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पुस्तकायन: बंदीजन के गीत PDF Print E-mail
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Friday, 12 September 2014 18:00

राजेंद्र उपाध्याय

जनसत्ता 31 अगस्त, 2014: रचनात्मकता को किसी सींखचे में बंद नहीं किया जा सकता। जेल की सलाखों के भीतर भी कवि की प्रतिभा अपना रंग दिखा जाती है। ऐसे कई कलाकार और रचनाकार हुए हैं, जिन्होंने जेल के भीतर रह कर भी अपने चित्रांकन, कविता और मूर्तिकला से समाज को बहुत कुछ दिया है। इसी की अगली कड़ी है तिनका तिनका तिहाड़। यह पुस्तक जेल में बंद महिलाओं का अनूठा काव्य संग्रह है। इसका संपादन विमला मेहरा और वर्तिका नंदा ने किया है। इसमें चार महिला कैदियों की सैंतालीस कविताएं संकलित हैं। इस अनूठे आयोजन में काफी मेहनत की गई है। 

इन कविताओं का संग्रह समाज के उस हिस्से को समझने में मदद करता है, जहां रवि और कवि आसानी से नहीं पहुंचते। ये कविताएं लिखने वालों ने शायद कभी कविता के बारे में बहुत कुछ पढ़ा भी नहीं होगा और शायद यहां आने से पहले कविता भी सहम कर लिखती और सोचती हों। लेकिन ये कविताएं इनके सच्चे दिल और सच्ची पीड़ा से निकली हैं, इसलिए मर्म को छूती हैं। 

इस किताब में अपनी जिंदगी से जुड़ी तस्वीरें इन कैदियों ने खुद ली हैं। इसीलिए यह किताब अक्षरों और कैमरे के लेंस से जुड़ कर मन को छूने वाली भावनाओं में लिपटी है। तिहाड़ में बंदी बहनों ने अपनी कथा सुनाने, जीवन संवारने और सपने सजाते हुए कुछ भाव लिखे हैं- उन्हें सबके सामने लाने का श्रेय वर्तिका नंदा, विमला मेहरा और जेल अधीक्षक नीता को जाता है। 

तिहाड़ जेल में हर दिन पिछले दिन जैसा नहीं होता और आने वाले दिन की कोई खोज-खबर नहीं। जहां नाते सूखते हैं, वहां एक नई कोंपल उग आती है। कड़ी जंजीरों के बीच यहां उम्मीदों के सूरज को थामे रखने में मदद करती हैं... एक अदद कविता। तिहाड़ जेल की निदेशक विमला मेहरा ने इन महिला कैदियों की मजबूरी को मजबूती में बदलने का बीड़ा उठाया है। उनका मानना है कि ‘हर इंसान के व्यक्तित्व के दो पहलू होते हैं- उजला और काला। काला अपराध कराता है और उजला इंसान को कवि बना देता है। पछतावा भी होता है और गलतियां सुधारने का मन भी।’ 

इसमें संकलित एक बंदी कवि काफी पढ़ी-लिखी महिला है। रमा चौहान हिंदी, अंगरेजी, पंजाबी, हरियाणवी और राजस्थानी भाषाएं बोल सकती हैं। वे केंद्रीय सार्वजनिक निर्माण विभाग में काम करती थीं। एक हादसा उन्हें तिहाड़ ले आया। यहां आकर सबसे पहले उन्होंने कविता तब लिखी जब उनकी मुलाकात तिहाड़ की सबसे पुरानी महिला कैदी से हुई। उन्होंने लिखा है: ‘एक ऐसा पिंजरा जिसमें रोज होता हाहाकार है/ मिलता है जीना रहना, नहीं मिलता मां का दुलार है/ मिलता है खाना पीना, नहीं मिलती बच्चों की किलकार है/ मिलता है हंसना रोना, नहीं मिलता सपनों का संसार है/ मिलता है चलना फिरना, नहीं मिलती पायल की झंकार है।’

पिंजरे में रोज होते हाहाकार के बीच कविता लिखना आसान नहीं है, फिर भी जेल-जीवन में हमारे समय का महत्त्वपूर्ण साहित्य लिखा गया है। माखनलाल चतुर्वेदी की ‘कैदी और कोकिला’ तथा अज्ञेय की ‘प्रिजन डेज ऐंड अदर पोएम्स’ आदि महत्त्वपूर्ण काव्य कृतियां जेल-जीवन की ही देन हैं। 

इस पुस्तक में संकलित चार महिला कैदियों में से एक सीमा रघुवंशी भी हैं।


वे लिखती हैं: ‘आस है मुझे अपनी जिंदगी की/ वो खुशियों की सौगात की/ क्योंकि जो गुजारा है मैंने ये समय इन सलाखों में/ पर इन सलाखों के भीतर से मैंने इंसान को पहचाना है।’ हमने इन सलाखों के पीछे एक कवयित्री को भी पहचाना है: ‘सुबह लिखती हूं शाम लिखती हूं/ इस चारदीवारी में बस, तेरा ही नाम लिखती हूं/ इन फासलों में जो गम की जुदाई है/ उसी को हर बार लिखती हूं।’ 

सीमा रघुवंशी को तनाव के बीच कविता ही जिंदा रखती है। उनकी सबसे ज्यादा सत्रह कविताएं इस संग्रह में हैं। सीमा ने कुछ समय पत्रकारिता भी की है। 

तीसरी कवयित्री रिया शर्मा 2008 से इस जेल में बंद हैं। उन्होंने लिखा है: ‘क्या जिस्म है क्या रूहान है/ लोग पल-पल बदलते हैं चेहरे यहां/ ये देख कर आईना भी परेशान है।’ 

इसी तरह आरती की शाम कविता के साथ ढलती है और कविता के साथ ही सुबह का सूरज उगता है। इस पुस्तक में उन्होंने लिखा है: ‘मैं दावा नहीं करती सूरज होने का/ और मिटाने का/ सारा अंधियारा पृथ्वी का/ लेकिन मैं/ एक दीया जरूर हूं।’

इस पुस्तक में आकर्षक तस्वीरें हैं। श्वेत-श्याम फोटो शोवन गांधी ने और रंगीन तस्वीरें कवयित्री रमा चौहान, सीमा रघुवंशी, रिया शर्मा और आरती ने ली हैं। 

किताब की संपादक वर्तिका नंदा ने इसकी भूमिका में लिखा है: ‘जब तक जेलें रहेंगी, तब तक रहेंगी कविताएं भी और उनके जरिए फूटती उम्मीदें भी। वैसे जेलों का कविता से कोई परंपरागत नाता नहीं है, लेकिन हर युग इस बात का साक्षी रहा है कि कारागारों में साहित्य सांसें भरता है और कोठरी के बाहर के उजाले की आस इसके जरिए छन कर अंदर आती भी रही है।’ 

उनकी इस बात से सहमत नहीं हुआ जा सकता। विनोबा भावे ने जेल में रह कर भी गीता का भाष्य लिखा। वीर सावरकर ने अंडमान निकोबार द्वीप समूह की सेल्युलर जेल में नाखून और खून से कविता लिखी। भगतसिंह ने काफी कुछ लिखा। ऐसे अनेक उदाहरण देखे जा सकते हैं। 

तिहाड़ की इन रचनाओं ने आंतरिक लौ और ऊपरी शक्ति से खास परिचय करवाया है। जेल में रह कर और भी कई कैदी कविताएं लिख रहे होंगे। उनके काव्यकर्म को लेकर भी ऐसे ही प्रयास किए जाने चाहिए। समय-समय पर ऐसे कवियों की कविताएं, कहानियां आदि प्रकाशित होती रहनी चाहिए। 


तिनका तिनका तिहाड़: संपादक- विमला मेहरा और वर्तिका नंदा; राजकमल प्रकाशन, 1-बी, नेताजी सुभाष मार्ग, दरियागंज, नई दिल्ली; 595 रुपए। 


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