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मतांतर: बचाव में दुष्प्रचार PDF Print E-mail
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Friday, 12 September 2014 17:46

असीम सत्यदेव

जनसत्ता 24 अगस्त, 2014: कमलेशजी का लेख ‘मार्क्सवाद का लासा’ (जनसत्ता, 27 जुलाई) पढ़ कर ऐसा लगा कि अब मोदी सरकार को आलोचना से बचाने का सबसे अच्छा तरीका यही है कि तथ्यों पर बहस न करके मार्क्सवाद और कम्युनिस्टों के खिलाफ कुत्सा प्रचार की झड़ी लगा दी जाए। इस तथ्य पर से ध्यान हटा दिया जाए कि टमाटर सौ रुपए किलो से भी ज्यादा महंगा हो गया, रक्षा क्षेत्र में विदेशी निवेश पूरी तरह खोल दिया गया, बीमा क्षेत्र में उनचास प्रतिशत विदेशी निवेश की इजाजत मिल गई आदि। जो इन बातों को ध्यान में रख कर बहस करे उसके बारे में कहा जाए कि उसमें तो बात समझने की क्षमता ही नहीं है। 

साम्राज्यवादी प्रचार-तंत्र और कम्युनिस्ट आंदोलन के भगोड़ों से जो सामग्री कमलेशजी को मिली, उन्हें सत्यवादी हरीशचंद्र के वचन मानते हुए उन्होंने लेनिन से लेकर वर्तमान वामपंथ पर अनाप-शनाप लांछन लगाए हैं। अब मोदी सरकार के कारनामे, उनके विचार, उनकी नीतियां गई भाड़ में, जवाब देना हो तो उन आरोपों का जवाब दो, जो कम्युनिस्टों पर लगाए जाते हैं। यहां सवाल उठता है कि क्या कम्युनिस्टों के गलत हो जाने से मोदी सरकार सही साबित हो जाएगी? दरअसल, साम्राज्यवादपरस्त नीतियों की हिफाजत और वकालत करने के लिए जरूरी है कि यह साबित किया जाए कि ‘इसका कोई विकल्प नहीं है’। इसी आधार पर ‘विनाशकारी नीतियों’ को ‘विकास का रास्ता’ बताया जा रहा है। 

फिर भी अगर कोई मोदी सरकार, भारतीय जनता पार्टी, राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ पर सवालिया निशान लगाए तो बिंदुवार जवाब दिया जाए कि:

- राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ एक सांस्कृतिक संस्था है। भारतीय संस्कृति और सभ्यता के प्रति समर्पित इस संगठन का किसी विशेष राजनीतिक दल से कोई संबंध नहीं है। इसमें भाजपा के अलावा कांग्रेसी, समाजवादी, बहुजन समाज पार्टी, द्रमुक, शिवसेना, तृणमूल कांग्रेस और इच्छानुसार कम्युनिस्ट भी शामिल होते रहते हैं। 

- नाथूराम गोडसे गांधीजी को समझाने गया था और अपनी तथा उनकी हिफाजत के लिए पिस्तौल ले गया था। दुर्भाग्यवश गलती से गोली चल गई और गांधीजी का निधन हो गया! 

- लालकृष्ण आडवाणी ने रथ-यात्रा सांप्रदायिक सौहार्द पैदा करने के लिए की थी। बिना घोड़ों वाली पेट्रोल-चलित गाड़ी को रथ बताते हुए उन्होंने जो यात्रा आरंभ की थी उसे रोका नहीं गया होता तो पूर्ण सौहार्द बन जाता।

- छह दिसंबर, 1992 को मुरली मनोहर जोशी, उमा भारती समेत तमाम भाजपाई


नेता बाबरी मस्जिद को बचाने के लिए गए थे और उन्मादी भीड़ से बार-बार उसे नहीं तोड़ने का अनुरोध कर रहे थे, लेकिन भीड़ ने उनकी एक नहीं सुनी और जब मस्जिद पूरी तरह टूट गई तो उमा भारती शोक के मारे पछाड़ खाकर गिर पड़ीं।

- गोधरा कांड के बाद गुजरात की जनता प्रतिशोध के लिए उतावली हो उठी। ऐसे में मुख्यमंत्री की हैसियत से नरेंद्र मोदी ने मुसलमानों की हिफाजत के लिए पूरे इंतजाम किए। गुजरात सरकार ने उनके बचाव में कोई कसर नहीं रखी। आज गुजरात के मुसलमान मोदी सरकार के अथक प्रयासों की बदौलत जिंदा हैं। 

- 1998 से 2004 तक का शासन अटल बिहारी वाजपेयी के नेतृत्व में चलाया गया। यह आजादी के बाद का स्वर्णयुग साबित हुआ। भारत में विदेशी निगमों का आना बंद हुआ। भारत से बेरोजगारी गायब हो गई। महंगाई का नामोनिशान नहीं रहा। आत्मनिर्भर और समृद्ध भारत में जनता खुशहाल रही, देश चमक गया। दुर्भाग्य से चुनाव प्रचार में यह सत्य उजागर नहीं हो पाया और 2004 में भाजपा के नेतृत्व वाली सरकार नहीं आ सकी। 

- राष्ट्रीय एकता स्थापित करने के लिए ही 2014 के चुनाव प्रचार में नरेंद्र मोदी ने तक्षशिला को बिहार का गौरव बताया, सिकंदर को गंगा-यमुना के मैदान में पराजित घोषित किया और भगत सिंह को काला-पानी की सजा पाने वाला कह दिया। मोदी के इस प्रयास को न समझने वाले उन्हें ‘अज्ञानी’ कह देते हैं, जबकि उनसे ज्यादा ज्ञानी प्रधानमंत्री कोई नहीं हुआ है। 

इन तथ्यों पर अंगुली उठाने वाले को नासमझ, पश्चिमी विचारों से प्रभावित आदि विशेषणों से नवाजा जाएगा। फिर किसकी हिम्मत होगी जो वर्तमान सरकार की आलोचना करे।


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