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कभी-कभार: मित्र-निधन PDF Print E-mail
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Friday, 12 September 2014 17:36

अशोक वाजपेयी

जनसत्ता 24 अगस्त, 2014: यूआर अनंतमूर्ति का निधन एक पुराने, अंतरंग और निहायत जागरूक मित्र का निधन है। एक समृद्ध, पर भारतीय साहित्य-जगत में अपेक्षाकृत अल्पज्ञात भाषा का लेखक कैसे अपनी गहरी प्रश्नाकुल सर्जनात्मकता, उदग्र कल्पनाशीलता, बौद्धिक साहस और अदम्य नैतिक दृष्टि से अखिल भारतीय कीर्ति उपलब्ध करता है, इसका अनंतमूर्ति बहुत उजला और अत्यंत स्मरणीय उदाहरण थे। 1967 में पुणे के एक परिसंवाद में उनसे पहले-पहल मुलाकात हुई थी: उसमें दिलीप चित्रे, गोपालकृष्ण अडिग और निस्सीम एजेकिएल से भी पहली बार भेंट हुई थी। एक बहस के दौरान अनंतमूर्ति ने एक चिट पर यह लिख कर मुझे भेजा कि यहां आप मुक्तिबोध की बात कर सकते हैं। तबसे हमारी मित्रता शुरू हुई, जो बाद में खासी निकटता में बदल गई। हमने कई काम साथ किए और बहुत सारे अनेक कारणों से नहीं भी कर पाए। 

वे विचार और बुद्धि के लोकतंत्र की बढ़िया मिसाल रहे। सत्ता और राजनीति में गहरी दिलचस्पी रखते हुए भी वे दोनों से बिल्कुल अनातंकित थे। याद आता है कि साहित्य अकादेमी के अध्यक्ष के रूप में उन्होंने ही अकादेमी पुरस्कार किसी राजपुरुष के बजाय स्वयं अकादेमी के अध्यक्ष द्वारा दिए जाने की प्रथा कायम की। हकसर समिति की एक सिफारिश को, जिसके अनुसार साहित्य अकादेमी का अध्यक्ष भी, एक खोज समिति की अनुशंसा पर सरकार द्वारा नियुक्त किया जाना था, अस्वीकार किया और उसके स्वयं अकादेमी द्वारा चुने जाने के प्रावधान को, स्वायत्तता के आधार पर, जारी रखने का निर्णय कराया। 

उसी दौरान उन्होंने भारतीय भाषाओं के पक्ष में लगातार आग्रह करने की शुरुआत की और इस ओर ध्यान दिलाया कि अंगरेजी की तुलना में भारतीय भाषाओं में लिखा जा रहा साहित्य न सिर्फ अधिक मूलबद्ध है, बल्कि अधिक नवाचारी, हमारी सामाजिक-सांस्कृतिक सच्चाइयों में रसा-बसा, अधिक निर्भीक, कल्पनाशील और साहसी है। हम दोनों ने मिल कर भारत सरकार के सामने ऐसे ही साहित्य को संसार की प्रमुख भाषाओं में अनुवाद कराने और प्रकाशन कराने के उद्देश्य से ‘इला’ (इंडियन लिटरेचर एब्राड) की एक स्वायत्त संस्थान की स्थापना का प्रस्ताव रखा और काफी जद्दोजहद कर अंतत: उसे मंजूर करा लिया। संस्कृति मंत्रालय से अब वह साहित्य अकादेमी में आ गया है: पिछले वर्ष जब बांग्ला लेखिका नवनीता देव-सेन और मैं अनंतमूर्ति से मिलने साथ ही बंगलुरु गए थे, तो अपनी अस्वस्थता के बावजूद, वे ‘इला’ की स्थिति और हश्र की चिंता कर रहे थे। 

अपनी समाजवादी पृष्ठभूमि के प्रति वफादार रहते हुए अनंतमूर्ति ने हमेशा, कई बार बहुत जोखिम उठा कर भी, सांप्रदायिकता, संकीर्णता, धर्मांधता, जातिवाद आदि के विरुद्ध अपनी आवाज उठाई। सिर्फ कर्नाटक में नहीं, पूरे भारत में एक सार्वजनिक बुद्धिजीवी के रूप में वे जो कहते थे उसे ध्यान से सुना-सोचा जाता था। उनके बाद शायद पूरे भारत में ऐसा एक भी लेखक नहीं बचा, जिसे ऐसा प्रभावशाली सार्वजनिक बुद्धिजीवी कहा जा सके। अनंतमूर्ति ने कन्नड़ भाषा और इसलिए भारतीय भाषाओं में अधिक प्रश्नवाचक, आत्मालोचक, नैतिक रूप से सजग और जिम्मेदार, लोकतांत्रिक बहुलता स्वीकार करने वाली और अपनी सामाजिक और सांस्कृतिक विडंबनाओं और अंतर्विरोधों का साहस के साथ सामना करने वाली आधुनिकता के रूपायन में निर्णायक भूमिका निभाई। 


दैनंदिन महाभारत

हम बरसों से यह कहते आए हैं कि जो भारत में रहता है वह लगभग रोज ही हमारे महाकाव्य ‘महाभारत’ में भी रहता है: भारत में रहना और महाभारत से बच पाना एक साथ संभव नहीं है। गालिब ने तो कहा था: ‘होता है शबोरोज तमाशा मेरे आगे!’ हम कह सकते हैं कि भारत में हर रोज होता है महाभारत मेरे आगे। कोई और सभ्यता इतनी महाकाव्य-प्रेरित नहीं है, जितनी हमारी। ‘महाभारत’ भारतीय सर्जनात्मकता और कला के लिए एक अक्षय स्रोत भी रहा है: आज तक है। नया उजला और बेहद उत्तेजक प्रमाण है ओड़िया कवि हरप्रसाद दास की लंबी कविता, जिसे प्रभात त्रिपाठी के सुंदर-सुघर हिंदी अनुवाद में, ‘वंश: महाभारत कविता’ शीर्षक से राजकमल प्रकाशन ने छापा है। 

प्रभात ने उचित ही कहा है कि ‘अपने लोकजीवन के दैनिक समय में जीते-मरते लोगों के बीच, परिवेश की पास-पड़ास की छवियों से रूबरू होते हुए, हम पाते हैं कि महाभारत हमारे लिए महज किसी दूरस्थ क्लासिकी ऊंचाई या गहराई का प्रतीक या रूपक भर नहीं है। लोकजीवन की साधारण सांप्रतिकता में, परिवार के संस्कारों में, किस्सों की तरह बसा महाभारत, हरप्रसाद की सर्जना के माध्यम से, हमारी आंतरिकता का एक मार्मिक दस्तावेज बन जाता है।’ यह उल्लेखनीय है कि यह कमाल महाभारत का तो है ही, हमारे समकालीन हरप्रसाद का भी है कि वे फिर महाभारत रचते हैं। यह कहने में कोई संकोच नहीं है कि यह काव्य सभ्यता का काव्य है: वह हमारी सभ्यता की अंतर्ध्वनियों,


अंतर्विरोधों, विडंबनाओं और संभावनाओं को गूंथता है ऐसे मुहावरे में जो एक साथ प्राचीन और अर्वाचीन है। 

उसमें समय के द्वैत अतिक्रमित होते हैं: कविता एक साथ काल और समय को संबोधित है। यह महाकाव्य इस अर्थ में भी है कि वह हमारे अतीत को वर्तमान बनाता है: यह पुरानी कथा नहीं, आज की नई कहानी है। यह हमारे मानवीय अस्तित्व और नियति को खंगालता-नबेरता है: उसका सच परम और अवेध्य नहीं है। वह सच प्रक्रिया में बनता-बिगड़ता-संवरता है- यह प्रक्रिया प्रश्नाकुलता, व्यग्रता, आशा-निराशा, साहस-कायरता, संकल्प-विकल्प आदि की राहों से गुजरती है। हर मुकाम पर वह अपने को देखती-परखती भी चलती है, कुछ इस तरह कि जैसे उसका अपने से अलग कोई गंतव्य नहीं है, कोई और परिणति की ओर वह हमें नहीं ढकेलती। यह निरी काव्य-युक्ति नहीं है- इसके पीछे गहरी नैतिक चेतना सक्रिय है। अपने पूर्वजों की उपस्थिति उसमें सहज और अनिवार्य है, मानो काल के आरपार हम एक ही फैले हुए परिवार हैं, जो संकट में, तनाव में, विभीषिका में पड़ता-फंसता है और आगे का रास्ता खोजता-गंवाता है। एक अंश देखें:

मेरे भीतर कौन-सी पराजय है, कौन जाने

सारी जीत के भीतर वह जो थोड़ा संदेह रहता है

वही सनसनाता है मेरी धमनी में

मैं फिर अपने को रख नहीं पाता

अपनी मनस्कामना में

चित्र होता हूं, परछार्इं होता हूं

अयस्कांत प्रतिमा भी होता हूं

हाथ के धनुष से निकल कर तीर

खोजता है नष्ट नीलिमा में

मेरा अवशेष

चाहे वह मुझे मिले या न मिले...

इस काव्य-संसार में वस्तुएं भी सजीव होती हैं: ‘लकड़ी भी मेरी लकड़ी नहीं/ वनस्पति से लाता हूं मैं उसकी आत्मा/ जो कुल्हाड़ी की चोटों से छटपटाती रहती/ अव्यक्त उसका रोना भटकता रहता/ जंगल में चुपचाप/ उसे हृदय संपुट में संचित कर/ मैं गढ़ता हूं काठ/ अपनी सर्जना की विचित्र घड़ी में/ नहीं होता वहां, कुछ काटने कुछ चीरने/ जला कर राख करने या घुन लगने के लिए/ होती है केवल सहने की, इच्छा से आकार देने की परिपाटी/ इच्छा ही केवल’।

हमारा सभ्यता-काव्य प्रश्नाकुल न हो यह संभव और समीचीन न होगा: ‘मैं दिखता हूं मुझे देखो तुम्हारी तरह/ या तुम्हारे पुरखों की तरह/ मेरे चेहरे पर स्मृति की काई जम-जम कर/ पत्थर कर चुकी मुझे/ किंवदंती-सी कथा के रूपक से निकल कर/ आड़ा तिरछा चलती मेरी चाल पार कर चुकी कई-कई युग/ यहां असत्य का खेल देख कर अटकने के समय/ पांवों से झरती धूल/ कंधों से चमकती बिजली, जमा होती मिट््टी में/ कोई नहीं, कोई नहीं, का हाहाकार/ मंडप में खुद को खुद ही देता हूं सांत्वना/ घास की सेज पर रखा है कलश अकेला/ पूर्ण से पूर्ण को जाने के इस दुर्गम रास्ते पर’।

समापन में कृष्ण आत्मवक्तव्य है। सारी कविता कई चरित्रों के (जिनके नाम आपको अपने से याद करने, पहचानने होते हैं) आत्मवक्तव्यों का एक सिलसिला है। अंतिम अंश में ये पंक्तियां दृष्टव्य हैं: ‘मेरे बच्चे मदमस्त हैं अपने-अपने मरण में/ आधे तो मर चुके बीमारी में/ बाकी आधे मारकाट करते मरेंगे एक न एक दिन/ मेरी आंखों के सामने डूब जाएगा आंखों का तारा/ शायद इसके बाद आएगी एक और जिंदगी/ मरण के उस पार से/ पुकारेगी ओ कृष्ण, चलो पीले कपड़े में गंठिया लो मुट्ठी भर ताराधूल/ फेंक दो मुड़ा तुड़ा मयूर पंख/ पके घुंघराले बालों में खोंस लो कोई झरा पत्ता/ रास्ता देखते चीन्हते आओ, आओ मेरे पास/ काल शेष नहीं हुआ, काल बैठा है, हाथ में है/ एक और भूमिका का पात्र मंच और यवनिका/ सब कुछ तैयार अपेक्षा सिर्फ नायक की’।

इधर-उधर इतनी सारी उजली मार्मिक पंक्तियां हैं कि आंख बार-बार ठिठकती है: ‘मेरे भीतर तुम हो, मैं भी हूं/ ग्रह तारे तृण तिमिर सभी हैं/ पितृ पुरुषों की ढेर-ढेर अस्थि लेकर/ निकले हैं संवत्सर शताब्दी अनंत’। ‘संहार के हाथों से/ सृजन की कला लेकर कौन गया/ कितने जीवनों की स्मरणिका लिखते-लिखते/ क्षुद्र शिलालेख हमारे इस जीवन का नष्ट हो गया’। 

‘वंश’ बड़ी कविता है: वह भारतीय सभ्यता में गृहस्थ एक कवि ने लिखी है और हमें फिर याद दिलाया है कि हम अब भी महाभारत में रहते हैं।  


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