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Friday, 12 September 2014 17:47

सुरेश पंडित

जनसत्ता 24 अगस्त, 2014: अरुण माहेश्वरी के लेख ‘वामपंथ के पास रास्ता क्या है’ (जनसत्ता, 6 जून) से उस छद्म से अनायास परदा उठाता दिखाई देता है, जिसे वे पिछले लोकसभा चुनाव में माकपा की करारी हार के कारणों की पड़ताल करने के बहाने उसके शीर्ष नेतृत्व की अकर्मण्यता और आत्ममुग्धता का बचाव करने के लिए इस्तेमाल करते नजर आते हैं। ऐसा करते हुए वे जो तर्क देते हैं उनमें और उन पेशेवर राजनीतिक विश्लेषकों के तर्कों में कोई अंतर दिखाई नहीं देता, जो समय की धड़कन को महसूस करने और जमीनी हकीकत से संपर्क बनाए रखने की क्षमता खो चुके होते हैं। और अपने पक्ष को सही साबित करने के लिए सच को झूठ और झूठ को सच प्रतिपादित करने में माहिर हैं। माहेश्वरी चार जून को हुई माकपा की पश्चिम बंगाल राज्य समिति की बैठक के बारे में अखबारों में प्रकाशित रिपोर्ट के हवाले से बताते हैं कि सदस्यगण पार्टी की अप्रत्याशित हार से न केवल बेइंतिहा उत्तेजित थे, बल्कि परोक्ष रूप से यह मांग भी कर रहे थे कि पार्टी-नेतृत्व इसकी जिम्मेदारी स्वत: अपने ऊपर लेते हुए पद छोड़ दे। वे इस आक्रोशमयी प्रतिक्रिया को कोई अकल्पनीय या अनहोनी घटना नहीं मानते और न ही ऐसे उत्तेजक माहौल में तुरत-फुरत पार्टी-नेतृत्व के सर्वांग कायांतरण को इस समस्या का स्थायी समाधान मानते हैं। 

शायद अरुण माहेश्वरी यह नहीं जानते या न जानने का दिखावा करते हैं कि जब कोई पार्टी अपने सदस्यों में से कुछ को श्रेष्ठतर मान कर नेतृत्व का दायित्व सौंपती और उसके कदमों को निस्संकोच अपना सहयोग प्रदान करती है तब वह नेतृत्व से यह तो अपेक्षा करती ही है कि उसके प्रयास पार्टी को आगे ले जाएंगे और उसके सदस्यों को आश्वस्त करेंगे कि उन्होंने सही व्यक्तियों का चुनाव किया है। लेकिन अगर ऐसा न हो, वह अपनी पार्टी को अर्जित मुकाम से आगे ले जाने में नाकाम रहे और बार-बार देश की राजनीतिक पार्टियों की दौड़ में उसे वांछित सफलता न दिला पाए तो निश्चय ही पार्टी के सामने नेतृत्व में आमूलचूल परिवर्तन के अलावा और कोई विकल्प बचता नहीं है। 

यह कैसी विडंबना है कि इस तथ्य को घोर परंपरावादी दक्षिणपंथी पार्टी भाजपा तो समझ लेती है और अपने उन सब नायकों को दरकिनार कर, जो पुराने हथियारों को चमका कर फिर से चुनावी युद्ध में उतरने की तैयारी कर रहे थे, एक ऐसे व्यक्ति को सामने ले आती है, जिसकी राष्ट्रीय राजनीति में कोई बहुत अच्छी पहचान नहीं थी। और उसकी एक ऐसे विकास पुरुष की छवि गढ़ती है, जिसके पास लोगों की सब तरह की मुसीबतों को हल करने का सामर्थ्य है और चुनाव में भारी सफलता पा लेती है। इसके बरक्स वह माकपा जो अंतरराष्ट्रीय राजनीतिक हलचलों पर पैनी निगाह रखती रही है, प्रगतिशील और परिवर्तनकामी है, अपने नेतृत्व को एकाधिक बार आजमा लेने और सही साबित न होने पर भी उसे बदलने को तैयार नहीं होती, क्योंकि उसे अब भी अपने उस स्वर्णिम अतीत पर विश्वास है, जो कभी अच्छे दिन लेकर जरूर लौटेगा। 

दरअसल, कसूर अरुण माहेश्वरी का भी नहीं है। यह तो एक ऐसा कर्मकांड है, जो हर चुनाव में मिली हार के बाद हर राजनीतिक पार्टी आत्ममंथन के नाम पर संपादित करती है। अन्य पार्टियों के संदर्भ में इस तरह का अनुष्ठान स्वाभाविक ही नहीं, अनिवार्य भी है, क्योंकि उनके पास विचारधारा के नाम पर कुछ भी नहीं है। अगर कुछ है भी तो उसे सजावटी अलंकरण से अधिक नहीं माना जाता। वे एक व्यक्ति या एक खानदान के भरोसे चल रही हैं। उनके पास जातीय, सांप्रदायिक, क्षेत्रीय या किसी भावनात्मक मुद्दे से जुड़ा जनाधार है। वे अगर अपनी विफलता के कारणों की खोजबीन भी करती हैं तो यह मान कर काम शुरू करती हैं कि वे अपने नायकों की कमजोरियों के बारे में कुछ नहीं कर सकतीं, इसलिए उन्हें नजरअंदाज कर छोटी-मोटी गलतियों को सुधार लेने का वादा कर अपना कर्तव्य निर्वाह कर लेती हैं। नीतिगत परिवर्तन पर कोई विचार नहीं होता, क्योंकि उनकी कोई स्थायी नीति नहीं होती। 

कुछ लोगों का मानना है कि माकपा का कांग्रेस के प्रति कुछ नरम रुख रखना भी उसकी हार का एक कारण हो सकता है। यों माकपा महासचिव प्रकाश करात चुनावों में कांग्रेस को हराने और भाजपा को ठुकराने की अपील करते रहे। लेकिन अगर उनकी अपील को मानते हुए जनता दोनों को सत्ता से बाहर रखने का निर्णय कर लेती तो उसके सामने ऐसा कौन-सा विकल्प होता, जो सरकार बना कर उसे पूरे पांच साल तक चला


सकता था, उस स्थिति में जब बाकी पार्टियां एक दूसरे के विरुद्ध तो लड़ ही रही थीं, किसी एक को अपना नेता तक मानने के लिए तैयार नहीं थीं। इसलिए जनता ने उस भाजपा को चुनना अधिक उपयोगी समझा, जो अपने सारे अतीत और उससे जुड़ी स्मृतियों को ताक पर रख कर विकास के एक नए वादे के साथ सामने आई थी। उसने अपने उन सब मुद्दों को एजेंडे से बाहर कर दिया था, जिनके चलते उसकी छवि विवादास्पद बन गई थी। 

लेखक का मानना है कि वाम पार्टियों के हारने के कारण वे नहीं हैं, जो सामने दिखाई देते हैं, बल्कि वे राजनीतिक भूले हैं जिन्हें वर्तमान नेतृत्व जानता तो है, पर मानना नहीं चाहता। पाठकों को याद होगा कि यूपीए की पहली सरकार बनवाने में तत्कालीन माकपा नेता हरकिशन सिंह सुरजीत ने काफी अहम भूमिका निभाई थी और माकपा जब तक सरकार के सही कामों को समर्थन देती रही और अन्य कामों के प्रति असहमति जता कर उन्हें रोकती रही, तब तक सरकार की छवि काफी चमकदार बनी रही। विपक्ष चाहे उससे रूठा रहा हो, आम लोग उसकी रीति-नीतियों से प्राय: संतुष्ट ही दिखाई देते रहे। लेकिन सरकार और वाममोर्चे के बीच निर्णायक अलगाव का अवसर तब आया जब सरकार परमाणु ऊर्जा संबंधी समझौते को संसद में पास कराने पर अड़ गई और वाममोर्चे के समर्थन वापिस लेने की धमकी भी उसे रोक नहीं पाई। सरकार तो बच गई, पर दोनों के रास्ते अलग-अलग हो गए। 

क्या कभी वाममोर्चे ने अपने इस कठोर कदम से हुए हानि-लाभ का आकलन करने की कोशिश की है? जिस समझौते का विरोध कर वह अलग हुआ था आज उसे जनता में कोई याद तक नहीं करता। क्या इससे यह सिद्ध नहीं होता कि वाममोर्चे ने एक अत्यंत मामूली मुद्दे पर सरकार का साथ छोड़ कर आगे कुछ और अच्छे काम करवा लेने के अवसर को खो दिया। काश, वाम मोर्चा सरकार के साथ बना रहता तो कुछ और अच्छे काम तो हो ही सकते थे, बेहिसाब भ्रष्टाचार और अन्य गलत कामों पर भी रोक लगी रह सकती थी। 

अरुण माहेश्वरी का कहना है कि माकपा के वर्तमान नेतृत्व की ओर से की गई भूलों के इतिहास में वे नहीं जाना चाहते, लेकिन वे यह स्वीकार भी करते हैं कि इन भूलों की वजह से ही माकपा ने एक राजनीतिक पार्टी के लिए जरूरी आंतरिक ऊर्जा को गंवाया है। दरअसल, माकपा जैसी प्रतिबद्ध काडर वाली पार्टी को सही दिशा देने और उसके देशव्यापी कार्यकर्ताओं को रचनात्मक कामों में लगाए रखने के लिए जिस तरह के पूर्ण परिवर्तन और सुधार के पक्षपाती (रेडिकल) और गत्यात्मक (डाइनेमिक) नेतृत्व की जरूरत है, वर्तमान नेतृत्व उसे पूरा नहीं कर पा रहा है। यही वजह है कि कभी अखिल भारतीय स्तर पर तीसरे नंबर की हैसियत रखने और अंतर्देशीय मुद्दों पर प्रभावी दखल रखने वाली पार्टी का इस दुर्दशा तक पहुंच जाना कि उसे ध्यान देने लायक तक न समझा जाए, मौजूदा नेतृत्व को किसी भी तर्क से दोष-मुक्त नहीं कर सकता। 

कभी माकपा एक अत्यंत गतिशील, जनवादी पार्टी हुआ करती थी। इसके साधारण सदस्य भी इससे जुड़े होने में गर्व महसूस किया करते थे। शोषित, वंचित लोग मानते थे कि उनके हकों के लिए लड़ाई लड़ने वाली कम से कम एक पार्टी तो है। लेकिन पिछले कुछ सालों में बहुत कुछ बदल गया है। अन्य राज्यों की क्या कहें, माकपा अपने गढ़ को भी सुरक्षित नहीं रख पा रही है। ऐसे में सवाल है कि पार्टी के इस अध:पतन के लिए कौन जिम्मेदार है या इसे इस स्थिति से उबारने के लिए क्या किया जा रहा है। कई बातें इसे अन्य पार्टियों से अलग और विशिष्ट बनाती हैं। इसलिए इससे अधिक ठोस और सकारात्मक कदम उठाने वाले नेतृत्व की अपेक्षा रखना किसी हालत में अनुचित नहीं माना जा सकता। 


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