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कभी-कभार: ‘उस शिखर-कगार पर...’ PDF Print E-mail
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Friday, 12 September 2014 18:35

अशोक वाजपेयी

जनसत्ता, 7 सितंबर, 2014: गजानन माधव मुक्तिबोध आधुनिक हिंदी साहित्य के सबसे अनोखे आश्चर्य हैं। पचास वर्ष पहले इसी सितंबर माह में सैंतालीस वर्ष की आयु पूरी करने के पहले, कई महीनों अचेत रहने के बाद, उनकी मृत्यु हुई थी। उनके जीवित रहते उनका कोई कविता संग्रह प्रकाशित नहीं हो पाया था। उनका पहला संग्रह ‘चांद का मुंह टेढ़ा है’ और हिंदी में आधुनिक क्लैसिक मानी जाने वाली उनकी लंबी कविता ‘अंधेरे में’ का प्रकाशन मरणोत्तर ही हो पाया। उनकी अनूठी आलोचना-पुस्तक ‘एक साहित्यिक की डायरी’ उनके अचेत रहते प्रकाशित हुई थी। यह सब तो दुस्संयोग हैं। पर पिछली आधी सदी में जिस एक लेखक की कीर्ति अक्षुण्ण बनी हुई है वह मुक्तिबोध हैं। ऐसी अक्षुण्णता किसी और हिंदी लेखक को मिली हो ऐसा याद नहीं आता। यह भी कि इस कीर्ति-रचना में मुक्तिबोध के व्यक्तित्व या मुखरता-दृश्यता की कोई भूमिका नहीं रही: उनकी उपलब्धि का व्यापक स्वीकार तब हुआ, जब वे उसे देखने को जीवित नहीं थे। 

मुक्तिबोध अनोखे दो अन्य कारणों से भी हैं। एक ऐसे दौर में, जिसमें विचारधारात्मक द्वंद्व बेहद तीखा और कई बार हिंसक तक हुआ है, उनकी मूर्धन्यता का सहज स्वीकार सभी ओर से हुआ। मुक्तिबोध के तथाकथित कैननाइजेशन में उनकी भूमिका भी पहलदार और महत्त्वपूर्ण रही है, जो उनकी वैचारिक दृष्टि से सहमत नहीं थे, उनके वैचारिक सहचरों के अलावा। शायद निराला के बाद मुक्तिबोध ही ऐसे दूसरे लेखक हैं जिन पर इतना दीर्घजीवी आलोचनात्मक मतैक्य, विचारधाराओं के आर-पार या उनके बावजूद, बना हुआ है। यह अक्सर निराश करने वाले हमारे आलोचना-परिवेश को उजला और दीप्त, आशा से आभान्वित करता है। 

हमारा समय ज्यादातर छोटी कविताओं का समय है। महाकाव्यात्मक कल्पना और दृष्टि अब प्रबंध आदि का रूपाकार नहीं लेती। इधर बहुमान्य त्रयी के दो अन्य कवियों अज्ञेय और शमशेर बहादुर सिंह ने अधिकांशत: छोटी कविताएं ही लिखी हैं। अज्ञेय की लंबी और प्रसिद्ध कविता ‘असाध्य वीणा’ का कलेवर मुक्तिबोध की सभी लंबी कविताओं से छोटा है। ऐसे समय में मुक्तिबोध ने अधिकतर लंबी कविताएं ही लिखीं। शायद मैथिली शरण गुप्त के बाद हिंदी में इतनी अधिक लंबी कविताएं किसी और ने नहीं लिखीं। मुझे निजी तौर पर पता है कि मुक्तिबोध अपनी कविताओं के लंबे होने को लेकर संकोच में रहते थे और कई बार अपनी कविताएं लंबाई के कारण संकोचवश पत्रिकाओं में नहीं भेजते थे। 

मुक्तिबोध को लेकर आश्चर्य तब और बढ़ जाता है, जब हम देखते हैं कि वे गोत्रहीन कवि थे: उनका न कोई पूर्वज है, न वंशज। उनके नाम का उपयोग कई कवि और उनके समर्थक, आलोचक अपनी वैधता बनाने या बढ़ाने के लिए भले करते रहे हों, हिंदी में आज एक भी कवि नहीं है, जिसे किसी गहरे और टिकाऊ अर्थ में उनका उत्तराधिकारी कहा जा सके। उनकी जैसी ‘सत्चित्वेदना’ भी और कहां है? मुक्तिबोध का एक अल्पलक्षित पक्ष यह भी है कि वे हिंदी के एकमात्र ऐसे कवि हैं, जिनका प्रेरणास्रोत अन्य कवि या कविता नहीं, उपन्यास थे। दशकों पहले मैंने यह प्रस्ताव किया था कि वे कविता में उपन्यास लिखने की चेष्टा कर रहे थे- ‘अंधेरे में’ कविता में टाल्स्टाय एक चरित्र हैं! इस अर्थ में वे हिंदी के अकेले औपन्यासिक कवि हैं। इतनी सारी बातें उन्हें उचित ही हिंदी साहित्य का अनोखा आश्चर्य बनाने के लिए काफी हैं। 

तीसरा क्षण

मुक्तिबोध ने कविता की रचनाप्रक्रिया पर लिखते हुए अपने प्रसिद्ध निबंध ‘सृजन के तीन क्षण’ में जो स्थापना की थी उस पर बाद में काफी बहस होती रही है। उनकी पुस्तक ‘एक साहित्यिक की डायरी’ में संकलित यह निबंध पहले-पहल हरिशंकर परसाई द्वारा संपादित पत्रिका ‘वसुधा’ में प्रकाशित हुआ था। इस पुस्तक की, मेरे जाने, सबसे पहली समीक्षा अंगरेजी में प्रसिद्ध बुद्धिजीवी और बाद में संपादक शामलाल ने मुक्तिबोध के निधन के ठीक एक सप्ताह पहले यानी 4 सितंबर, 1964 को टाइम्स आॅफ इंडिया के अपने विख्यात स्तंभ में ‘द थर्ड मूमेंट’ के शीर्षक से की थी। संयोगवश यह भी कि मुक्तिबोध पर उनकी मृत्यु के बाद पहला निबंध मैंने अंगरेजी में ‘हॉरर ऐंड होप आॅफ मुक्तिबोध’ के नाम से लिखा था और नवंबर 1964 को एक सभा में प्रस्तुत किया था, जिसमें अशोक मेहता, अज्ञेय, श्रीकांत वर्मा, अजितकुमार, नेमिचंद्र जैन आदि बीसेक लोग उपस्थित थे: यही बाद में हिंदी में ‘भयानक खबर की कविता’ नाम से प्रकाशित हुआ। 

मुक्तिबोध की स्थापनाओं की चर्चा करते हुए शामलाल ने काफ्का, पाल रिवर्दी, कोलरिज और रेने शा के प्रासंगिक उद्धरण भी दिए थे। उन्होंने लिखा था कि ‘मुक्तिबोध बहुत संकोचशील हैं, इसलिए कला का कोई दर्शन विन्यस्त नहीं करते और इतने समझदार हैं कि उन्हें पता है कि ऐसा करना एक अनुर्वर चेष्टा ही होगा।’ वे मुक्तिबोध के अकेलेपन को लक्ष्य करते हुए यह भी देख पाते हैं कि ‘वे इतने एकांतवासी नहीं हैं कि अपने को जिंदगी से काट लें और इस तरह अपनी वासना की आग को और दहकाएं।’ 

किसी फूल को देखते हुए मुक्तिबोध कभी भी उस खाद को नजरअंदाज नहीं करते जिससे कि वह पोषण पाता है। उन्हें कविता का रहस्य तब तक समझ में नहीं आ सकता, वे सोचते हैं, जब तक कि वे कवि के


अनुभव के दलदल और कविता के पंकज के बीच ठीक-ठीक संबंध न समझ लें। इसलिए वे अपने से बहस करते रहते हैं। उनका आत्मसंशय ही काव्यसौंदर्य को समझाने की उनकी चेष्टा को मोहक बनाता है। वे एक अथक प्रश्नवाची लेखक हैं, जो जानते हैं कि अक्सर जो उत्तर दिए जाते हैं वे ‘असंगत, दूषित और अयुक्तियुक्त’ होते हैं। शामलाल देख पाए थे कि मुक्तिबोध लगभग असाध्य ईमानदारी, आत्मसंशय और हमारे आसपास की सच्चाई की निर्मम पहचान थे। उस डायरी में जिस मित्र से वे संवाद करते हैं वह सचमुच का कोई व्यक्ति नहीं, उन्हीं के आत्म का दूसरा पक्ष है। 

सृजन के तीन क्षणों को आज मुक्तिबोध के संदर्भ में एक और तरह से भी देखा जा सकता है। पहला क्षण था, जब वे जीवित और सक्रिय थे। दूसरा क्षण, जो उनके जीवन जितना लंबा हुआ, उनके देहावसान के बाद और उनकी पुस्तकों के प्रकाशन के बाद चलता रहा है। अब तीसरा क्षण है- मुक्तिबोध पर पुनर्विचार का। दुनिया, सच्चाई, भाषा, साहित्य सब बदल गए हैं- मुक्तिबोध का अर्थ और उनकी अंतर्ध्वनियां भी बदली होंगी। उन्हें समझने का तीसरा क्षण आ गया है। 


नागरिक चौकसी

कई मित्रों ने इस बात को लक्ष्य किया है कि बरसों साहित्य और भाषा को लेखक की पर्याप्त नागरिकता मानने का आग्रह करने के बाद इधर कुछ बरसों से मेरा रुख बदला है। मुझे लगने लगा है कि ऐसे समय या दौर होते हैं जब साहित्य की पर्याप्त नागरिकता को बरकरार रखते हुए कुछ अतिरिक्त नागरिक सक्रियता की दरकार होती है। दूसरे शब्दों में, साहित्य को नहीं, लेकिन साहित्यकार को अपनी नागरिक भूमिका साहित्य के अलावा भी कुछ सक्रियता, कुछ मुखरता, कुछ हस्तक्षेपकारी ढंग से निभाना जरूरी हो जाता है। इसका एक कारण यह भी है कि जैसे-जैसे एक साहित्यकार सार्वजनिक रूप से मान्य और दृश्य होता है वैसे-वैसे उससे यह अपेक्षा लगभग स्वाभाविक हो जाती है कि वह सीधे भी कभी-कभी ज्वलंत मुद्दों पर अपनी राय जाहिर करे और जब-तब उनका पक्ष भी सामने लाए, जिन्हें ऐसा करने का अवसर प्राय: नहीं मिल पाता। 

इस स्थिति के कुछ खतरे अवश्य हैं। हर हालत में लेखक को प्रवक्ता बनने से बचना चाहिए: न तो अपना, न ही किसी और दल या विचारधारा आदि का। इसका अर्थ यह नहीं है कि उसकी कोई वैचारिक निष्ठा नहीं होती: होती है, वह उसको रूपायित करता है, खोजता और विन्यस्त करता है, पर उसका प्रवक्ता नहीं बनता। दूसरा खतरा यह है कि लेखक को कुछ नेतृत्व करने का प्रलोभन होने लगे। तीसरा यह कि वह इस ज्यादा लोकलुभावन काम में कुछ इतना लग जाए कि उसे अपना बुनियादी काम यानी साहित्य रचना अनावश्यक लगने लगे। चौथा यह कि अक्सर सार्वजनिक बुद्धिजीवी अपनी ऐसी छवि में गिरफ्तार हो जाते हैं कि उन्हें अपने सोचे-कहे पर कभी कोई संदेह नहीं होता। लेखक आत्मसंशय से कभी मुक्त नहीं होते: बुद्धिजीवी अपने संशय अतिक्रमित करते हैं या कम से कम उन्हें छिपाते या अव्यक्त रहने देते हैं। इसलिए एक अनिवार्य अंतर्विरोध स्थिति में उभरता है। सजग और जिम्मेदार लेखक इन खतरों से आगाह रहता है और समझ और साहस के साथ उनके चंगुल में आने से बचने की ईमानदार कोशिश करता है। 

एक खतरा यह भी होता है कि ऐसा लेखक, फिर भी, इस सांसत में फंस जाए कि लोग उसके रुख, राय या विचार पर अधिक ध्यान देने लगें बजाय उसके साहित्य के। हिंदी समाज में यह खतरा सबसे ज्यादा है, क्योंकि इस समाज में साहित्य और लेखक ध्यानाकर्षण की चीजें नहीं हैं। हिंदी मीडिया भी कई बार एक लेखक की राय जानने-छापने में अधिक दिलचस्पी लेता है, बजाय उसकी कोई रचना छापने या उसकी किसी पुस्तक पर बहस करने के। दुर्भाग्य से हमारा समय धीरे-धीरे सनसनीखेजी का होता गया है: उसमें धीरज, संयम, उद्यम सभी की कमी है और उनकी अवहेलना करने से वह नहीं चूकता। इसलिए खोज, अन्वेषण, पड़ताल आदि का महत्त्व कम होता गया है और राय, मत-मतांतर की जगह और आकर्षण बढ़ता गया है। 

मीडिया की हरचंद यह कोशिश होती है कि कोई लेखक किसी मुद्दे पर कोई सनसनी फैलाने वाली बात कह दे और उसे लेकर हंगामा हो जाए। जयपुर साहित्य समारोह, सलमान रुश्दी आदि को लेकर ऐसी सनसनी फैलाई जाती रही है। इतने भर से तसल्ली की जा सकती है कि लोग लेखक की बात सुनते तो हैं, उसके साहित्य के माध्यम से नहीं, उसके वक्तव्य के जरिए।  


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