मुखपृष्ठ
Bookmark and Share
अप्रासंगिक: मानवीयता बनाम धार्मिक गोलबंदी PDF Print E-mail
User Rating: / 0
PoorBest 
Friday, 12 September 2014 17:49

अपूर्वानंद

जनसत्ता 24 अगस्त, 2014: इस्लामिक स्टेट ने अमेरिकी पत्रकार जेम्स फोले की गर्दन कलम करने का वीडियो जारी किया है। फोले की गर्दन काटने के पहले कातिल ब्रिटिश अंगरेजी में अमेरिका को इसके लिए जिम्मेदार ठहराता है। उसका कहना है कि अमेरिका इस्लामिक स्टेट की खिलाफत वाले इलाकों पर बमबारी कर रहा है और खिलाफत के मातहत मुसलमानों की चैन से रहने की इच्छा का सम्मान नहीं कर रहा। वह धमकी देता है कि मुसलमानों के खिलाफत में रहने के अधिकार से उनको वंचित करने की अमेरिका की कोशिश का जवाब उसे खून में डुबा कर दिया जाएगा। 

इस कत्ल के बाद एक दूसरे बंधक को लाया जाता है, जिसकी पहचान 2013 में बंधक बनाए गए पत्रकार स्टीवन सौटलौफ के रूप में की जा रही है। कातिल अमेरिका के राष्ट्रपति बराक ओबामा को कहता है कि इसकी जान उनके अगले फैसले पर निर्भर है। 

‘कोई भी इंसाफपसंद खुदा उनका साथ नहीं देगा।’ ओबामा ने इस एक कत्ल और दूसरे कत्ल की धमकी के बाद कहा। इस जवाब का कोई मतलब नहीं है। क्योंकि खुदा खामोशी से अपने बंदों की क्रूरता को नई हदें पार करता हुआ देखता रहा है और उसने कभी हस्तक्षेप करके बागडोर अपने हाथ में नहीं ली है। उसके नाम पर उसकी शान बहाल करने और उसके हुकूमत कायम करने का वादा लिए हुए नए-नए धर्मयोद्धा पैदा होते रहे हैं, जो साबित करते हैं कि पिछले उनके मुकाबले कमजोर दिल और इरादे वाले थे। बाद के दिनों में तो उसामा बिन लादेन को भी नई पीढ़ी के इस्लामी योद्धाओं की क्रूरता अतिवादी लगने लगी थी। 

रॉबर्ट फिस्क ने लिखा कि हम इस्लामिक स्टेट की क्रूरता को तो जानते हैं, लेकिन क्या हम जानते हैं कि ये कौन हैं और कहां से आए हैं! वे यह भी पूछते हैं कि जिनके खौफ से इराक के ईसाई और यजीदी अपना वतन छोड़ रहे हैं, क्यों उनसे सीरिया और इराक के सुन्नियों को कोई डर नहीं लगता। क्या सुन्नियों को वे अपने लगते हैं? क्या अपने लोग दूसरों को मारें तो हमें बुरा नहीं लगता? 

फोले की हत्या के इस वीडियो के जारी होने से क्यों हमारे दिल दहल उठे हैं? क्या इसलिए कि अब हम इंसानों का कत्ल करने का यह तरीका छोड़ आए हैं, जिसमें कातिल और मकतूल एक-दूसरे के इतना करीब हों कि शिकार के शरीर का कंपन कातिल को छुए बिना नहीं रह सकता? क्या कत्ल के इस तरीके में उसकी जिम्मेदारी कातिल पर ज्यादा आयद होती है, बनिस्पत उस तरह के कत्ल के जिसमें हम कई मील दूर से ड्रोन के सहारे अपने शिकारों पर निशाना साधते हैं? क्या तालिबान, अल कायदा और अब इस्लामिक स्टेट के लोग सिर्फ इस वजह से मध्ययुगीन बर्बर लगते हैं कि वे शिकार की आंखों में आंखें डाल कर, और उससे मिलने वाली उत्तेजना और आनंद का प्रदर्शन करके कत्ल करते हैं? और अमेरिका, ब्रिटेन और इजराइल इस कारण आधुनिक हैं कि उनके योद्धा नहीं जानते कि वे किनका कत्ल कर रहे हैं। 

मसलन, इस वीडियो के जारी होने के साथ ही यह खबर भी आई कि गाजा पट््टी में हमास के सेना प्रमुख के घर पर बार-बार बमबारी करके उनके नन्हे बच्चे और पत्नी का कत्ल कर दिया गया। क्या वह खबर उसी तरह हमें विचलित करेगी जैसे कि सर कलम करके की जाने वाली इस हत्या ने किया? इस तरह के तुलनात्मक प्रश्न असंवेदनशील, क्रूर और अश्लील भी लग सकते हैं, क्योंकि यह किसी एक हत्या की गंभीरता को दूसरे के मुकाबले रख कर देखने की कोशिश करते हैं और इस तरह उसे कम करती है। मगर सवाल है कि क्या आधुनिकता की एक पहचान हिंसा करने वाले और उसके निशाने के बीच एक दूरी पैदा करना ही है, जिससे वह हत्या निर्वैयक्तिक हो जाए? 

अभी प्रश्न लेकिन इस्लामिक स्टेट का है। सीरिया और इराक के बीच सीमा को मिटा कर एक बड़े हिस्से को अपने कब्जे में लेने के बाद उसने खिलाफत का एलान कर दिया है और उसका इरादा मुल्कों की सरहदों को बेमानी बना कर इस खिलाफत का दायरा बढ़ाते जाने का है। राष्ट्र की कृत्रिमता से थके हुए लोगों को अंतरराष्ट्रीयता का यह अभियान कैसा लग रहा है, अब तक उन्होंने कहा नहीं है, लेकिन मौका देने पर वे इसके मुकाबले किसी राष्ट्र राज्य के बंधन में रहना पसंद करेंगे। 

पवित्रतर, शुद्धतर और क्रूरतर सुन्नी इस्लाम के इस संस्करण से अब सऊदी अरब के वहाबी इस्लाम को भी खतरा है, हालांकि अमेरिका और ब्रिटेन ही नहीं, उनके प्यारे इजराइल


को सऊदी अरब का अंतरराष्ट्रीयतावादी इस्लामी अभियान कभी बुरा नहीं लगा। सीरिया की अभी की हुकूमत के खिलाफ लोकप्रिय विद्रोह को समर्थन देने के नाम पर इस नए इस्लाम के हाथ अमेरिका और उसके सहयोगी सऊदी अरब ने कितने मजबूत किए हैं, इस पर काफी कुछ लिखा जा चुका है। अब भी इस्लामिक स्टेट को इससे खुशी ही होगी, क्योंकि इस समर्थन में आने वाले सारे हथियार उसके हाथ लगने वाले हैं। लेकिन अब सऊद खानदान को भी खतरा महसूस हो रहा है, क्योंकि इस्लामिक स्टेट विश्व सुन्नी इस्लाम का नेतृत्व उसके हाथ रहने देने के मूड में नहीं लग रहा। 

इस्लामिक स्टेट सिर्फ यजीदियों और ईसाइयों के लिए खतरा नहीं है, वह शिया आबादियों के लिए तबाही का संदेश है। इसलिए इस समय ईरान इराकी नेतृत्व में परिवर्तन के लिए तैयार हो गया और अब इस्लामी स्टेट विरोधी मुहिम में अमेरिका को उसका साथ लेने से परहेज नहीं है। 

इस्लामिक स्टेट का अभियान वास्तव में अंतरराष्ट्रीय है। फोले का सर कलम करने वाला ब्रिटिश नागरिक है। अनुमानत: इस धर्मयुद्ध में दो हजार यूरोपीय नागरिक हैं, जिनमें पांच सौ ब्रिटिश हैं। यूरोप और ब्रिटेन में गहन मंथन हो रहा है कि उनकी आधुनिकता के प्रशिक्षण में कहां कमी रह गई कि इस्लामी हुकूमत का आकर्षण उनके युवाओं को हजारों मील दूर खींच ले जा रहा है। 

आधुनिक विश्व को इस पर भी विचार करना होगा कि मानवता का उसका विचार कितना विस्तृत है। जब ओबामा का एलान आया कि वे ईसाइयों और यजीदियों को इस सुन्नी धर्मयोद्धाओं के जनसंहार का शिकार बनने से बचाने को सैन्य अभियान करेंगे तब फिस्क ने ही प्रश्न किया था कि ओबामा को यह खयाल तब क्यों नहीं आया, जब इराक में शियाओं का संहार हो रहा था। फिलस्तीनियों पर इजराइल का ऐसा ही बेरहम हमला हो रहा था, जो जारी है तो उसे जनसंहार कहने में क्यों आधुनिक सभ्य विश्व की जीभ ऐंठ गई और अगर इस्लामिक स्टेट का निशाना वे होते तो अमेरिका उन्हें बचाने को निकलता? उनका सवाल यह भी है कि 1915 में तकरीबन पंद्रह लाख आर्मीनीयाई ईसाइयों के संहार को पश्चिमी दुनिया, अमेरिका समेत, आज तक जनसंहार क्यों नहीं कह पाई है? कौन-सा संहार जनसंहार है और कौन-सा नहीं, यह किस नैतिकता से तय किया जाता है? 

इस्लामिक स्टेट के योद्धाओं को विश्वास है कि वे धरती से बुराई, शैतानियत को जड़ से उखाड़ने का पवित्र कार्य कर रहे हैं और इसके लिए वे जान लेने और देने को तैयार हैं। इसे देख कर अनेक इस्लाम के मतावलंबी कह रहे हैं कि यह असली इस्लाम नहीं है। कुछ दिन पहले यह बात अल कायदा के बारे में की जा रही थी। हर कुछ दिन के बाद एक नया असली इस्लाम, जो पहले संस्करणों के मुकाबले अधिक पवित्र होने का दावा करता है, अवतरित होता है। इस्लामी दुनिया में, अगर कोई ऐसी एक चीज है, इस परिघटना पर क्या बहस हो रही है? या वह अंदरूनी बहस है और बाहर वालों को उसे जानने का हक नहीं? 

आधुनिकता पर आरोप है कि उसने पारंपरिक समाजों की चेतना को खंडित कर दिया। लेकिन अगर धार्मिक परंपराओं में तर्क और विवेक की क्षमता है, तो उन्हें हत्या के आकर्षण, क्रूरता और धार्मिक शुद्धता के बीच के संबंध पर भी बात करनी चाहिए? इस सवाल का जवाब भी खोजना चाहिए कि वे आदर्श के रूप में आधुनिक राष्ट्र-राज्य को ही सामने क्यों रखते हैं और क्षेत्र विस्तार ही उनका प्रमुख मकसद क्यों है? हम अपने अनुभव से जानते हैं कि उदारता या मानवीयता और धार्मिकता के बीच कोई स्वाभाविक और सहज रिश्ता नहीं है। मानवीयता लगातार याद रखने और सीखने की चीज है और प्राय: धार्मिक गोलबंदियां उसकी गर्दन कलम करके ही की जाती हैं। इस्लामिक स्टेट का उदय और विस्तार भी यही साबित कर रहा है। 


फेसबुक पेज को लाइक करने के लिए क्लिक करें- https://www.facebook.com/Jansatta

ट्विटर पेज पर फॉलो करने के लिए क्लिक करें- https://twitter.com/Jansatta 

आपके विचार

 
 

आप की राय

सोनिया गांधी ने आरोप लगाया है कि 'भाजपा के झूठे सपने के जाल में आम जनता फंस गई है' क्या आप उनकी बातों से सहमत हैं?