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समांतर संसार: बहादुर बनाम मर्दानी PDF Print E-mail
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Friday, 12 September 2014 18:09

सय्यद मुबीन ज़ेहरा

जनसत्ता 31 अगस्त, 2014: पिछले दिनों दिल्ली की एक महिला पत्रकार से चर्चा में यह बात उठी कि महिला को मर्दानी कहना कहां तक उचित है। आप किसी मर्द को जनानी कह कर देखिए, आपको पता चल जाएगा कि मर्द को कैसा दर्द होता है। ऐसा ही दर्द हमें भी होता है, जब किसी महिला को मर्दानी कहा जाता है। सवाल है कि क्या औरत, मर्द बन कर ही अपना अस्तित्व कायम रख सकती है? अगर यह सच होता तो इतिहास की कई बहादुर महिलाओं का नाम ही नहीं हो पाता। इसमें पैगंबर साहब के नवासे हजरत इमाम हुसैन के परिवार की वे बहादुर महिलाएं भी शामिल हैं, जिन्होंने कर्बला के मैदान में अपना भरा-पीरा परिवार लुटाने के बावजूद जालिम के दरबार में अपने मनोबल का बेजोड़ प्रदर्शन किया कि इतिहास उनका नाम सम्मान से लेता है। उस समाज में जहां लड़कियों को जिंदा दफ्न कर दिया जाता था, वहां भी महिलाएं युद्ध के मैदान में उतरीं। 

ऐसी महिलाएं भी हैं, जिन्होंने कुशलातापूर्वक अपने देश की सरकार चला कर इतिहास के पन्नों में अपना नाम अंकित कर दिया। इसमें वे महिलाएं भी हैं, जिन्होंने पुरुषों की दुनिया में रहते हुए अंतरिक्ष की ऊंची उड़ानें भरीं। वे महिलाएं भी हैं, जो हिमालय के ऊंचे शिखर को अपने पैरों के नीचे ले आर्इं। वे महिलाएं भी हैं, जो खेल के मैदान में अपने जलवे बिखेरती रहीं। वे महिलाएं भी हैं, जो जंगे-आजादी में पुरुषों के साथ कंधे से कंधा मिला कर लड़ीं। राजनीति हो या खेल का मैदान, रोमांच या फिर गगन के सितारों की खोज, साहित्य का क्षेत्र हो या फिर युद्ध का मैदान, बड़े युद्धपोत चलाना हो या फिर अंतरिक्ष में छलांग लगाने की बात, महिलाओं ने कभी कमजोरी का सबूत नहीं दिया। फिर क्यों नारी शक्ति के मापदंड के तौर पर मर्दानी शब्द का उपयोग किया जाता है? 

अभी हाल में आई एक फिल्म नाम से ही मर्दानी है। फिल्म को लेकर जैसा प्रचार किया जा रहा है उससे लगता है कि इस फिल्म का उद्देश्य लड़कियों को हालात से टकराने की प्रेरणा देना है, लेकिन फिल्म का पहला पक्ष ही कमजोर साबित हुआ है।  वह इस योग्य नहीं है कि उसे परिवार के साथ देखा जा सके। फिल्म केवल वयस्कों के लिए है, क्योंकि विशेष भूमिका निभाने वाली मर्दानी यानी रानी मुखर्जी के संवाद के अलावा फिल्म में हिंसा भी खूब है। इससे पहले रिवाल्वर रानी नाम की फिल्म आई थी, जिसमें औरत को मर्द बनाने के लिए उल्टी-सीधी भाषा का प्रयोग किया गया था। 

हिम्मत और हौसले को महिला या पुरुष के बीच नहीं बांटा जा सकता। हमने तो कई पुरुषों की ऐसी कायरता देखी है कि उनकी मर्दानगी पर शक होने लगता है। विश्वास न हो तो किसी भी बाजार, बस या रेल में, सड़क पर, कहीं भी भीड़-भाड़ में पुरुषों को देख लीजिए कि अपराध होते देख कैसे चुपचाप आंखें फेर रहे होते हैं। कहीं यह अपराध अगर औरत के साथ हो रहा हो तब तो उनकी मर्दानगी देखने लायक होती है। क्या यही शक्ति है? आश्चर्य होता है कि बहादुरी की सभी उपलब्धियों को केवल पुरुषों के साथ क्यों जोड़ा जाता है। 

पिछले दिनों उत्तराखंड की एक महिला जब पानी लेने गई, तो उस पर चीते ने हमला कर दिया। उस महिला ने चीते को पछाड़ दिया। हमारे देश में पानी के लिए महिलाओं को दूर-दूर तक जाना पड़ता है। हाल में हुए एक अध्ययन के मुताबिक ग्रामीण भारत में हर दूसरी महिला पानी लाने के लिए साल भर में एक सौ तिहत्तर किलोमीटर तक का सफर तय करती है। राष्ट्रीय नमूना सर्वेक्षण विभाग के अनुसार यह आंकड़ा 2008-09 की तुलना में पच्चीस किलोमीटर अधिक है। एक सौ तिहत्तर किलोमीटर का मतलब है कि दिल्ली से वृंदावन तक की दूरी। इस दूरी में साल भर सिर पर पानी से भरे घड़ों का बोझ कम नहीं होता होगा। इस मुश्किल काम को कोई मर्द करे तो क्या हम उसे जनानी कह सकते हैं। फिर क्यों महिला बहादुरी के लिए मर्दानी जैसे शब्द की जरूरत


पड़ती है। 

अगर पुरुष बहादुर होते तो अपने समाज की महिलाओं की रक्षा करने में पीछे नहीं रहते, मगर हमारे आसपास महिलाओं के खिलाफ बढ़ते अपराधों का ग्राफ यह बताने के लिए काफी है कि पुरुषों में भी बुजदिल लोग होते हैं। महिला की बहादुरी के लिए मर्दानी जैसे शब्द का इस्तेमाल कहीं न कहीं पुरुषों की ही प्रशंसा दिखाता है। 

दिल्ली से करीब पचास किलोमीटर दूर हरियाणा का मेवात जिला अति पिछड़ा माना जाता है। यहां शिक्षा का औसत केवल 37.6 प्रतिशत रहा है। यहीं एक महिला सरपंच ने अपने प्रयासों से लड़कियों की शिक्षा को बढ़ावा दिया है। इसके लिए उन्हें पुरुष नहीं बनना पड़ा, औरत रहते हुए ही काम कर रही हैं। नीमखेड़ा गांव की यह महिला जब सरपंच बनी तो लोगों ने यही सोचा था कि नाम उनका चलेगा और काम घर के लोग करेंगे, पर उन्होंने इस सोच को बदल दिया। जबकि दिल्ली तक में हम देखते हैं कि निगम पार्षद की जगह उनके पति का बड़ा-सा फोटो हर पोस्टर-बैनर में दिखाई देता है। उनके पति ही आगे-आगे दीखते हैं। मगर मेवात की महिला सरपंच ने उस समाज में, जहां महिलाओं को अधिक बढ़ावा देने का रिवाज नहीं है, लोगों का सोच बदला है। 

उन्होंने अपने क्षेत्र में पहली महिला पंचायत के सोच को आगे बढ़ाया। ऐसे समाज में जहां पुरुष ही हावी रहे हैं, बदलाव लाना कुछ मुश्किल हो सकता है, पर असंभव नहीं। आज मेवात के नौ वार्डों में से छह में महिला सरपंच हैं, जो न केवल लड़कियों की शिक्षा को बढ़ावा दे रही, बल्कि लड़कियों को पैदा होने से पहले ही मार देने के रुझान पर रोक लगाने में कामयाब हुई हैं। अब यहां पर लड़कों की तुलना में लड़कियों का औसत लगातार बढ़ रहा है। यही वजह है कि 2011 के सरकारी आंकड़ों के अनुसार मेवात में लड़कियों की दर दूसरे जिलों से अच्छी है। एक हजार लड़कों पर 906 लड़कियां हैं। ऐसा करने के लिए मेवात की महिलाओं को पुरुष नहीं बनना पड़ा है। उन्होंने महिलाओं के अधिकार की लड़ाई महिला होते हुए लड़ी। 

इन सभी महिला सरपंचों ने पानी की कमी और चालू परियोजनाओं की प्रगति न हो पाने के कारण 2007 में पद छोड़ने का फैसला किया था। उस समय सोनिया गांधी को जब इस बात का पता चला तो तत्कालीन केंद्रीय पंचायती राज मंत्री और राज्यमंत्री आगे आए और उन्हें ऐसा करने से रोका। पानी का टैंकर हर दिन आने लगा। 

इसलिए हमारा मानना है कि बहादुरी के लिए पुरुष या महिला होना कोई महत्त्व नहीं रखता। यह इस पर निर्भर करता है कि किसने अपनी रिवायतों, धार्मिक विश्वासों, संस्कारों को खुद में कितना उतारा है, कौन अवांछित स्थितियों से टकराने में विश्वास रखता है। इसमें महिलाएं भी हो सकती हैं और पुरुष भी। मगर जब महिलाएं कोई ऐसा काम करें तो मर्दानी कहा जाता है। क्यों? क्या मर्द बन कर ही महिलाओं के अधिकारों की लड़ाई जीती जा सकती है? 

किसी भी धार्मिक ग्रंथ में औरत को मर्द बनाने की वकालत नहीं की गई है। महिला का अपना अलग अस्तित्व है, इस पर किसी प्रकार का समझौता नहीं किया जा सकता। दरअसल, जरूरत पुरुषों को बदलने की है। औरत को औरत ही रहना है, लेकिन पुरुषों को ऐसा आदमी बनाना है, जिसे औरतों का सम्मान करना आता हो। तभी वह मर्द कहलाने के योग्य हो सकता है। 


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