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स्मरण: अनंतमूर्ति का जाना PDF Print E-mail
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Friday, 12 September 2014 18:15

कृष्णनाथ

जनसत्ता 31 अगस्त, 2014: अनंतमूर्ति से मेरा साथ प्राय: पचास वर्षों से अधिक का प्रत्यक्ष-अप्रत्यक्ष रूप से था। वह सहसा छूट गया। वैसे उनके अस्वस्थ होने की सूचना उसी दिन ‘द स्टडी’ में मिली। लेकिन वे अरसे से अस्वस्थ-स्वस्थ चल रहे थे। तो ‘आकाशवाणी’ से रात को उनके देहांत का समाचार पाकर जो दुख हुआ उससे अभी तक उबर नहीं पाया। इस बीच उनका पार्थिव शरीर चिता पर शांत हो चुका है। फिर भी...

इस क्षण उनकी अनेक स्मृतियां जीवित-जाग्रत हो रही हैं। मेरा उनका परिचय समाजवादी आंदोलन के क्रम में 1950 की दहाई से है। सूत्र हमारे उनके वरिष्ठ साथी शांतवेरि गोपाल गौड़ा थे। उनका नाम मेरे लिए शिमोगा से जुड़ा हुआ है। वैसे वे कर्नाटक में जाने-माने जाते हैं। बंगलुरु स्थित विधान सौधा के निकट उनके नाम पर ‘गोपाल गौड़ा सर्किल’ भी उनके निधन के पश्चात चिह्नित है। गोपाल गौड़ा हमारे काशी-विद्यापीठ स्थित आवास में अनेक बार ठहर चुके हैं। और विशेषकर बिहार के समाजवादी आंदोलन की गुत्थियों को समझने और सुलझाने में सत्तर की दहाई में बदरी विशाल पित्ती के साथ संलग्न रहे हैं। अब तो स्मृतिशेष हैं। 

अनंतमूर्ति का प्रारंभिक जीवन संघर्ष शिमोगा में उनकी सन्निधि में उभरा। कहते हैं कि एक उपन्यास में, शायद ‘अवस्थे’ में, उनकी छाया है। जो हो, प्रसिद्धि तो ‘संस्कार’ के चलते मिली। उस पर साथी पट््टाभिराम रेड््डी ने फिल्म भी बनाई। स्नेहलता रेड््डी ने उस फिल्म में नायिका की भूमिका निभाई। गिरीश करनाड ने परमेशाचार्य की। डॉक्टर राममनोहर लोहिया ने इसे बनाने की प्रेरणा दी, ऐसा भी उन दिनोें सुनने में आया। अब उसकी पुष्टि करने वाला कौन है? 

शिमोगा-सिरसी मेरे लिए बंगलुरु में प्रवास करते बीस वर्ष से भी अधिक होने पर सुदूर बने हुए हैं। मेरा अनंतमूर्ति का प्रत्यक्ष साथ, शिमोगा का नहीं, उडुपि का है जो उनका मूल स्थान है। इसलिए उडुपि; पिता का नाम राजगोपालाचार्य; उनका नाम अनंतमूर्ति, अंगरेजी संक्षेप में, यूआर अनंतमूर्ति। उडुपि में हमारे उनके उभय साथी डॉक्टर मुरारी बल्लाल ने कृष्णमूर्ति कन्नड़ ‘गैदरिंग’ का आयोजन किया। उसमें शरीक होने के लिए बंगलुरु से मेंगलोर हमने श्रीमती येस्टर-डॉ. अनंतमूर्ति के साथ यात्रा की। मेंगलोर हवाई अड््डे पर उतरने पर अपने भूखंड में अनंतमूर्ति ने मेरा स्वागत किया। हमने अपने मित्रों- डॉक्टर सुषमा-सतीश इनामदार, राघवेंद्र राव, नागभूषण स्वामी, कृष्ण कुलकर्णी और अन्य के साथ ‘गैदरिंग’ में भाग लिया। 

सम्मेलन तो हो गया। फिर, अनंतमूर्ति ने संकोच से कहा कि यहां आने के पहले उनकी बेटी ने आग्रह किया है कि उडुपि जा रहे हैं तो अपने कुल देवता के मंदिर में भगवान विष्णु का दर्शन करते आएं। उसके पहले उनके हृदय रोग की ‘सर्जरी’ हो चुकी थी। उन्होंने पूछा कि क्या मैं साथ चल सकूंगा? मेरा वापसी का हवाई टिकट वगैरह बंगलुरु में ही ‘बुक’ हो चुका था। फिर भी मुझे लगा कि टिकट क्या चीज है? यह तो हो सकता है। तो ‘गैदरिंग’ के विसर्जन के बाद हम लोग मणिपाल विश्वविद्यालय के निकट उनके मूल गांव के मंदिर गए। अनंतमूर्ति अपनी पत्नी श्रीमती येस्टर के साथ थे और डॉक्टर मुरारी बल्लाल तो संयोजक थे ही। 

मंदिर तो जैसा गांव का होता है वैसा था, पर उस मंदिर के बाहर अनेक पत्थर की नाग प्रतिमाएं बेतरतीब जमा थीं। मंदिर के पास सर्प प्रतिमाएं! पुजारी ने बताया कि उन्हें एक बार हटा कर साफ-सूफ करने की चेष्टा की तो सचमुच का सर्प फन काढ़ कर खड़ा हो गया! तब से वे पत्थर की सर्प प्रतिमाएं वैसे ही पड़ी हैं। श्रीमती येस्टर ने कहा कि यह महज संयोग हो सकता है। इस पर मुझे सूझा कि सारा जीवन संयोग मात्र है, कहीं नदी-नाव संयोग, कहीं कुछ और। 

गांव के प्रधान को यह खबर थी कि अनंतमूर्ति आ रहे हैं। तब तक लेखक के रूप में उनकी ख्याति हो ही चुकी थी, तो उन्होंने अपने घर दोपहर का भोजन करने का निमंत्रण दिया। सत्कारपूर्वक उडुपि का सुस्वादु भोजन केले के पत्ते पर कराया, ताजा पान-तांबूल खिलाया, आदि। 

मूर्ति पूजा में कोई आस्था न होने पर भी इस यात्रा-प्रसंग से हम कैसे साथ जुड़े? यह आज भी मेरे लिए अबूझ रहस्य है। 

उडुपि प्रवास में ही वहां के प्रसिद्ध कृष्ण मंदिर में पूज्य पेजावर स्वामी की अध्यक्षता में एक सार्वजनिक सभा का आयोजन हुआ। निकट के कुद्रेमुख पहाड़ और उससे जुड़ी भूमि में शायद जापानी कंपनी को खनन का अधिकार सरकार ने दे दिया था। इससे कुद्रेमुख का परिसर नष्ट होने वाला था। यह पश्चिमी घाट की जैव विविधता की बड़ी हानि होती। इसके विरोध में मंदिर के परिसर में यह सभा थी। उसे डॉ. अनंतमूर्ति के साथ मैंने भी संबोधित किया। सभा के पूर्व या पश्चात, ठीक याद नहीं, पेजावर स्वामी ने अनंतमूर्ति का और मेरा तो अभिनंदन किया ही, श्रोताओं में से बुलवा कर श्रीमती येस्टर अनंतमूर्ति को शाल प्रदान कर आशीर्वाद दिया। अनंतमूर्ति इससे बड़े प्रसन्न थे कि मैंने लड़ाई जीत ली। उडुपि में कृष्ण मंदिर में स्वामीजी उनकी ईसाई मूल की पत्नी को सम्मानित करें, यह उनकी समाज में स्वीकृति है। जो हो, कुद्रेमुख खनन का जो विरोध प्रारंभ हुआ वह इतना कारगर हुआ कि वह अंतरराष्ट्रीय करार रद हो गया और पर्यावरण बचा रहा। 

ऐसे ही, जहां माध्वाचार्य का जन्म स्थान है वहां ‘ग्रेनाइट’ की बेहिसाब खुदाई-ढुलाई चल रही थी। अनंतमूर्ति वहां प्रवास कर रहे थे। उन्हें यह देखते न बना। लगा कि इन पत्थरों पर माध्वाचार्य चले होंगे, इन पर उनका पवित्र स्पर्श अंकित है। इसे कमाई के लिए खोद कर उस पवित्रता का ही नाश किया जा रहा है। उन्होंने इस बाबत डीसी को कहा। उन्होंने नहीं सुना। तो डॉ. अनंतमूर्ति ने अपने साथी मुख्यमंत्री जेएच पटेल को लिखा। उन्होंने तत्काल वह खनन रुकवा दिया। और माध्वाचार्य की वह स्थली सुरक्षित रह सकी। 

उडुपि में सुना एक और प्रसंग। उनके स्कूल के एक मित्र थे। उनके साथ अद्वैत-द्वैत पर बहस होती थी। मित्र अद्वैती थे और अनंतमूर्ति माध्व होने के नाते द्वैत को मानने वाले थे। द्वैत मत में जगत मिथ्या नहीं, माया नहीं, तत्त्वत: सत्य है। जगत् सत्यं तत्त्वत:। जबकि अद्वैत मत में ब्रह्म सत्य है, जगत मिथ्या। हालांकि मिथ्या का स्थूल अर्थ नहीं, कि यह कुछ नहीं है, मिथ्या पारिभाषिक शब्द


है। व्यवहार में है; लेकिन पारमार्थिक दृष्टि से मिथ्या है, जबकि ब्रह्म सत्य है। सत् चित् आनंद है। इत्यादि। माध्वाचार्य जगत के इस निषेध के कारण शंकराचार्य के परम विरोधी हैं। उन्हें राक्षस कहते हैं। इत्यादि। दोनों में बहस का कोई अंत न था। प्राय: तीस वर्ष बाद वह मित्र उनसे मिला, जबकि वे मैसूर, बर्मिंघम और कहां-कहां हो आए थे, तो उसने मिलते ही न कुशल समाचार पूछा, न कुछ और; छूटते ही कहा कि अनंत, इस बीच मुझे अद्वैत के पक्ष में एक और तर्क सूझा है, इसका क्या जवाब है? 

एक प्रसंग अनंतमूर्ति ने सुनाया। कब कहां की बात है, ठीक याद नहीं। शिमोगा-सिरसी में कहीं भी यह हुआ होगा। उन्हें पास के किसी कस्बे से लौटना था। कोई सवारी न थी। दो युवक साइकिल पर उधर ही जा रहे थे। उनमें से एक ने इन्हें अपनी साइकिल के ‘कैरियर’ पर बैठा लिया। वे इन्हें पहचानते न थे। जब साइकिल आगे बढ़ी तो दोनों साइकिल चलाते हुए इनके उपन्यास, शायद ‘संस्कार’ के चरित्रों और घटनाओं का बड़े मजे से बखान कर रहे थे। और ये पीछे बैठे सुन रहे थे। सारे रास्ते वे यही चर्चा करते रहे। उन्हें बड़ा मजा आया। 

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कुम-अकुम जो हो, भारतीय ज्ञानपीठ सम्मान उत्सव नई दिल्ली के विज्ञान भवन में आयोजित था। इत्तफाक से मैं उस दिन नई दिल्ली में था। कमलेशजी के साथ उत्सव में शरीक हुआ। उत्सवे व्यसने राजद्वारे श्मशाने च, य: तिष्ठति स बांधव: (उत्सव, व्यसन, राजद्वार, श्मशान में जो साथ हो, वह बंधु)- न्याय से। हॉल पूरा भरा था। अध्यक्षता शायद तत्कालीन प्रधानमंत्री नरसिंह राव कर रहे थे। वे भी मंच पर आ चुके थे। अनंतमूर्ति की बेसब्री से प्रतीक्षा थी। आमतौर पर राष्ट्रपति, प्रधानमंत्री इत्यादि की प्रतीक्षा होती है। यहां लेखक की प्रतीक्षा हो रही थी। अनंतमूर्ति अपनी चिरपरिचित पोशाक- पैजामा-कुर्ता सदरी पहने थोड़ी देर से मंच पर प्रगट हुए। हॉल तालियों की गड़गड़ाहट से गूंज उठा। गूंज-अनुगूंज। 

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कृष्णमूर्ति कन्नड़ शिविर (‘गैदरिंग’) पहले कर्नाटक राज्य में घूम-घूम कर धारवाड़, दावनगिरि, उडुपि, मैसूर, बेलगांव में होता था। जनवरी, 2002 के उडुपि के ऐसे ही शिविर का पहले जिक्र आया है। दूर गांव जाकर पूरा बंदोबस्त करना भारी पड़ने लगा। तो फिर उसका आयोजन बंगलुरु में ही ‘हरिद्वनम्’ में शुरू हुआ। ऐसे ही एक कन्नड़ शिविर में डॉ. अनंतमूर्ति मुख्य वक्ता के रूप में आमंत्रित थे। बंगलुरु एजुकेशन सेंटर के निदेशक डॉक्टर सतीश इनामदार और मैं मंच पर उनके साथ थे। शायद आदतन या हम लोगों का खयाल कर वे अंगरेजी में बोलने लगे। बोलते रहे। कुछ देर बाद मैंने उन्हें धीरे से सुझाया: ‘‘स्वल्प कन्नड़...’’ यह स्फुट स्वर भी माइक से फैल गया। तो अनंतमूर्ति ने सहज भाव से कन्नड़ में बोलना शुरू किया। फिर तो उन्होंने जैसा आजकल चालू भाषा-बोली में कहते हैं, अपनी मातृभाषा कन्नड़ में बोल कर महफिल लूट ली! 

डॉ. राममनोहर लोहिया हमारे बीच अप्रत्यक्ष सेतुबंध प्रारंभ से हैं, और हाल-हाल में जे. कृष्णमूर्ति, इसका जिक्र किए बिना यह स्मरण अधूरा रहेगा। बर्मिंघम विश्वविद्यालय से अंगरेजी साहित्य में पीएचडी की उपाधि प्राप्त करने और मैसूर में अंगरेजी भाषा और साहित्य का अध्यापन करने के बावजूद वे ‘अंगरेजी हटाओ’ के पक्षधर थे। कन्नड़ भाषा में लिखते थे। आपद् धर्म के रूप में अंगरेजी में भी- अच्छी अंगरेजी में। 

ऐसे तो जब प्राय: पचास-साठ वर्षों का साथ हो तो कितनी साझा स्मृतियां होंगी, उन सबका बखान करने बैठूं तो रात बीत जाए। और सब स्मृतियां मीठी-मीठी हों, ऐसा भी जीवन में कहां? तो एक कड़ुवा प्रसंग: 

कृष्णमूर्ति फाउंडेशन इंडिया के ‘हरिद्वनम्’, थाटगुनी, बंगलुरु स्थित ‘वैली स्कूल’ में ‘आर्ट विलेज’ (कला ग्राम) के उद्घाटन के लिए ललित कला अकादेमी के अध्यक्ष अशोक वाजपेयी आमंत्रित थे। उद्घाटन के पश्चात, शायद दूसरे दिन, ‘‘सृजनशीलता’’ पर एक गोष्ठी का आयोजन हुआ। अशोकजी ने ही अध्यक्षता की और संचालन भी। अनंतमूर्ति, शशि देशपांडे और कुछेक लेखकों के साथ मैं भी उसमें भाग लेने के लिए आमंत्रित था। वार्ता अंगरेजी में हो रही थी। मैंने सदा की भांति अंगरेजी का सार्वजनिक प्रयोग न करने के कारण हिंदी में संक्षिप्त वक्तव्य दिया। शशि देशपांडे ने उस पर कुछ और बातें कीं। जब अनंतमूर्ति की बारी आई तो उन्होंने कहा कि मेरी हिंदी अशोक के समझ में आती हो तो हो, उन्हें तो नहीं आती। यहां हिंदी में बोलना कृष्णनाथ के ‘अहंकार’ (‘एरोगेंस’) का सूचक है। मैं तो अवाक् रह गया। 

शेक्सपियर के प्रसिद्ध नाटक ‘जूलियस सीजर’ में जब अन्य के साथ ब्रूटस भी उन पर खंजर चलाते हैं, तो शेक्सपियर सीजर के मुंह से कहलाते हैं: ‘‘यू टू ब्रूटस!’’ 

मुझे लगा कि अनंतमूर्ति को मैं यही दुहरा दूं। लेकिन वे हमारे ‘फाउंडेशन’ के अतिथि थे, और मेरे पुराने साथी तो थे ही, इसलिए मैं भारी रह गया। ‘तिथै चंगी चुप।’ हां, लौटते हुए कार में मैंने यह जरूर पूछा कि क्या आपको सचमुच लगा कि यह मेरा ‘अहंकार’ है? तो उन्होंने कहा नहीं, मैं मजाक कर रहा था! बात आई-गई हो गई। 

इस बीच गंगा-कावेरी में कितना जल बह गया। कितनी बार उनका यहां ‘हरिद्वनम्’ आना और हमारा उनकी ‘सुरगि’ जाना-आना हुआ। जब उनकी चिता में शरद ने मुखाग्नि दी, और वह ‘सुरगि’ चंदन की गंध के साथ दिग्-दिगंत मैं फैलने लगी तो यह सब याद आने लगा। और कितना तो अब याद भी नहीं। शैतान लड़की की तरह स्मृति भी बड़ा खेल करती है! अब उसके साथ खेलने की सकत नहीं, इसलिए इतना बस है। उडुपि राजगोपालाचार्य अनंतमूर्ति शर्मण: की पुण्य स्मृति को नमन सहित।


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