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प्रसंग: निश्शब्द लोकतंत्र में PDF Print E-mail
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Friday, 12 September 2014 18:06

शंभुनाथ

जनसत्ता 31 अगस्त, 2014: महाभारत युद्ध में विजय के बाद पांडवों ने शत्रु शिविर के टूटे रथ, शव और घायल लोग देखे। विजयोत्सव में उनके सीने चौड़े हो गए थे। युद्धिष्ठिर ने तब एक यज्ञ शुरू किया। उस समय आधा सोने का शरीर लिए कहीं से एक नेवला आकर यज्ञ के आसपास लोटने लगा। वह देर तक लोटता रहा। अंत में निराश होकर उसने हिकारत से युद्धिष्ठिर और बाकी पांडवों को देखा। और निश्शब्द वैसे ही लौट गया, जैसे आया था। 

युद्धिष्ठिर को आश्चर्य हुआ, उसने ऐसा क्यों किया। उन्हें बताया गया, एक गरीब ब्राह्मण परिवार ने अपने लिए बनाया गया भोजन अतिथियों को खिला देने के बाद बड़ी सहजता से भूखे ही हाथ धो लिया था। यह नेवला अपने लिए कुछ ढूंढ़ता हुआ वहां अचानक आया और उसका आधा शरीर उस जल में लोटने से सोने का हो गया। बाकी शरीर भी सोने का हो जाए, इस पूर्णता के लिए वह यज्ञों में आकर इसी तरह लोटने लगता है, पर निराश होता है! 

कुछ उसी तरह छत्रभग्न विपक्षी शिविर। चुनाव के घायल राजनीतिक नेता। धू-धू जलता हुआ गांधी-नेहरू युग का इतिहास। एक अपूर्व उल्लासमय प्रस्थान के साथ हिंदुत्व का महायज्ञ। जगह-जगह गंगा आरती, लाल किले पर चमकता लाल पीला साफा। विश्वगुरु भारत का नवोदय, राष्ट्रभाषा का शंखनाद और वेदमंत्रों के वैज्ञानिक फार्मूलों के बीच हिंदुत्ववादी शुद्धिकरण के लिए हवन- स्वाहा, स्वाहा! 

नेवला फिर आकर लोट रहा है और बेचैन है। वह एक असमाप्त परियोजना है। क्या वह इस बार परिपूर्ण होगा- अच्छे दिन आ जाएंगे या जितना भी लोकतंत्र है, वह छिनेगा? फिलहाल उसके चेहरे पर न कोई आशा है, न हिकारत। वह बस लोटे जा रहा है। 

लोकतंत्र पहले ही खोखला और निश्शब्द किया जा चुका है। इसे गूंगा कर देने का तरीका है कि लोगों के इतिहास का ही नहीं, उनकी भाषा का भी अंत कर दो और सब कुछ एक शोर से भर दो। शब्दों को सिर्फ कुछ निकम्मे कवियों के पास रहने दो। यह सारा शोर संपेरे के बीन की तरह मीठा है। 

कहा जा रहा है, लोकतंत्र पर हिंदू फासीवाद का खतरा फिर मंडरा रहा है। लोकतंत्र इस पवित्र दिखने वाले राजनीतिक शंखनाद के पहले बचा ही कितना था कि अब इस पर खतरा आया है। इसे वंशवादी राष्ट्रीय केंद्रवाद, वामपंथी केंद्रवाद, जाति की राजनीति और धर्मनिरपेक्षता-भ्रष्टाचार की सांठगांठ ने कदम-कदम पर पहले ही लगभग मिटा दिया था, जबकि राष्ट्रीय मुक्ति संग्राम के लाखों शहीदों ने लोकतंत्र को परिपूर्ण करने की जिम्मेदारी इन्हीं राष्ट्रवादियों, वामपंथियों और धर्मनिरपेक्ष लोगों के कंधों पर सौंपी थी। भगतसिंह और गांधी के रक्त में लोट कर जिस नेवले का आधा शरीर सोने का हुआ था, वह उपर्युक्त सबको हिकारत से देख कर चुपचाप लौट चुका था। वह नेवला फिर आया है और पिछले पंद्रह अगस्त को लाल किले के भी आसपास कहीं था। 

इससे पहले कभी इतनी बार यह बात नहीं कही गई कि संविधान की मर्यादा का पालन करते हुए ही नई सरकार काम करेगी। अब जजों की नियुक्ति का सरकारीकरण करके न्यायपालिका की स्वायत्तता खत्म करने की तैयारी है। लोकतंत्र का बचाखुचा एक खंभा, जिससे अभी उम्मीद नहीं टूटी थी, उसकी जड़ पर ही यह चोट है। आजकल लोगों की हत्या करने के लिए निकलने से पहले शहीद वेदी पर फूल चढ़ा दिए जाते हैं। इसलिए न्याय की बलि के पहले संविधान की पूजा जरूरी है। जिसे मिटाना हो उसे पूजित वस्तु बना दो। यह भारत में होता आया है। बुद्ध को मिटाना हो, राम को मिटाना हो, गंगा को मिटाना हो, गांधी को मिटाना हो या हिंदी को मिटाना हो, उसे महज पूजित वस्तु बना दो। वेद को मिटाना हो, उसमें विज्ञान खोजो। वह न देखो, जो उसमें है। शब्द को नदियों की तरह न बहने दो। उन पर भी ऊंचे बांध खड़े कर दो, ताकि मनुष्य के बौद्धिक अंत:संसार में भी एक डूब बन जाए। 

लोकतंत्र आज चारों तरफ इतना खंखर हो गया है कि सर्चलाइट लेकर देखना होगा, कहां कितना बचा है। यह घर के आंगन और चौपाल की तरह गायब है। हमेशा लोक पर तंत्र चढ़ा रहा, तंत्र पर लोक कभी नहीं बैठा। मीडिया लोकतंत्र का चौथा खंभा है, जो नाजायज वित्तीय पूंजी और आवारा मिजाज के कब्जे में है। यह राष्ट्र की अभिव्यक्ति न होकर अब बड़े पैमाने पर पेड न्यूज का माध्यम है। जिसका राज हो या जिसका राज आने वाला हो, उसका बाजा। उसने दिमाग से शब्दों को बहिष्कृत कर इसमें चमकदार रंगीन भूसा भर दिया है। मीडिया में लोकप्रिय के लिए ही जगह है, जबकि एक आजाद मीडिया में अ-लोकप्रिय भी सुना जाता है। आजाद मीडिया का अपना विवेक और परंपरा होती है। अपनी परंपराएं वही खोता है, जो पराधीन होता जा


रहा हो। 

इतनी आसानी से कोई यह कह कर नहीं निकल सकता कि योजना आयोग की जगह विकास और सुधार आयोग बनने का अर्थ है नेहरू युग की समाप्ति। एक सफेद हाथी जाएगा, उसकी जगह कई नए सफेद हाथी आएंगे। यह डेढ़ सौ साल के बहुआयामी राष्ट्रीय जागरण को नकारने वाला कथन है कि लाल किले से जैसे पहली बार किसी प्रधानमंत्री ने भाषण दिया है। यह ठकुरसुहाती है। जवाहरलाल नेहरू से कई भूलें हुर्इं, लेकिन आजादी के लिए संघर्ष, लाल किले के उनके पहले भाषण की मार्मिकता, देश की अंदरूनी खाइयों को पाटने की उनकी बेचैनी, लोकतंत्र के लिए सांस्कृतिक-साहित्यिक जगहें बनाने में उनकी भूमिका और विश्व शांति से प्रतिबद्ध एक सच्चे भारतीय मनुष्य की उनकी कल्पना आज भी अर्थपूर्ण है। नेहरू को देश भूल गया है। वे अजायबघर के कूड़ेदान में हैं। वे इतने बुरे नहीं थे, खासकर आज के राजनेताओं को देख कर यह कहा जा सकता है। गांधी, नेहरू और समाज के सुधारवादी जनतांत्रिक आंदोलनों के लंबे सिलसिलों को कभी झाड़-पोंछ कर मिटाया नहीं जा सकेगा और फिर इनसे जिन्न कभी भी निकल सकता है। 

राजनीतिक गणित बैठाया जा रहा है कि धर्म की राजनीति को मात देना हो तो जाति की राजनीति का पुनर्गठन करो। उत्तर प्रदेश-बिहार में अब भ्रष्टाचार, जातिवाद और वंशवाद मिल कर सांप्रदायिक ताकतों से लड़ेंगे। इतनी चोट खाने पर भी जब अक्ल ठिकाने नहीं आ रही हो और आम लोगों को बहुराष्ट्रीय साम्राज्यवाद और नए तौर पर उभर रहे सामंतवाद से व्यापक तौर पर सचेतन किए बिना सिर्फ धर्मनिरपेक्षता-धर्मनिरपेक्षता चिल्ला कर चुनाव जीतने की बेताबी हो, सोचा जा सकता है कि ये कालिख पुते चेहरे देश को और कितने बड़े धार्मिक अंधकार में ले जाएंगे। 

लंगड़ी धर्मनिरपेक्षता कभी अंधे धार्मिक उन्माद का सामना नहीं कर सकती। न बौद्धिकता के नशे में प्राचीन और नवजागरणकालीन भारतीय परंपराओं पर हिंदुत्ववाद का आरोप लगाने से संप्रदायवाद का बाल बांका होगा। संप्रदायवाद और जातिवाद के बीच जब भी टक्कर होगी, अंतत: बड़ी संकीर्णता छोटी संकीर्णता को निगल लेगी। बड़े सांप के मुंह में छोटे सांप जाएंगे। जातिवाद की तुलना में संप्रदायवाद में समुदायों को हजम करने की ताकत ज्यादा है। इसलिए पहले यह सोचने की जरूरत है, समुदायों से समाज की ओर कैसे लौटें। यहीं लोकतंत्र को शब्द मिलना है। नेता फासीवाद से लड़ेंगे, पर यह कभी नहीं सोचेंगे कि अपने जीवन और राजनीति में खुद लोकतंत्र को कितना रौंदा। 

क्या हिंदू को आज सबसे बड़ा खतरा मुसलमान से है? मुसलमान का डर दिखाया जाता है। आदमी अनुभव से देख सकता है, हिंदू को सबसे ज्यादा हिंदू ही दबाता है। हिंदू का हक हिंदू ही छीनता है। आमतौर पर हिंदू ही हिंदू का बलात्कार करता है, मारता-पीटता और अपमानित करता है। कोई मुसलमान नहीं आता घर उजाड़ने के लिए, हिंदू ही हिंदू का घर उजाड़ता है। धर्म के इतने जयकारों के बीच हिंदू ही हिंदू को वंचित करता है। हिंदू के अच्छे कामों में साथ न देकर जो साजिशें करता है, वह हिंदू ही होता है। कैसे मान लिया जाए कि हिंदू होने का गर्व कर लेने भर से समस्या का समाधान हो जाएगा, पर हिंदू होने में शर्म महसूस करने वालों ने भी समाज को कौन-सा आदर्श दिया है? प्रेम करना छोड़ दीजिए, इन सबने तो घृणा करना भी नहीं सिखाया। 

आज अपनी-अपनी तृप्ति के लिए इतनी अधिक भागदौड़, खुशामद और छल-प्रपंच है कि बस कहीं जाकर गिरने की एक ठोस जगह मिलनी चाहिए। तृप्ति कभी नहीं मिटती। अतृप्ति की सैकड़ों मीटर लंबी जीभ है। अतृप्ति और असंतोष में फर्क है। भुक्खड़ और भूखे में फर्क है। ताजा रहने के लिए थोड़ी भूख जरूरी है। आदमी सुख में सड़ता है। छोटे-छोटे सुखों के साथ थोड़े दुख चाहिए। लगातार अतृप्ति नहीं, असंतोष चाहिए। भले टूटे हुए हों, पर कुछ बड़े स्वप्न चाहिए और कुछ सच्ची कोशिशें चाहिए। नेवला ऐसी ही जगहों की खोज में है। वह लोट रहा है। क्या हम उसके हिकारत से देखने का इंतजार कर रहे हैं? 


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