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दक्षिणावर्त: न दरिया रुका न पर्वत झुके PDF Print E-mail
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Friday, 12 September 2014 18:12

तरुण विजय

जनसत्ता 31 अगस्त, 2014: गुरु गोविंद सिंहजी भारतीय इतिहास के ऐसे महान राष्ट्रीय नायक हैं, जिनका जीवन चरित हर भारतीय का माथा गर्व से उन्नत कर देता है। उनके आदर्श पिता गुरु तेग बहादुरजी कश्मीरी हिंदुओं की रक्षा के लिए बलिदान हुए और हिंद की चादर कहलाए। इस्लामी कट््टरपंथी औरंगजेब जैसे बादशाहों ने दुनिया के इतिहास में कू्ररता और निर्ममता की नई मिसालें कायम करते हुए भारत के राष्ट्रीय आंदोलन का नेतृत्व करने वाले महान सिख गुरुओं और उनके अनुयायियों का बर्बर दमन किया, लेकिन फिर भी सिखों का अप्रतिम प्रतिरोध दबा नहीं। 

औरंगजेब के क्रूर शासन में झूठ का ही चलन था। जब मुगल सेना आनंदपुर साहब पर जीत हासिल नहीं कर पा रही थी और किले के भीतर गुरु गोविंद सिंहजी के पराक्रमी सिखों का बाल बांका नहीं हो पा रहा था तो औरंगजेब ने कुरान की शपथ खाकर गुरु गोविंद सिंहजी को संदेश भिजवाया कि अगर वे आनंदपुर साहब का किला छोड़ दें तो फिर उन्हें पूरे हिंदुस्तान में कहीं भी जाने की बेरोकटोक आजादी होगी। गुरु गोविंद सिंहजी को इस चिट्ठी की मंशा पर शक हुआ, लेकिन उनके सहयोगी सिखों ने कहा कि औरंगजेब ने कुरान की कसम खाकर चिट्ठी लिखी है, इसलिए हम अपना प्रवास जारी रखते हुए किले से बाहर आ जाते हैं। गुरु गोविंद सिंहजी ने यह बात हिचकते हुए मानी और जैसे ही वे सिख सेना के साथ बाहर आए, उन पर मुगल सेना टूट पड़ी। 

सिरसा नदी के किनारे भयानक युद्ध हुआ। एक-एक सिख ने असाधारण वीरता दिखाते हुए खुद शहीद होने से पहले दस-दस मुगल सैनिकों को मार गिराया। युद्ध की इस अचानक और विश्वासघात वाली घटना में गुरु गोविंद सिंहजी का परिवार एक-दूसरे से अलग हो गया और उनके दो छोटे साहबजादे जोरावर सिंह और फतेह सिंह अपनी दादी माता गूजरी के साथ बीहड़ जंगलों के रास्ते पर चल पड़े। दादी माता गुजरी अपने दोनों पोतों को शेरनी की तरह संभालते हुए चल रही थीं कि कहीं किसी गांव में सुरक्षित शरण मिल जाए। उधर गुरु गोविंद सिंहजी के साथ उनके दो बड़े साहबजादे अजीत सिंह और जुझार सिंह सिरसा नदी पार करके रात के समय रोपड़ नगर में रुके और अगली सुबह चमकौर के किले में पहुंचे। 

भारत की रक्षा और धर्म की ध्वजा की खातिर गुरु गोविंद सिंहजी का सारा परिवार युद्धभूमि में तो था ही, वयोवृद्ध माता गूजरी अपने छह और आठ साल के पोतों को युद्ध और शत्रुओं की भयानक दृष्टि से बचाते हुए शरण ढूंढ़ रही थीं। एक रात शरण मिली कुम्मा नामक भिश्ती के यहां और दूसरी सुबह उनका गंगू नाम का पुराना नौकर उन्हें अपने यहां आग्रह करके ले आया। सामान रख कर दादी और दोनों पोते शाम की प्रार्थना करके सोए तो रात में ही कुछ खड़का हुआ और माता गूजरी ने देखा कि गंगू उनके सामान से सोने की अशर्फियां चुरा कर बाहर जा रहा है। वे चुप रहीं। सुबह उससे पूछा तो वह चिल्लाता हुआ शहर कोतवाल के पास शिकायत करने चला गया। स्थानीय गांव खेरी के चौधरी ने अपने सिपाही भेज कर मोरिंडा के सूबेदार को खबर दी और वे गंगू के घर भारी लाव-लश्कर के साथ पहुंच कर अचानक माता गूजरी और दोनों साहबजादों को गिरफ्तार कर सरहिंद के सूबेदार वजीर खान के पास ले आए। 

वजीरखान ने उन्हें सरहिंद के ठंडा बुर्ज (एक मीनार जैसी इमारत) में रखने का हुक्म दिया। अगले दिन वजीरखान ने दोनों साहबजादों को अपने सामने पेश करने का हुक्म दिया। क्या कोई कल्पना कर सकता है कि उस क्षण दोनों साहबजादों की दादी यानी माता गूजरी के दिल में क्या गुजरा होगा? दादी ने सिपाहियों से पूछा भी कि इन छोटे बच्चों ने तो कोई गुनाह नहीं किया, तुम उन्हें क्यों ले जा रहे हो? उन्होंने अपने पोतों से कहा कि हमेशा याद रखना कि तुम्हारे पिता गुरु गोविंद सिंह हैं और तुम्हारे दादा गुरु तेग बहादुरजी थे। चाहे कुछ भी हो जाए, उनकी पगड़ी को दाग मत लगने देना। 

सरहिंद के सूबेदार ने दोनों साहबजादों को मानसिक संताप देने के लिए कहा कि तुम्हारे दोनों बड़े भाई (अजीत सिंह और जुझार सिंह) चमकौर की लड़ाई में मारे गए हैं। अब तुम्हारे सामने अपनी जान बचाने


का एक ही तरीका है कि तुम इस्लाम कबूल कर लो। साहबजादों ने हिम्मत से कहा कि हमारे पिता दशमेश अभी जिंदा हैं। अकाल पुरुष उनकी रक्षा कर रहा है। 

क्या कभी किसी तूफान में पर्वत डिगा है? क्या कभी कोई अपनी मुट्ठी में सूरज और चंद्रमा को ले सका है? वजीरखान ने उन्हें बहुत लालच दिया और कहा कि अगर वे इस्लाम कबूल कर लेंगे तो उन्हें बहुत बड़ी जायदाद देगा, बादशाह औरंगजेब उन्हें खिताब देगा। इस पर साहबजादों ने कहा कि हम मौत से नहीं डरते और अपने पंथ की रक्षा के लिए हम अपनी जान दे देंगे, लेकिन इस्लाम कबूल नहीं करेंगे। हम गुरु गोविंद सिंह, गुरु तेग बहादुर और गुरु हरगोविंद सिंहजी के वंशज हैं। वजीरखान ने मलेर कोटला के नवाब ने कहा कि गुरु गोविंद सिंहजी के साथ लड़ाई में तुम्हारा भाई और भतीजा मारे गए थे, अब तुम इन दोनों बच्चों से उनका बदला ले सकते हो। तब नवाब मलेर कोटला ने कहा कि नहीं ये बच्चे बहुत मासूम हैं। आप इन्हें रिहा कर दीजिए। 

बदला लेना होगा तो इनके पिता से लेंगे। तब वजीरखान ने खूंखार काजी (गिलजाई कौम) से कहा कि तुम अब इन्हें सजा दो। सूबेदार के काजी ने बार-बार साहबजादों को इस्लाम कबूल करने के लिए समझाने की कोशिश की और जब वे शेर की तरह दहाड़ते हुए मना करते गए तो वजीरखान ने उन्हें जिंदा ही दीवार में चिनवाने का हुक्म दिया। सरहिंद के किले में एक स्थान पर साहबजादों को जिंदा ही दीवार में चिनने का काम काजी ने किया। जल्लाद एक-एक र्इंट रखते थे और पूछते थे कि इस्लाम कबूल है या नहीं? साहबजादे निडरता से इनकार करते थे। 

उधर माता गूजरी बेहाल थीं। दुनिया में कौन ऐसी मां और दादी होगी जो अपने नन्हे बच्चों और पोतों को जालिमों के शिकंजे में देख एक सांस भी चैन से ले सके। शहर के एक सेठ टोडरमल ने माता गूजरी को आकर जब बुरी खबर सुनाने की कोशिश की तो तड़पते हुए उन्होंने अपने प्राण त्याग दिए। टोडरमल वजीरखान के पास गया और नन्हे साहबजादों के पार्थिव शरीर का अंतिम संस्कार करने की इजाजत मांगी। वजीरखान ने नृशंसता दिखाते हुए कहा कि जितनी जमीन लगेगी, उसे ढंक सकें उतनी ही सोने की अशर्फियां देनी पड़ेंगी। टोडरमल ने अपनी जिंदगी भर की सारी कमाई वजीरखान को दे दी और साहबजादों के पार्थिव शरीर और माता गूजरी का भी अंतिम संस्कार किया। 

यह खबर सुन कर पिता गुरु गोविंद सिंहजी पर क्या गुजरी होगी, क्या कोई इसकी कल्पना कर सकता है? उन्होंने औरंगजेब को जफर खान के जरिए चिट्ठी लिखी, जिसमें कहा कि मुझे तुम पर और तुम्हारे सूबेदारों पर पानी की एक बूंद के बराबर भी अब यकीन नहीं है, जिन्होंने कुरान की कसम खाकर विश्वासघात किया। इस विश्वासघात के लिए तुम्हारा अब सर्वनाश होना निश्चित है। 

साहबजादों के इस बलिदान को पंजाब में साका सरहिंद यानी सरहिंद की शहादत के नाम से जाना जाता है। यह कितना दुर्भाग्यपूर्ण है कि जिस हिंदू जाति को साहबजादों के इस बलिदान की कथा घर-घर सुना कर उनके स्मारक हर शहर में बनाने चाहिए थे, वही कौम आज अपने इतिहास से विस्मृत होकर अपने ही विनाश का लगातार घट रहा दृश्य देख रही है। देश ही नहीं, पूरे दक्षिण एशिया में भारतीय धरती पर जन्मे पंथों और आस्थाओं पर लगातार आक्रमण बढ़ रहे हैं। साका सरहिंद उन सबके विरुद्ध खड़े होकर भारत और धर्म की रक्षा की अमिट प्रेरणा देता है। 


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