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प्रसंग: वस्त्र विचार नहीं व्यापार PDF Print E-mail
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Friday, 12 September 2014 17:41

प्रभु जोशी

जनसत्ता 24 अगस्त, 2014: इस भूमंडलीकृत भारत में स्त्री परिधान को लेकर आए दिन नित नई वैचारिक-वारदातें, जहां-तहां घटती रहती हैं। इधर किसी ने स्त्री के बदलते ‘वस्त्र विन्यास’ पर अपने विचार प्रकट किए नहीं कि उधर लगे हाथ, भभोड़ती भर्त्सनाएं उसको चौतरफा घेर कर चींथने लगती हैं। हिंदी के साहित्यग्रस्त बुद्धिजीवी की तो और भी दारुण दुर्गति हो जाती है। ऐसे में वह ‘वस्त्र’ से अधिक ‘निर्वस्त्र’ का प्रहरी बन जाता है। यहां यह स्मरण प्रासंगिक होगा कि इसके पूर्व भारत के उच्चतम न्यायालय के न्यायमूर्ति माननीय सीरिएक टी जोसेफ ने कहा था कि ‘युवतियां कम से कम पूजा स्थलों पर तो ऐसे परिधान धारण न करें, जिनसे छेड़-छाड़ की घटनाएं होती हैं।’ शायद उन्हीं दिनों शशि थरूर ने भी अपने स्तंभ में साड़ी का कुछ गुणगान कर दिया कि ‘यह भारतीय स्त्री के लिए सर्वाधिक गरिमापूर्ण परिधान है।’ तो नारी-स्वातंत्र्य के जत्थेदारों ने तुरंत बवाल खड़ा कर दिया था कि स्त्री के पहनावे को श्रेष्ठ-अश्रेष्ठ बताने वाले ये कौन होते हैं? 

जब से पश्चिम के वस्त्र व्यवसाय ने भारत में अपना वर्चस्व बढ़ाया है, स्त्री के पहनावे पर टिप्पणी करने वाले की तुरंत इतनी लानत-मलामत कर दी जाती है कि वह आखिरकार काम-कुंठित सांस्कृतिक शोहदों की गिनती में शामिल मान लिया जाता है। उसके गले में स्त्री-विरोधी ‘फासिस्ट’ की तख्ती टांग कर प्रायोजित चांदमारी शुरू होती है। फिर उसकी छवि को छलनी करने में प्रिंट और इलेक्ट्रॉनिक मीडिया लपकता हुआ सबसे आगे आ जाता है। क्योंकि भूमंडलीय समय का यह मीडिया, आरंभ से ही पश्चिम की ‘कल्चरल इकोनॉमी’ के हित में लगातार हवाई हमले करता आ रहा है। 

यह आकस्मिक नहीं कि हमारे यहां उदारीकरण के आगमन के साथ ही स्त्री-परिधानों में जो त्वरित उलट-फेर हुआ, उसमें परंपरागत भारतीय समाज में एक नितांत नई ‘सांस्कृतिक ग्लानि’ कल्चरल-मेलंकली को जन्म दे दिया। याद रखें कि यह वह सांस्कृतिक ठेस है, जो ‘लाइफ-स्टाइल’ के साथ पूर्णत: नालबद्ध है। शीतयुद्ध के दौर में रूस के विरुद्ध ‘लाइफ-स्टाइल’ शब्द को ही सांस्कृतिक रणनीति का एक अमोघ अस्त्र बनाया गया था। वही अस्त्र भूमंडलीकृत अर्थव्यवस्था में अब भारतीय समाज के भीतर सांस्कृतिक उलट-फेर में अचूक ढंग से उपयोग में लाया जा रहा है। आज अखबार सूचना से अधिक ‘लाइफ-स्टाइल’ में परिवर्तन को प्रतिबद्ध हैं। 

मार्क्स ने कहा था कि किसी भी समाज में परिवर्तन के लक्षण उसके ‘भीतर’ से पैदा हों, उसके पूर्व उस पर अगर ‘बाहर’ से परिवर्तन को प्रहार की तरह लाद दिया जाता है तो वह समाज ‘सांस्कृतिक अवसाद’ में भर कर धीरे-धीरे टूटने लगता है। शायद इसीलिए इस उत्तर-आधुनिक समय में ‘सामाजिक आघात’ को ही ‘सामाजिक विकास’ की तरह व्याख्यायित करने की वैचारिक युक्तियां चल रही हैं। 

बहरहाल, पिछले दिनों एक माननीय सांसद की स्त्री-परिधान पर की गई टिप्पणी से फिर हाहाकार मच गया। मीडिया ने अपनी वस्त्र-बबूला होने वाली प्रायोजित मुद्रा में उक्त टिप्पणी से द्रौपदी की मिथकीय त्रासदी का दृश्य खड़ा कर दिया। दरअसल, हकीकत यह है कि स्त्री-वस्त्र अब पूरी तरह बाजार के हाथ में है। इसलिए इन दिनों भारतीय समाज में इक्कीसवीं सदी की स्त्री, जो कपड़े ‘पहन’ या ‘उतार’ रही है, वह बाजार तय कर रहा है। वही बताता है कि स्त्री का कौन-सा अंग, किस जगह से कितना खुला-अधखुला या पूरा खुला रखना है कि वह ‘सेक्सी’ होने की पूर्ण अर्हता प्राप्त कर सके। वह स्त्री देह की ज्यामितिकी के आधार पर अध्ययन के उपरांत निर्धारित करता है कि स्त्री के ‘अग्रभाग’ या ‘पृष्ठभाग’ की वस्त्र-युक्ति कैसी हो, जो पहनने पर देह की ‘ऐंद्रिकता’ को केंद्र में ला दे। ठीक इस तरह केंद्र में ला दे कि पुरुष की ‘कामेच्छा’ में भूचाल भर दे! 

प्रसिद्ध मानवविज्ञानी और ‘फैशन’ समाजशास्त्र के अध्येता एएल क्रोबियर ने अपनी पुस्तक ‘वुमन ड्रेस फैशन’ में विश्लेषित करते हुए यह स्पष्ट स्थापना दी है कि ‘फैशन सामाजिक हैसियत की वह भाषा है, जो स्त्री को बदल कर उसकी ‘देह’ को ऐसे रूप में पेश करती है कि उसकी दैहिकता, पुरुष में एक नया पुंसत्व भरने लगे। वह स्त्री के प्रति पुरुष-दृष्टि को ‘शिश्न केंद्रित’ बनाती है। एकदम से माचो-मैन! वह पुरुष और स्त्री के मध्य ऐंद्रिकता या कामुकता का प्रतीकात्मक विनिमय पैदा करती है। वह लैंगिक विभाजन को तीव्र करती हुई, उसमें चुनौती भरती है। वह आमंत्रण की भाषा गढ़ती है। इस बात का प्रमाण अमेरिका में समलैंगिकों और एलजीबीटी के ड्रेस कोड की तरह चिह्नित लो-वेस्ट जींस की फिटिंग को लेकर बनाई गई, विज्ञापन फिल्म की मूल अवधारणा पर बात करने से मिलता है। 

बहरहाल, जो स्त्री-परिधान के चयन में स्त्री की स्वतंत्रता की वकालत करते हैं, उन्हें यह जानना चाहिए कि यह मसला स्त्री-देह का ‘उपभोग मूल्य’ गढ़ने के सामाजिक मनोविज्ञान की रचना करने का है। दरअसल, ऐसे में  किसी भी सांस्कृतिक आपत्ति को खारिज करने के लिए ‘अवधारणात्मक समाधान’


की तरह स्त्री-स्वातंत्र्य के प्रश्न को लाना, परिष्कृत वैचारिक धूर्तता है! ध्यान दीजिए कि पश्चिम की ‘जीवन-शैली’ को भारत में बेचने वाली अर्थव्यवस्था ने यहां के वस्त्र व्यवसाय के अध्ययन में पाया कि अस्सी हजार करोड़ का व्यवसाय करने वाली फ्री साइज वाली भारतीय साड़ी ही उसकी प्रथम शत्रु है। क्योंकि उसे मां पहनती है, बेटी भी पहन लेती है और तो और ‘मैचिंग’ का ब्लाउज ढूंढ़ कर पड़ोस की भाभी या चाची भी पहन लेती है। यह सुविधा परिधान में भागीदारी के लिए भी गुंजाइश बनाती है।  

कुछ आरंभिक वर्षों तक ‘वेस्टर्न गारमेंट ट्रेड’ के लिए संकट यह था कि उसके जींस और टॉप अट्ठारह-उन्नीस हजार करोड़ पर ही रुके हुए थे, जबकि साड़ी अस्सी हजार करोड़ के आंकड़े के पार जा रही थी। किसी भी स्त्री के लिए टॉप पहनना ऐसा था जैसे बैठक में कोई स्त्री केवल ब्लाउज पहन कर आ जाए। बगैर पल्ले या दुपट््टे के बाहर आना स्त्री को सांस्कृतिक-संकोच से भरता था। पल्ला या दुपट््टा भारतीय स्त्री की ‘यौनिक निजता’ को ढांपता था। बस यही वह जगह थी, जहां से उन्होंने परिवर्तन की सेंध लगाई। पहले उन्होंने दुपट््टे को विज्ञापनों में उसके परंपरागत स्थान से ऊपर उठ कर गले में लिपटा दिया। दूसरे चरण में वह युवती के कंधे पर आ गया और तीसरे तथा अंतिम चरण में वह कंधे से उड़ा दिया गया। 

यह भारतीय स्त्री की ‘यौनिक निजता’ का बाजार के हित में पूर्णत: एक नया लोकार्पण था। जो देह का गोपन था, वह अब खुला और ‘पब्लिक स्फीयर’ में था। इस तरह देह का वह भाग, जो अभी तक आवरण के नीचे था, अब वह प्रदर्शन की पूंजी की हैसियत हासिल करने लगा। दुपट््टे और आंचल की विदाई ने स्त्री के सांस्कृतिक संकोच को तोड़ कर टॉप के लिए निर्विघ्न जगह बनाई। वक्ष-संधि को अनावृत्त रखने का वस्त्र-विन्यास स्त्री की ‘आमंत्रित करती’ ऐंद्रिकता का नया व्याकरण गढ़ने लगा। 

टेलीविजन के परदे से ओनली विमल, गार्डन बरेली और खटाऊ की पल्ला लहराती साड़ियों के विज्ञापन गायब हो गए। साड़ी आधुनिक युवती के लिए लज्जास्पद परिधान हो गया। साड़ी की पहचान विश्वविद्यालयी परिसरों में तो एक भोंदू और ‘भैनजी’ टाइप की युवती का पिछड़ा पहनावा बना दी गई। अब साड़ी के साथ बनने वाला ‘रूप-संकल्प’ जींस-टॉप के चलते ‘देह संकल्प’ में बदल गया। देह के केंद्र में आते ही उसे बाजार के उपभोगवाद ने ‘सेक्स आॅब्जेक्ट’ में अवघटित कर दिया। अब औरत का सब कुछ केवल ‘सेक्सी’ की तरह चिह्नित है। 

कुल मिला कर, पश्चिम का फैशन उद्योग आज भारत में एक ‘सर्वसत्तावादी राज्य-शक्ति’ के समांतर है। उसने जातीय अस्मिता का पूरी तरह अपहरण कर लिया है। यही वजह है कि अब स्त्री के परिधान पर टिप्पणी, तिरंगा ध्वज के अपमान से कहीं ज्यादा विवाद खड़ा कर सकने की स्थिति में है। पिछली बार जब टोरंटो में कुछ स्त्रियों पर वहां की पुलिस द्वारा उनके वस्त्रों पर टिप्पणी की गई तो प्रतिक्रिया में यहां जंतर मंतर पर महानगरीय अभिजात वर्ग की वामाओं द्वारा ‘बेशर्मी’ मोर्चा निकाला गया था। दरअसल, यह ‘स्त्री के सम्मान’ की एक मिथ्या लड़ाई थी, जो पश्चिम के परिधान-व्यवसाय द्वारा प्रेरित और प्रायोजित थी। 

यह बौद्धिक रूप से दिवालिया समाज का प्रमाणीकरण है कि वह अपने समाज के असली संकटों की पहचान की क्षमता ही खो बैठा है। जिस देश के अंचलों में स्त्रियों को तन ढंकने के लिए जरूरी कपड़े तक नहीं हैं, न पेट भरने के लिए रोटी, वहां पश्चिम की ‘खोखले और विचारहीन विचार’ के अनुकरण से बन रही ‘परिधान प्रवृत्ति’ पर संसद में बवाल मच रहा है। देह की ऐंद्रिकता को केंद्र में लाकर भारतीय स्त्री को केवल उत्तेजना और कामुकता के प्रतीक में बदलने वाले वस्त्र-विन्यास को स्त्री की स्वतंत्रता और सम्मान से जोड़ना निर्विवाद रूप से राष्ट्रव्यापी मूर्खता है। यह निहायत धोखादेह किस्म का कथन है कि ‘वस्त्र का कामुकता से कोई रिश्ता नहीं है’। यह फैशन व्यवसाय द्वारा पैदा किए जा रहे असाध्य अंधत्व से अधिक कुछ भी नहीं है। 


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