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पुस्तकायन: स्त्री की उलझनें PDF Print E-mail
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Friday, 12 September 2014 18:32

अजितकुमार

जनसत्ता 7 सितंबर, 2014: प्रचंड स्त्री-विमर्श के इस युग में जहां ‘स्त्री-सुबोधिनी’ की मानसिकता को नकारने वाली ‘स्त्री-काल’ जैसी चुनौतियां आए दिन सामने आ रही हैं, वहीं बर्बर ‘निर्भया कांड’ से क्षुब्ध जन-मानस का उपहास करते बलात्कारी कुछ इस ढब से सक्रिय हो उठे हैं मानो ललकार रहे हों कि ‘तुम जितना सिर उठाओगी, उतना ही हम तुम्हें कुचलेंगे’। समाज और मानसिकता के इस द्वंद्व के बीच, उषा प्रियंवदा का नया उपन्यास नदी नारी-जीवन ही नहीं, मानव-संबंधों की भी कई परतें उलटने-पलटने के क्रम में, हमें सोचने को विवश करता है। 

स्त्रीवादी राजनीति इस विषय में कब-क्या रुख अपनाएगी- यथास्थितिवादी कि क्रांतिकारी? यह तो अनिश्चित है, पर हिंदी की वरिष्ठ और प्रबुद्ध लेखिका उषा प्रियंवदा का ताजा उपन्यास ‘नदी’ अपने कथ्य में स्पष्ट और असंदिग्ध प्रतीत होता है। 

उनकी गिनती यों तो शिक्षित मध्यवर्गीय नारी-जीवन का चित्रण करने वाली लेखिकाओं में होती रही, पर अंगरेजी साहित्य की मर्मज्ञ होने और परवर्ती जीवन का अधिकतर हिस्सा अध्यापन करते हुए अमेरिका में बिताने के कारण वे हिंदी लेखकों की उस बिरादरी का हिस्सा भी समझी जा सकती हैं, जिसने हिंदी-लेखन को प्राथमिकता देते हुए भी अपने भावबोध को अंगरेजी या पश्चिमी साहित्य के अध्ययन द्वारा समृद्ध किया। इस लिहाज से अगर कोई अपनी धरती या सभ्यता-संस्कृति में रचे-बसे लेखकों और पश्चिमाभिमुख लेखकों के बीच फर्क करना चाहे तो अनुमान है, वह एक अलग तरह की पड़ताल होगी, जिसमें उषा प्रियंवदा कहीं बीच में स्थित नजर आएंगी। कारण यह कि ‘नदी’ समेत उनके अन्यान्य लेखन में भी देस और परदेस दोनों गुत्थमगुत्था नजर आते हैं। 

‘नदी’ की नायिका ‘गंगा’- जिसका पूरा नाम ‘आकाशगंगा’ है- समग्र नारी-जीवन की आवृत्तिमूलक विडंबना-संभावना का प्रतीक या बिंब जैसा बन कर सामने आती है। दांपत्य और मातृत्व के खिंचाव से वह परदेस छोड़ ‘घर’ लौटने और फिर अनचाही दैहिक स्थिति के कारण घर-बार-परिवार छोड़ शेष जीवन ‘बाहर’ बिताने को ‘विवश’ होती है- बहुत कुछ इसलिए भी कि वहां उसके लिए घुटन और अपयश से बच कर, खुले में सांस लेने की ‘गुंजाइश’ हो सकती थी। 

‘नदी’ उपन्यास इस प्रश्न को भी नए सिरे से उठाता है कि क्या औरत प्रथमत: और अंतत: देह भर बनी रहे या उसके मन-जीवन को भावना, आत्मनिर्णय, स्वेच्छा, स्वाधीनता जैसे सरोकार भी छू और रच सकते हैं? हम उपन्यास के इस सवाल से भी रूबरू होते हैं कि क्या औरत हर हाल में, जन्म से लेकर अंत तक, औरों को खुश करने-रखने के लिए ही ‘अभिशप्त’ है? शैशव में माता-पिता, बाल्यावस्था में भाई-बंधु-परिवार, किशोरावस्था में आस-पड़ोस या भ्रमरवृंद, युवावस्था में पति-प्रेमी-परिवेश, प्रौढ़ावस्था में बाल-बच्चे और वृद्धावस्था में देवी-देवता-परमेश्वर...? वहीं इसी से जुड़ा यह सवाल भी परेशान करने वाला है कि क्या औरत की जिंदगी का हर मोड़ उसकी ‘स्वाधीनता’ के वास्ते जद्दोजहद का एक नया पड़ाव बन कर नहीं उभरता? 

जिंदगी भर औरत की यह तलाश कि वह सहज, सरल, स्वाभाविक, स्वतंत्र जीवन बिता सके, क्या इन अलग-अलग पायदानों पर चढ़ चुकने के बाद ही पूरी हो पाती है? ये तमाम सवाल उठाने के साथ-साथ ‘नदी’ में वर्णित आकाशगंगा की कहानी जहां ‘परितृप्त’ मातृत्व से स्फूर्त संजीवनी-शक्ति को बखानती है, वहीं विषम व्याधियों को चुनौती देते ‘आधुनिक चिकित्सा-विज्ञान की नित नूतन प्रगति’ का शंखनाद भी सुनाती है। 

समाज में स्त्री की भूमिका ऐसा विषय है, जो घूम-फिर कर अधिकतर रचनाओं के बीच से अपनी कोई न कोई शक्ल झलकाता ही रहता है, यहां तक कि वह तथाकथित राजनीतिक या बौद्धिक सरोकार पर केंद्रित रचनाओं में भी बहुधा अपने पांव पसार देता है। खुद उषा प्रियंवदा के भी लेखन में इसकी मौजूदगी अक्सर चुभने की हद तक परेशान करती है। 

उषाजी ने इस उपन्यास से पहले भी महत्त्वपूर्ण लेखन किया था, पर ‘नदी’ की परिधि और व्यापकता को ध्यान में रखते हुए अब कहा जा सकता है कि पहले के दौरों में निर्मित-निरूपित-प्रचारित त्रिवेणियों में जिस तरह विवाद-सम्मेलन-निकासी की बहुतेरी गुंजाइश बाकी रह गई होगी, उसी तरह कथा लेखिकाओं की नव-घोषित ‘तिकड़ी’ (कृष्णा सोबती-मन्नू भंडारी-उषा प्रियंवदा) को भी शायद उतना ही विवादित बताया जाएगा, जितना सूर-तुलसी-जायसी वाली त्रिवेणी में से ‘कबीर’ को छोड़ दिए जाने पर या बच्चन-दिनकर-नरेंद्र की त्रयी से ‘सुमन’ और ‘अंचल’ को बाहर रखने पर या देव-बिहारी-भूषण में ‘मतिराम-रसखान-घनानंद’ को शामिल न करने पर या छायावाद की ‘त्रयी’ के क्रमश: ‘कवि चतुष्टय’ की भांति उभरने के बाद ‘वर्मा त्रयी’ में रिक्त हुए स्थान को ‘चंद्र प्रकाश वर्मा’ या किसी अन्य ‘वर्मा’ द्वारा भरे जाने पर या ‘महिला त्रयी’ में उषादेवी मित्रा या उन ‘चंद्रकिरण सौनरिक्सा’ के रखे न रखे जाने पर- जिन्हें उनके पति कांतिचंद्र सौनरिक्सा ने


एक समय प्रेमचंद से ‘मीलों आगे’ बढ़ा हुआ घोषित किया था। 

संक्षेप में, कहना यह होगा कि अनेक उद्देश्यों-प्रयोजनों से प्रेरित ऐसे उद्घोष-निर्णय या समीकरण कुछ समय की साहित्यिक चर्चाओं के वास्ते चटपटा मसाला भले जुटा देते हों पर जिस तरह हिंदी कविता की ‘सप्तक’ शृंखला में अक्सर चूकों या अंतरालों को इंगित किया गया, उसी तरह, किसी भी युग में, कम से कम साहित्य के क्षेत्र में, किन्हीं एक-दो-तीन-पांच-सात का चयन करना उसी तरह भ्रामक या विवादास्पद सिद्ध हो सकता है, जिस तरह अज्ञेय के साथ शमशेर-मुक्तिबोध को रखा जाना या भवानी के साथ नागार्जुन-शील जैसों को शामिल करना! 

इससे कहीं बेहतर होगा कि विस्मरण की जो लंबी परंपरा विभिन्न कलाओं में सदा से लक्षित होती आई है, उसमें यह आवश्यक फेर-बदल होता रहे कि हर बार अपनी रुचि का संधान प्रत्येक व्यक्ति, युग या समाज को उन्मुक्त रूप से उपलब्ध रहे, पहले के निर्णय मौजूद भले हों, पर वे किसी तरह की बाध्यता को प्रश्रय न दें। अपने आप में, यह मानने योग्य बात है कि साहित्यिक विवेचन, विश्लेषण और निर्णय किसी भी संदर्भ या परिप्रेक्ष्य से बंधे नहीं होते, वे उनके आलोक में बदलते रह सकते हैं। 

‘नदी’ की मूल स्थापना यही प्रतीत होती है कि नारी को अपनी आंतरिक स्वाधीनता का पथ खुद खोजना और बनाना पड़ता है, लेकिन साथ ही इसमें यह अंतर्धारा आदि से अंत तक चलती रहे, आश्वस्त भी करती है कि जिस तरह गर्भ-निरोध की भरोसेमंद विधियां नारी-मुक्ति में बहुत सहायक हुर्इं, उसी तरह आधुनिक चिकित्सा विज्ञान भी नारी के स्वाधीनता संघर्ष के समांतर बढ़ता हुआ नई से नई प्रणालियों-पद्धतियों का संधान करता हुआ असाध्य समझे जाने वाले रोगों के उपचार में समर्थ हुआ है और यह प्रक्रिया निरंतर अग्रसर होती हुई मानवीय सुख-शांति-सुरक्षा में योग दे सकेगी। 

इस उपन्यास का शीर्षक उस परिपूर्णता की ओर संकेत करता है, जो नदी के उद्गम से उसके विलय तक और वहां से पुन: वाष्प रूप धर पहाड़ के शिखर पर हिम बन अंतत: नदी की समूची यात्रा पुन: पुन: करती हुई न केवल जीवन की अनंतता को रेखांकित करती है, बल्कि संख्यातीत आकाशगंगाओं की विद्यमानता का आश्वासन देती हुई नन्हे-नन्हे कार्यकलापों में बंटे-बिखरे जीवन सूत्रों के बीच मौजूद वैश्विक तारतम्यता का आभास भी कराती है। 

अगर ‘महिला लेखन’ को अलग इकाई की भांति स्वीकार किया जाए जो प्रवासी लेखन, दलित लेखन, अंगबाधित लेखन, अहिंदीभाषी हिंदी लेखन जैसी विभिन्न इकाइयों के दावों को देखते हुए सर्वथा वैध और न्यायसंगत दावा माना जा सकता है, तो ‘नदी’ उपन्यास निस्संदेह उषा प्रियंवदा को उनकी प्रत्यक्षत: स्वदेश में अल्प उपस्थिति के बावजूद, आज सतत और निरंतर लेखनरत महिलाओं की प्रथम पंक्ति में अनिवायर्त: ला खड़ा करता है। 

इससे और कुछ चाहे सिद्ध हो, या न हो; इतना अवश्य प्रकट होता है कि सार्थक लेखन लंबी ‘मैराथन दौड़’ जैसा होता है, न कि फूल कर तत्काल फट जाने वाले गुब्बारे जैसा। भले विस्मय, कुतूहल या आवेग की परितृप्ति पचास-सौ मीटर की दौड़ द्वारा अधिक होती हो, पर पलीता लगते ही भड़क उठने वाला पटाखा वैसी मार कभी नहीं कर सकता, जैसी रणक्षेत्र में बिछाई गई लैंडमाइन कर सकने में समर्थ होती है। माना कि हथगोला किसी सीमित उद्देश्य को प्रभावकारी रीति से संपन्न कर सकता है, पर बड़ी लड़ाइयां केवल व्यवस्थित और सांगोपांग रणनीति के बूते लड़ी और जीती गई हैं। 

इसका यह मतलब कदापि नहीं कि लेखन कोई लड़ाई भर है या कोई दुस्साध्य गंतव्य; पर यह जरूर कि उसका दमदार होना बहुधा लंबी और निरंतर साधना पर निर्भर करता है। फिर भी, इस विषय में कोई भरोसे का नियम कदापि नहीं बनाया-बताया जा सकता। वैचारिक और शैक्षणिक अनुशासन से समृद्ध उषा प्रियंवदा की रचनात्मक क्षमता ने निश्चय ही हिंदी-कथासाहित्य को समृद्ध किया है। 


नदी: उषा प्रियंवदा; राजकमल प्रकाशन, 1-बी, नेताजी सुभाष मार्ग, दरियागंज, नई दिल्ली; 350 रुपए। 


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