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निनाद: मानसिकता की पुरानी जड़ें PDF Print E-mail
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Friday, 12 September 2014 17:52

कुलदीप कुमार

जनसत्ता 24 अगस्त, 2014: कहां गई भारतीय संस्कृति? कहां गया ‘यत्र नार्यस्तु पूज्यंते रमंते तत्र देवता:’ का नारा? जिस बलात्कार ने समूचे देश की अंतश्चेतना को झकझोर कर रख दिया था, जिसके कारण अनेक वर्षों बाद राजधानी दिल्ली के छात्र-छात्राएं स्वत:स्फूर्त ढंग से इकट्ठे होकर सड़कों पर धरना-प्रदर्शन करने निकल पड़े थे, और जिस पर प्रतिक्रिया व्यक्त करते हुए लोकसभा में उस समय विपक्ष की नेता सुषमा स्वराज ने बलात्कारियों को मौत की सजा दिए जाने की मांग की थी, सोलह दिसंबर 2012 को चलती बस में हुए उसी नृशंस कांड को केंद्रीय वित्त और रक्षामंत्री अरुण जेटली ‘एक छोटी-सी घटना’ बता रहे हैं। और, साथ ही वे यह अफसोस भी जता रहे हैं कि दुनिया भर में इसका प्रचार होने के कारण भारत में सैलानी नहीं आए और देश करोड़ों डॉलर की कमाई से वंचित रह गया। 

भारत सरकार का प्रेस इन्फॉर्मेशन ब्यूरो इस बयान में से एक शब्द ‘छोटी-सी’ निकाल कर प्रेस विज्ञप्ति जारी करता है, लेकिन टीवी के इस युग में कुछ कहने के बाद उससे मुकरना संभव नहीं रह गया है। इसलिए कुछ ही समय बाद खुद अरुण जेटली को सफाई देनी पड़ी कि उन्होंने तो यह कहा था कि महिलाओं के खिलाफ होने वाले अपराधों के कारण देश को कितना नुकसान हो रहा है और सोलह दिसंबर, 2012 को हुए बलात्कार की गंभीरता को कम करने की उनकी कोई मंशा नहीं थी।

अरुण जेटली ने अपने भाषण में जो कहा, वह स्वाभाविक ढंग से कही गई बात थी। लेकिन उनका स्पष्टीकरण खूब सोच-समझ कर दिया गया बयान है, ताकि चारों तरफ से हो रही उनकी आलोचना बंद हो सके। लेकिन इस बात से इनकार नहीं किया जा सकता कि उन्होंने अपने भाषण में जो कुछ कहा, उससे न केवल उनकी, बल्कि पूरे पितृसत्तात्मक समाज की मानसिकता उजागर होती है, जो बलात्कार को न केवल एक मामूली-सी घटना मानता है, बल्कि अक्सर उसके लिए बलात्कार की शिकार होने वाली पीड़िता को ही दोषी करार देता है। 

‘मनुस्मृति’ एक ओर यह कहती है कि जहां नारी की पूजा होती है वहां देवता रमण करते हैं और जहां नहीं होती वहां का हर काम निष्फल होता है, वहीं दूसरी ओर वह यह भी कहती है: ‘पिता रक्षति कौमार्ये, भर्त्ता रक्षति यौवने। रक्षति स्थवरे पुत्र, न स्त्री स्वातंत्रयमर्हति॥’ विवाह होने से पहले स्त्री की रक्षा उसका पिता करता है, विवाह के बाद पति और बुढ़ापे में पुत्र। स्त्री स्वतंत्रता की अधिकारी नहीं है। उसे देवी बना कर उसकी पूजा की जा सकती है, लेकिन उसे समानता का अधिकार और आजादी नहीं दी जा सकती। 

आज का हमारा समाज क्या इस मानसिकता से मुक्त हो पाया है? क्या आज भी अधिकतर लोग यह नहीं मानते कि लड़कियों को अधिक आजादी देने से वे बदचलन हो जाती हैं और बलात्कार इसीलिए बढ़ रहे हैं, क्योंकि लड़कियां आजादी से घूम-फिर और अपनी पसंद के कपड़े पहन रही हैं? दूसरे शब्दों में कहें तो वे खुद बलात्कार को निमंत्रण दे रही हैं। समाज में फैले इस सोच की गिरफ्त में महिलाएं भी हैं। इसीलिए बलात्कार की शिकार होने वाली महिलाएं खुद भी अपराधबोध से ग्रस्त हो जाती हैं। उन्हें यह भी अच्छी तरह मालूम होता है कि अगर वे घटना के बारे में परिवार वालों को बताएंगी तो बहुत संभावना इसी बात की है कि वे उसे ही कुसूरवार ठहराएं। नतीजतन, बलात्कार जैसे जघन्य अपराध का शिकार होने वाली अधिकतर महिलाएं चुप्पी साध लेती हैं और अंदर ही अंदर घुटती रहती हैं। जो साहस करके पुलिस के पास पहुंचती भी हैं, उनमें से बहुतों की रपट लिखी ही नहीं जाती। जिनकी लिखी भी जाती है, उनकी शिकायत की जांच ही ठीक से नहीं की जाती। और, अपराधी साफ बच निकलते हैं। 

पिछली इकतीस मार्च को कुछ पुस्तकों के लोकार्पण समारोह में बोलते हुए भारत के तत्कालीन प्रधान न्यायाधीश पी. सदाशिवम ने इस बात पर चिंता जताई थी कि एक ओर महिलाओं के खिलाफ अपराध बढ़ रहे हैं और दूसरी ओर बलात्कार के मुलजिम बरी होते जा रहे हैं। वर्ष 2010-2012 के लिए राष्ट्रीय अपराध रिकॉर्ड ब्यूरो के आंकड़े उद्धृत करते हुए उन्होंने बताया था कि जहां 2010 में कुल 29.7 प्रतिशत आरोपियों को सजा हुई थी, वहीं 2012 में यह संख्या घट कर 24.2 प्रतिशत रह गई थी। इसी तरह महिलाओं के साथ छेड़छाड़ करने के आरोपियों में से 2010 में 52.8 प्रतिशत को सजा हुई, तो 2012 में केवल 36.9 प्रतिशत को ही। 

इसी अवसर


पर तत्कालीन अतिरिक्त महाधिवक्ता और महिला अधिकार कार्यकर्ता इंदिरा जयसिंह ने जानकारी दी थी कि वर्ष 2013 में दिल्ली में पिछले वर्ष की तुलना में बलात्कार के दोगुने मामले दर्ज हुए, लेकिन महिलाओं के खिलाफ होने वाले सभी किस्म के अपराधों में सजा कुछेक को ही मिल पाती है। 

अदालतों में न्यायाधीश की कुर्सी पर बैठे लोग भी इसी समाज में पले-बढ़े हैं, और वे भी समूचे समाज में व्याप्त मानसिकता से मुक्त नहीं हैं। महिलाओं के खिलाफ अपराध के मुकदमों की सुनवाई के समय अक्सर उनकी टिप्पणियों में और कभी-कभी तो लिखित फैसलों तक में इस मानसिकता के दर्शन हो जाते हैं। अनेक बार देखा गया है कि न्यायाधीश बलात्कारी और पीड़िता के बीच शादी कराने की कोशिश करते हैं या बलात्कारी की ओर से ऐसा प्रस्ताव आने पर पीड़िता को उसे स्वीकार करने का मशविरा देते हैं। क्योंकि अरुण जेटली की तरह ही वे भी बलात्कार को ‘छोटी-सी घटना’ मानते हैं। 

सोलह दिसंबर की रात को चलती बस में केवल सामूहिक बलात्कार नहीं हुआ था, उन बलात्कारी दरिंदों ने उस युवती के साथ, जिसे पूरे देश ने ‘निर्भया’ नाम देकर सम्मानित किया, इतनी नृशंसतापूर्वक हिंसक बर्ताव किया था कि वह दिल्ली और सिंगापुर में हुए बेहतरीन इलाज के बावजूद एक सप्ताह भी जीवित नहीं रह सकी थी। तुलसीदास कह गए हैं: ‘प्रभुता पाई काहि मद नाहीं’। यह प्रभुता का मद ही है जो अरुण जेटली से यह कहला रहा है कि इस ‘छोटी-सी घटना’ की वजह से देश को करोड़ों डॉलर का नुकसान उठाना पड़ा। 

अरुण जेटली का यह बयान एक ऐसे समय आया है, जब उत्तर प्रदेश और देश के अनेक अन्य स्थानों से भी बलात्कार की घटनाओं की खबरें लगातार मिल रही हैं। अरुण जेटली राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन की पिछली सरकार में कानून मंत्री भी थे। जैसा कि इंदिरा जयसिंह और उनके जैसी अनेक महिला अधिकार कार्यकर्ता कह चुकी हैं, हमारी न्याय प्रणाली की खामियां भी बहुत हद तक महिलाओं के खिलाफ अपराध करने वालों के कानून की गिरफ्त से बच कर निकल जाने के लिए जिम्मेदार हैं। 

देश की विभिन्न अदालतों में करोड़ों मुकदमे लंबित पड़े हैं। छोटे-छोटे मामलों में मुकदमे दशकों तक चलते हैं और निचली अदालत से ऊपर की अदालत तक का फैसला आते-आते कभी-कभी तो गवाह ही जिंदा नहीं बचते और कभी-कभी वादी या प्रतिवादी। पुलिस सुधार की तरह ही न्यायिक सुधार की बात तो हर सरकार करती है, लेकिन अमल में कुछ नहीं लाती। अदालतों में रिक्त स्थान बरसों तक नहीं भरे जाते। अधिकतर अदालतें जिन हालात में काम करती हैं, उन्हें देख कर दंग रह जाना पड़ता है। इस कंप्यूटर युग में भी उनका कामकाज पुराने ढर्रे पर चल रहा है और उन्हें आधुनिक सुविधाओं के अभाव में काम करना पड़ता है। 

आज भी औपनिवेशिक पुलिस व्यवस्था और न्यायिक व्यवस्था लागू है। अदालतों की गाड़ी इतनी धीमी गति से चलते देख आम नागरिक का न्याय से भरोसा ही उठ जाता है, क्योंकि उसे अदालत से जल्दी न्याय मिलने की उम्मीद नहीं होती। ऐसी स्थिति में आम आदमी खौफ में जीता है और अपराधी निर्द्वंद्व विचरण करते हैं। महिलाओं के खिलाफ अपराध इसी परिवेश में बढ़ रहे हैं और इन अपराधों को अंजाम देने वालों में उन लोगों की संख्या कम होती जा रही है, जिन्हें सजा मिलती है। 

जब इन अपराधियों को यह पता चलेगा कि निर्भया के ऊपर हुई पाशविक हिंसा और बलात्कार को देश का सबसे शक्तिशाली मंत्री ‘छोटी-सी घटना’ मात्र समझता है, तो क्या उनका हौसला नहीं बढ़ेगा? क्या हमारे वर्तमान शासक (‘सेवक’ वगैरह की बात लाल किले तक ही सीमित रहनी चाहिए) क्या इस बारे में कुछ सोचेंगे? क्या अरुण जेटली एक ‘छोटा-सा’ स्पष्टीकरण देकर और यह कह कर बच सकते हैं कि ‘मेरी यह मंशा नहीं थी’?


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