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कभी-कभार: सघन चिंतन निर्मल गद्य PDF Print E-mail
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Friday, 12 September 2014 18:03

अशोक वाजपेयी 

जनसत्ता 31 अगस्त, 2014: हिंदी में, दुर्भाग्य से, चिंतन कम ही होता है, उसे उससे भी कम पढ़ा-बहसा जाता है। ऐसे में हाल ही में संगीत नाटक अकादेमी और विजया बुक्स द्वारा प्रकाशित चिंतक-कवि मुकुंद लाठ के संगीत, नृत्त और नाट्य पर विमर्श-लेख संग्रह ‘संगीत और संस्कृति’ का प्रकाशन एक बड़ी, विचारोत्तेजक और प्रीतिकर घटना है। मुकुंदजी ने बहुत गहरे बौद्धिक जतन से संगीत को संस्कृति से जोड़ कर उनके परस्पर अनिवार्य संबंध को अनेक स्तरों पर प्रगट किया है। वे संगीत-विचार को व्यापक विचार के परिसर में अवस्थित कर उनकी कोटियों के संदर्भ में देख पाए हैं। संगीत जैसी भंगुर कला के भारतीय इतिहास पर, उसकी समस्याओं और उलझनों पर, उनके अल्पज्ञात तथ्यों पर यह पुस्तक नई रोशनी डालती है। अनेक लगभग सिद्ध या बहुमान्य अवधारणाओं जैसे रस सिद्धांत आदि का उन्होंने गहरा प्रश्नांकन किया है। 

सौभाग्य से, यह सब बहुत सजल और संप्रेषणीय गद्य में किया गया है। यह गद्य अपनी सघन तर्कशृंखला में रसे-बसे होने के साथ-साथ निर्मल और पारदर्शी है: वह हिंदी के उस गद्य की परंपरा की याद दिलाता है, जो उदाहरण के लिए वासुदेव शरण अग्रवाल, हजारीप्रसाद द्विवेदी और राममनोहर लोहिया आदि ने स्थापित की थी। ज्ञान है, प्राय: अनूठा और नई व्याख्याओं और भुला दिए तथ्यों को सहेज कर चलता हुआ, पर इस गद्य पर ज्ञान का बोझ नहीं है। मुझे साहित्य की ऐसी एक भी पुस्तक अनायास याद नहीं आती, जो इस तरह के आलोचनात्मक गद्य में लिखी गई हो: उसमें गद्य जितना लिखा गया है, उससे अधिक बोलता गद्य लगता है। उसमें संदर्भ, अवधारणाएं, तथ्य सहज और अविरल प्रवाह में आते हैं। यह हिंदी आलोचना का विस्तार भी है: वह साहित्य, रंगमंच और किसी हद तक ललित कलाओं तक महदूद न रह कर आत्मविश्वास के साथ संगीत के कठिन-जटिल सूक्ष्म क्षेत्र में जा रही है। मुकुंद लाठ के रूप में हमें अपनी भाषा में विशेषत: हिंदुस्तानी शास्त्रीय संगीतकार का शायद पहला आधुनिक इतिहासकार, सिद्धांतकार और आलोचक एक साथ मिल रहा है। यह सचमुच ऐतिहासिक क्षण है: बहुत कृतज्ञता का भी। 

‘राग का इतिहास’ लिखते हुए- उस पर ‘एक विहंगम दृष्टि’ डालते हुए- मुकुंदजी कहते हैं: ‘हमारी संगीत-दृष्टि अभी इतिहास-निष्ठ है ही नहीं। हम आधुनिक चित्रकला का इतिहास लिखते हैं, चित्रकार विशेष, कवि विशेष आदि की सृजन-यात्रा का भी इतिहास लिखते हैं। संगीत में इस प्रवृत्ति के अंकुर हों भी तो नगण्य से हैं- मुझे तो नहीं दिखे हैं।’ आगे वे जोड़ते हैं- ‘कला कृतियों के रूप लेती है। पर कला कृति नहीं होती। किसी भी कृति में निश्शेष नहीं हो जाती... फिर भी ‘कला’ और ‘राग’ में गहरा अंतर है। यह कि कला नितांत सामान्य पदार्थ है, जबकि ‘राग’ सामान्य होते हुए भी हर राग का अपना एक विशेष ‘रूप’ भी होता है- उसकी अपनी एक निर्मिति होती है, स्वर-संबंध-योजना होती है, चलन होता है, जो उसे निर्धारित ‘व्यक्ति’-रूप सत्ता देता है। फिर, राग स्वरूप से एक नहीं अनेक हैं।’ 

सोलहवीं-सत्रहवीं शताब्दी में पुंडरीक विट्ठल और अहोबल के हवाले से मुकुंदजी बताते हैं कि ‘स्वर से राग नहीं बनता, राग से स्वर बनता है। ध्वनि के जो भी अंतराल राग की और रागभाव की अभिव्यक्ति साधते हैं, वे ही स्वर हैं। स्वर पूर्वप्रदत्त स्थान नहीं हैं...।’ वे यह भी बताते हैं कि ‘व्यक्ति-बोध के उदय के साथ राग और आलाप में उसकी अभिव्यक्ति, ये केवल ‘कामचार’ की वस्तु नहीं रह जाते। एक गहराई के भी संधान का उद्भव होता है। शैली की व्यक्तिगत साधना का यही साध्य भी है। साथ ही, शैली की साधना के अभिन्न अंग के रूप में ‘रागभाव’ की धारणा का उदय होता है- राग केवल एकनाद-रूप, एक स्वर-योजना विशेष नहीं, जिसमें हम इच्छा-कल्पित आलाप के साथ खेलें। उसका एक अंतरंग भाव है, मर्म है, जिसे दृष्टि-संपन्न गायक अपनी तरह से देखता है, और उभारता है। राग-व्यक्ति और गायक-व्यक्ति का परस्पर-भाव ही रागमार्ग है। यही राग-परंपरा है, जिसमें दोनों बदलते चलते हैं।’

एक पते की बात वे यह कहते हैं: ‘यह हमारी परंपरा का स्वभाव है- और संगीत में ही नहीं, अन्यत्र भी है- कि वह नए को नया नहीं कहना चाहती। पुराने की अनुवृत्ति या उसी का स्वत:सिद्ध-सा परिणाम ही ठहराना चाहती है। पर यह एक मुद्रा है। इसके पीछे झांकिए। नए की, जीर्ण-प्राचीन के विपरीत आधुनिक की, व्यक्ति-प्रतिभा की, उसके नवोन्मेष की, इन सबकी ललक हर कहीं मिल जाएगी। वही गवैया कहता है कि वह घराने का, गुरु का ही गाना गाता है, वही यह दावा भी करता है कि उसमें कुछ नई बात है। सुनने वाला भी उसका अपना गाना ही सुनना चाहता है, पुराना नहीं। पर साथ ही दोनों यह भी कहेंगे कि ‘नया कुछ नहीं’। 

मुकुंदजी का मत है कि ‘हमने कलाओं में अपने चिंतन के इतिहास को ठीक से देखा नहीं है। जितना भी देखा है साहित्य के क्षेत्र में ही देखा है, वह भी किसी पैने तल-ग्राही विचार के इतिहास


की तरह नहीं। संगीत, नृत्त में तो चिंतन को किसी भी गहराई से उभारा ही नहीं गया है, जबकि इन पर हमारे यहां चिंतन बहुत पुराना है। संगीत में तो वेदों तक जाता है और आज तक चला आता है।... यूरोप की तरह हमारे यहां नृत्य-संगीत की परंपरा टूटी नहीं है- उलटे प्रतिभाशील रही है और आज भी उसी नैरंतर्य में है।... यूरोप में विदग्ध नृत्य चाहे अब पनपा हो, हमारा नृत्त ढाई हजार साल पुराना है, संगीत की व्यवस्थित, सुविचारित, स्वतंत्र परंपरा और भी पुरानी है।’ 

मुकुंदजी आधुनिकता की एक अवधारणा अमूर्तन का विश्लेषण करते हुए कहते हैं कि ‘भारत में बहुत ही आत्मचेतन स्तर पर- नाट्यकला के कला-विमर्श में- बात आज से सवा दो नहीं तो दो हजार साल पहले उभर चुकी है। अभिनवगुप्त ने अनुकरण-विमुख, अपने ही स्वतंत्र-रूप-साधती कलाओं को स्वयंप्रतिष्ठ की संज्ञा दी।’ 

इस पुस्तक को पढ़ कर लगता है कि हालांकि हम सब अपने को इतिहास-बोध से लैस मानते हैं, पर हमें स्वयं अपना इतिहास, उसमें हुए कला-चिंतन का इतिहास कितना कम पता है! 


गरम-नरम भारत

हाल ही में दिवंगत यूआर अनंतमूर्ति की अंतिम दिल्ली-यात्रा दिल्ली प्रेस क्लब के निमंत्रण पर उन दिनों चल रहे संसद के चुनाव पर बोलने के लिए थी। वे अस्वस्थ होने के बावजूद कष्टपूर्वक आए थे। उन्होंने अपने वक्तव्य में सख्त-गरम भारत के स्थान पर कोमल-नरम भारत की आकांक्षा व्यक्त की थी। उन्होंने लेखकोचित पीड़ा से यह कहा था कि इन दिनों भारत को एक देश के रूप में महाशक्ति, बलवान, शक्तिशाली आदि बनाने के दावे किए जा रहे हैं, जो उन्हें भयभीत करते हैं: उनका मत था कि ऐसे भारत का चरित्र समावेशी नहीं रहेगा और उसमें हमारी बहुलता क्षत-विक्षत हो जाएगी। समावेशिता तो कोमलता और नरमी के भावों के साथ चलने वाले भारत में ही संभव है। अब तक वह वैसे ही भारत में सक्रिय-सजीव रही है। यह भारत के सशक्त होने का विरोध नहीं था। यह चेतावनी है जो एक सजग नागरिक-लेखक ही दे सकता है कि भारत सशक्त तब होगा जब उसकी भाषायी, धार्मिक, सामाजिक-सांस्कृतिक बहुलता सशक्त होगी। यह कोई अप्रासंगिक हो गई पुरानी अवधारणा नहीं है।

कहा तो यह भी जा सकता है कि सदियों से भारत सांस्कृतिक रूप से एक रहा आया है, भले ही राजनीतिक रूप से वह प्राय: विखंडित ही था। हमारी एक मुश्किल यह है कि हम पिछले सौ-डेढ़ सौ बरसों से भारतीय एकता को राजनीति के माध्यम से खोजने-थोपने की कोशिश करते रहे हैं, जबकि उसमें हमारी सांस्कृतिक बहुलता की पहचान और जरूरत नहीं बची है। अगर बहुतों को आज की ज्यादातर राजनीति, दलों की विभिन्नता के बावजूद, एक जैसी लगती है तो यह दृष्टि का पूर्वग्रह-ग्रस्त होना नहीं है- यह एक तीखी सच्चाई है। राजनीतिक शक्तियां इस बहुलता का, उसके कुछ हिस्सों का अवसरवादी ढंग से चुनावों में बनते-बिगड़ते समीकरणों के लिए लाभ उठाती हैं। लेकिन इस बहुलता के प्रति दृश्य और गहरी प्रतिबद्धता लगभग गायब है। बहुत हुआ तो इस बहुलता को अल्पसंख्यकों, गरीबों, आदिवासियों आदि की कोटियों में महदूद कर उन्हें पोसने या तुष्ट करने की कोशिश होती रहती है, जो अक्सर सतही और प्रभावहीन ही होती है। 

कई बार इस विडंबना की ओर ध्यान जाता है कि जैसे-जैसे हमारा लोकतंत्र परिपक्व और टिकाऊ हो रहा है वैसे-वैसे उसमें बहुलता का परिसर अपने सांस्कृतिक और वैचारिक अर्थ में सिकुड़ रहा है। यह कटूक्ति तक की जा सकती है कि हमारी राजनीति अब हमारी संस्कृति से सर्वथा विच्छिन्न हो चुकी है- उसकी अपनी संस्कृति इतनी प्रबल और बद्धमूल हो चुकी है कि उसका व्यापक भारतीय संस्कृति, उसकी विचार-परंपराओं और बहुलता से कोई संबंध या संवाद नहीं है। उसने अपनी विचित्र स्वायत्तता स्थापित कर ली है। 

यह नहीं है कि स्वयं परंपरा और उसे देखने-समझने की विधियों, व्याख्याओं, संस्कृति और उसकी व्यापक और लंबी सहस्राब्दजीवी बहुलता में कोई परिवर्तन नहीं आए हैं। जरूर आए हैं, जो कि उनके सजीव-सप्राण होने के ही प्रमाण हैं। लेकिन समस्या यह है कि आज की राजनीति न तो इन परिवर्तनों पर विचार करती या उन्हें हिसाब में लेती है, न ही उनसे कोई संबंध बनाने की चेष्टा करती है। जाहिर है उसे यह करना जरूरी नहीं लगता।  


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