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पुस्तकायन: आपबीती जगबीती PDF Print E-mail
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Friday, 12 September 2014 18:01

रमेश प्रजापति

जनसत्ता 31 अगस्त, 2014: रामकुमार कृषक की किताब दास्ताने-दिले-नादां एक ऐसा वृत्तचित्र है, जो देश के सरकारी और गैर-सरकारी अस्पतालों में फैली अव्यवस्था का कच्चा चिट्ठा खोलता है। यह पुस्तक तिथिवार डायरी के रूप में हृदय रोग से ग्रस्त लेखक के दैनिक जीवन की घटनाओं और संघर्षों को प्रस्तुत करती है। हालांकि यह पुस्तक किसी एक विधा में बंध कर नहीं चलती। डायरी, आत्मकथा, संस्मरण, कविता, गजल जैसी साहित्यिक विधाओं का आश्रय लेते हुए एक औपन्यासिक रचना का रूप ले लेती है। वैसे भी किसी पुस्तक की असल चीज उसकी विषय-वस्तु की रोचकता और पठनीयता होती है, यह इस पुस्तक में आरंभ से लेकर अंत तक बनी हुई है। साथ ही यह कृति कृषकजी के व्यक्तित्व और उनकी वैचारिकता, सामाजिकता और नैतिकता को भी बड़ी सहजता और संजीदगी से अभिव्यक्त करती है। 

‘दास्ताने-दिले-नादां’ जून 2005 में हुई लेखक की बाइपास सर्जरी और उसके बाद की व्यथा-कथा को पंत अस्पताल के पूरे परिवेश सहित व्यक्त करती है। दिल्ली की भयंकर गरमी और आर्थिक अभाव के बीच अपने बीमार दिल को बचाए रखने के लिए की गई दौड़-धूप, रोगियों को हलकान करती अस्पताल-व्यवस्था, अधिसंख्य डॉक्टरों के रूखेपन और कुछेक की सहानुभूति को लेखक ने गहरे लगाव और सजगता के साथ चित्रित किया है। इस प्रक्रिया में यह पुस्तक चिकित्सा तंत्र के बीच दिन-प्रतिदिन पिसते, बल्कि जिंदगी और मौत से जूझते अन्य अनेक रोगियों के जीवन-संघर्ष को भी चित्रित करती है। 

हालांकि मरीज ही नहीं, रोज-रोज की खिचखिच से परेशान डॉक्टर भी हैं। इसीलिए वे सरकारी अस्पतालों से निकल कर निजी अस्पतालों में जाना चाहते हैं, ताकि लाखों कमा सकें। नैतिक मूल्य और समाजसेवा उनके लिए कोई मायने नहीं रखते। अब वे चिकित्सा व्यवस्था का हिस्सा हैं। पैसा ही उनके जीवन का अंतिम लक्ष्य है। अस्पताल की अव्यवस्था से पीड़ित लेखक जब एक अटेंडेंट की धांधली के संबंध में डॉ सत्संगी से कुछ कहता है तो वे खुद अपनी अंतर्वेदना और कुंठा का इजहार करने लगते हैं- ‘इलाज हम करते हैं आप लोगों का। दूध-मलाई आप खाते हैं। हम नहीं खाते। बाप ने पढ़ाया-लिखाया मुझे। पैसा खर्च किया। मैं भी किसी प्राइवेट अस्पताल में होता तो लाखों वसूलता।...’ इस पर लेखक का मार्मिक और अर्थपूर्ण आत्म-संवाद है: ‘नहीं जानते कि मैं और वे एक ही व्यवस्था के शिकार हैं। उसी व्यवस्था के, जिस पर देशी-विदेशी पूंजी ने कब्जा किया हुआ है। जिन्हें यह व्यवस्था स्वास्थ्य सेवाएं कहती है, मैं उन्हें स्वार्थ-सेवाएं कहता हूं।’ 

पर अस्पतालों की ऐसी स्थिति के लिए कौन जिम्मेदार है? क्या अस्पताल-प्रशासन ही इसके लिए जिम्मेदार नहीं है। किसी व्यवस्था को उस व्यवस्था के भीतर रहने वाले लोग ही अच्छा-बुरा बनाते हैं। कोई अपनी जिम्मेदारी से भाग नहीं सकता। यहां भी लेखक ने यही दिखाने का प्रयास किया है। 

पूरी पुस्तक में भ्रष्टाचार और अव्यवस्था से जूझते आम जनों की पीड़ा शब्दांकित है। इसी पीड़ा के बीच रामकुमार कृषक मानवीय रिश्तों की भी तलाश करते हैं। एक ही वार्ड में अपने-अपने रोगों से लड़ते रोगियों में मनुष्यता और सामाजिकता का अटूट संबंध बन जाता है। लेखक का कथन है: ‘अजीब रिश्ता है देह और आत्मा का। एक दिखती है, दूसरी दिखती नहीं। दिखती भी है तो देह के ही सहारे। देहातीत नहीं हो सकती वह। होगी भी तो मनुष्यता की तरह। रूपाकार में नहीं, व्यवहार में। रिश्तों और सामाजिकता की डोर में बंधी हुई। अस्पतालों में भी दिख जाती है कभी-कभी।’ ‘दुखों के भी अपने ही सुख होते हैं। जोड़ देते हैं एक-दूसरे से हमें।’ 

पुस्तक में लेखक का कवि-रूप और उसके कई लेखक-मित्र भी उपस्थित हैं। जहां एक ओर ‘कृतिओर’ पत्रिका के संपादक विजेंद्रजी का पत्र और कविता, लेखक के आत्मबल को बढ़ावा देती है, वहीं डॉ प्रेमशंकर रघुवंशी का पत्र भी लेखक के अंदर उत्साह का संचार करता है। 

दिल्ली के लोकनायक जयप्रकाश नारायण अस्पताल की इमरजेंसी में दाखिल मरीज आॅक्सीजन की प्रतीक्षा में दम तोड़ देते हैं! पंत में ही इलाज के दौरान एक किशोर एचआइवी पॉजिटिव हो जाता है, लेकिन किसी के कानों पर जूं तक नहीं रेंगती। कोई इस अव्यवस्था की जिम्मेदारी नहीं लेता। लेखक की टिप्पणी है: ‘जिंदगी में जिंदगी से भी बड़ी दुश्वारियां/ अस्पतालों से भी मिलती हैं कई बीमारियां।’ असल में स्वास्थ्य-सेवाओं का हर तरफ यही हाल है। लेखक निजी और सरकारी, दोनों तरह के अस्पतालों को एक ही श्रेणी में रखता है। जहां ‘निजी अस्पताल मरीज का नहीं, उसकी जेब का टेस्ट करते हैं।’ वहीं सरकारी अस्पताल मरीज की जिंदगी से कोई वास्ता नहीं रखते। दूर-दराज के क्षेत्रों की बात तो दूर, दिल्ली में भी सरकारी अस्पतालों के हालात बद से बदतर हैं: ‘अस्पतालों की कमी और भ्रष्ट व्यवस्था की किसी को परवाह नहीं। ऐसे में मरीज अलग घुटता है, डॉक्टर


अलग।’ 

पुस्तक में कृषकजी की सामाजिक और दार्शनिक चेतना प्रखर रूप से उभर कर सामने आई है। सरकारी और गैर-सरकारी अस्पतालों की प्रणाली में उत्पन्न विसंगतियों पर गहरा प्रहार करते समय वे यह भी देखते हैं कि नैतिकता और व्यावहारिकता के संघर्ष में सदैव नैतिकता को ही पराजित होना पड़ता है। यही कारण है कि हृदय रोग से जूझते हुए भी लेखक आज के यथार्थ को कहीं अनदेखा नहीं करता, और न ही निराश या हताश होता है, बल्कि शरीर की देखभाल को दार्शनिक अंदाज में बयान करते हुए कहता है: ‘कई बार सोचता हूं, अपने शरीर को मैं उसी तरह बरत रहा हूं, जैसे अपने कपड़ों को बरतता हूं। जब तक वे घिस-घिस कर भी पहनने योग्य हैं, तब तक उन्हें क्यों न पहना जाए।’ 

पुस्तक में लेखक के निजी संघर्षों के साथ-साथ आम आदमी की जिजीविषा, संघर्ष, विडंबना, संत्रास और आक्रोश सभी एक साथ उभर कर आए हैं। बाइपास के बाद लेखक को छुट््टी दे दी गई है। इस पर उसके एक सहयात्री की टिप्पणी है: ‘बढ़िया है भाईजी! बच्चों में पहुंच जाओगे अपने। ये तो कसाईबाड़ा है! सब साले मुर्दाखोर हैं।’ 

हर साल स्वास्थ्य के नाम पर केंद्र और राज्य सरकारें ढेरों पैसा खर्च करती हैं। बावजूद इसके इन सरकारी अस्पतालों में रोगियों को जरूरी सुविधाएं नहीं मिलतीं। ऐसी विपरीत परिस्थितियों से बाहरी-भीतरी संघर्ष करते हुए कृषकजी उम्मीद की डोर कभी नहीं छोड़ते: ‘शरीर का अपना धर्म है, मनुष्य का अपना।’ जिजीविषा और जीवट उनके अंदर कूट-कूट कर भरी हुई है। यह उनकी जीवन-आस्था ही है, जो उन्हें निगमबोध घाट से आगे बढ़ कर अपने बाएं बाजू मौजूद सूरज के साथ-साथ चलने की प्रेरणा देती है, क्योंकि ‘स्वस्थ होता आदमी अपनों को भी स्वस्थ करता है।’ 

विपरीत आर्थिक स्थिति से जूझते लेखक को उसकी सृजनात्मकता आत्मसंतुष्टि के अतिरिक्त और क्या दे सकती है? विषम और विकट परिस्थितियों के बीच लेखक के कुछ मित्र भी आर्थिक मदद का आश्वासन देते हैं। बावजूद इसके कृषकजी अपनी तरह ही आगे बढ़ते हैं। आखिरकार वे सर्जरी को निषिद्ध ठहराती ‘साओल’ जैसी वैकल्पिक चिकित्सा पद्धति में अपना उपचार तलाशते हैं। 

आकस्मिक नहीं कि सरकारी अस्पतालों से परेशान कई मरीज जब निजी अस्पतालों में इलाज कराते हैं तो खुद को ‘रोगी’ नहीं, ‘कस्टमर’ कहलाना पसंद करते हैं! दूसरी ओर लेखक जैसे मरीज हैं, जो एंजियोग्राफी के लिए चौबीसों घंटे भूखे रह कर अपनी बारी का इंतजार करते हैं, और उन्हें दो दिन इंतजार करने को कहा जाता है। ऐसे अनेक प्रसंग और दारुण स्थितियां हैं, जिनसे मरीजों को हर रोज गुजरना पड़ता है। विडंबना यह कि सही होकर भी गलत मरीज ही होते हैं। कृषकजी ने ऐसे अनेक चरित्रों और प्रसंगों को गहरी संवेदनशीलता से दर्ज किया है। इस मूल्यविहीन समय में यह जानते हुए भी कि व्यक्तिवादी होना ही सुखी होना है, वे सब जगह व्यक्तिवादी सोच को नकारते हुए मनुष्य बने रहने में विश्वास रखते हैं। 

कृषकजी का जनवादी दृष्टिकोण व्यावहारिक और द्वंद्वात्मक रहा है। वे हमेशा भौतिकवादी पूंजीवाद के धुर विरोधी रहे हैं। इसी पूंजीवादी व्यवस्था ने मानव-मूल्यों और संवेदनाओं को ध्वस्त कर दिया है। समाज का कोई भी पक्ष इससे अछूता नहीं। फिर वह शिक्षा, संस्कृति या चिकित्सा, कोई भी क्षेत्र क्यों न हो। सभी को इसने अपनी चपेट में ले लिया है। 

‘इस भौतिकवादी संसार में जहां पैसा बहुत महत्त्वपूर्ण है, चिकित्सा-उद्योग ने हृदय रोग के उपचार को खराब कर दिया है, (मरीजों को) गुमराह कर दिया है। कार्डियोलॉजिस्ट, हार्ट सर्जन और अस्पताल सभी इस पैसे से चलने वाली संस्था (या व्यवसाय) के सदस्य हैं। चिकित्सा व्यवसाय के लिए मरीज की देखभाल दूसरे स्थान पर चली गई है। उसके उपचार का तरीका ज्यादा से ज्यादा पैसा कमाने की भावना से प्रेरित है। इसीलिए हृदयावरोध की स्थिति में रोगी को अविलंब सर्जरी कराने को कहा जाता है।’ रामकुमार कृषक की इस आपबीती का, जिसे उन्होंने ‘रोगनामचा’ भी कहा है, शिल्प-सौंदर्य और संवेदनालोक कमाल का है। 


दास्ताने-दिले-नादां: रामकुमार कृषक; अंतिका प्रकाशन, सी-56/यूजीएफ-4, शालीमार गार्डन, एक्स-2, गाजियाबाद; 130 रुपए।


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