाषा में राष्ट्र-चिंतन संभव नहीं है। हमारे हिंदी-प्रेमी प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी भी जैसे ही अपने उद््बोधन में कुछ सारवान बात करने की तरफ बढ़ते हैं तो वे तुरंत विज्ञापनों की अंगरेजी-मिश्रित चुटीली और चटकीली भाषा को राष्ट्र-संबोधन का आसरा बना लेते हैं। 

दरअसल, इसमें किसी को आपत्ति नहीं होनी चाहिए। क्योंकि स्वतंत्रता दिवस के महान पर्व पर हमारे युवा हृदय-सम्राट प्रधानमंत्री लाल किले की प्राचीर से राष्ट्र के नाम, जो संबोधन कर रहे थे, वह राष्ट्र के लिए संबोधन कम लग रहा था। इसके उलट वह प्रत्यक्ष रूप से विकासशील देशों की बहुराष्ट्रीय कंपनियों के लिए आह्वान लग रहा था कि वे ‘विकास-व्याकुल’ भारतभूमि में आएं और अपने उत्पाद बनाएं। जी हां, ‘मेक इन इंडिया’। यह मुमकिन नहीं कि हमारे प्रधानमंत्री इस सार्वदेशीय सत्य से भिज्ञ न हों कि जब ये बहुराष्ट्रीय निगमें किसी ‘विकासातुर’ मुल्क में जाती हैं, तो वे वहां वस्तुएं नहीं बनातीं, बल्कि अपना ‘साम्राज्य’ बनाती हैं। 

वे ठीक कहते हैं, ‘अब हम किसी मुल्क में युद्धपोतों के साथ नहीं जाते, बल्कि भाषा और संस्कृतिके साथ जाते हैं और हम पाते हैं कि वे तो हमारे गुलाम बनने को बेताब हैं। क्या आप अपने प्रधानमंत्री की बेताब भाषा को सुन कर कुछ अनुमान लगा पा रहे हैं कि उनकी भाषा से क्या-क्या, कैसी-कैसी और कितनी-कितनी सूचनाएं बाहर आ रही हैं? 


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