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पुस्तकायन: मिथक का सामयिक संदर्भ PDF Print E-mail
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Friday, 12 September 2014 17:33

देवशंकर नवीन

जनसत्ता 24 अगस्त, 2014: काशीनाथ सिंह अपने उपन्यास उपसंहार में विषय-वस्तु और भाषा-शिल्प की अपनी पूरी छवि के स्थापित विधान को त्याग कर अचानक नए रूप में सामने आए हैं। यह उत्तर-महाभारत की कृष्ण-कथा है। यानी महाभारत युद्ध के बाद कृष्ण की द्वारका वापसी और उनके शेष जीवन की व्यथा-कथा। काशीनाथ सिंह इस उपन्यास के जरिए पद-मद-ऐश्वर्य के आखेटकों को उन सवालों और अवश्यंभावी घटनाओं से सामना करा रहे हैं, जिसकी चिंता से वे छुद्र लिप्साओं के कारण बेफिक्र हैं, उन्हें नहीं मालूम कि वे कहां जा रहे हैं। 

महाभारत युद्ध की समाप्ति के बाद द्वारका लौटी बची-खुची नारायणी सेना से वीरगति प्राप्त सैनिकों की सूचना पाकर शोकाकुल परिजनों की निश्शब्द भीड़ देख कर अपने नगर लौटे हुए द्वारकाधीश के आत्ममंथन से उपन्यास की कथा शुरू होती है और सर्वश्रेष्ठ निषाद धनुर्धर जरा के तीर-प्रहार से उनके देह-त्याग पर समाप्त होती है। 

कंसवध के बाद मथुरा पर जरासंध के हमलों से ऊब कर यादव कुल को बचाने के लिए जो कृष्ण द्वारका आ बसे; जिस कृष्ण ने बाल्यकाल से ही राजाओं के आततायी, क्रूर और बर्बर आचरण देखे थे, चाटुकारिता और नृशंसता देखी थी, भयत्रस्त जनता की आंखों में आतंक का साया देखा था; उस कृष्ण के मन में द्वारका बसाना एक सपना था। वे रैवतक पर्वत के पास कुशस्थली जैसी मनोरम जगह में आकर द्वारका के रूप में ऐसा गणराज्य बनाना चाहते थे, जहां भव्य और निर्भीक नागरिक जीवन हो, जहां के राजा लोक के महत्त्व को जाने-समझें। यादव कुल की आपसी खींचातानी से परिचित कृष्ण के लिए ऐसे गणराज्य का गठन चुनौतीपूर्ण काम था, पर उन्होंने ऐसा किया। 

द्वारका में स्थिर होने के बाद क्रूर, अहंकारी, बर्बर शासकों और दानवों का सफाया करने की नीयत से वे आर्यावर्त के दूसरे छोर प्राग्ज्योतिषपुर (असम) तक गए और क्रूर दानव नरकासुर को परास्त किया। विभिन्न वंशों, जातियों, राज्यों की सोलह हजार रूपसी युवतियों को भौमासुर के कैद और उसके अत्याचार से मुक्त कराया। उनकी सम्मान-रक्षा के लिए उन्हें द्वारका ले आए और उनके बीच अपने नाम का मंगलसूत्र बंटवाया। मगर कृष्ण की उस पीड़ा को कौन समझे कि उनके ही द्वारा स्थापित गणराज्य के छोरे उन स्त्रियों पर कुदृष्टि डालते घूमने लगे। वीरगति प्राप्त योद्धाओं की जिन संतानों से उन्हें अपेक्षा थी कि वे अपने पिता से दो-चार हाथ आगे जाएंगे और अपनी कलाओं से त्रिभुवन को चमत्कृत करेंगे; वे व्यभिचार में डूब गए। 

सारथि दाररुक से किए गए प्रश्न ‘भगवान होने के लिए पत्थर होना जरूरी है क्या’ में कृष्ण की घनघोर पीड़ा को अनुभव किया जा सकता है। कृष्ण ने जिस द्वारका गणराज्य की स्थापना के लिए सारी चुनौतियों का सामना किया; सर्वत्र सभ्य नागरिक जीवन व्यवस्थित करने के लिए निर्लिप्त लड़ाइयां लड़ीं, जिस यादव कुल की रक्षा के लिए इतने उद्यम किए; अब वही कृष्ण जीवन के अधोभाग में अपने ही अहंकार और नीति विरुद्ध आचरणों के कारण यदुवंश का नाश होते देख रहे हैं। 

कथा की प्रामाणिकता बनाए रखने के लिए काशीनाथ सिंह ने कई प्राचीन, अर्वाचीन ग्रंथों का सहारा लिया है। उन्होंने अपनी ओर से कथासूत्र में कहीं कल्पना की कील नहीं ठोंकी है। उनकी प्रस्तुति निश्चय ही नई है। कहते हैं कि बड़े लेखकों को कोई बड़ी बात कहने के लिए जब समकालीन तौर-तरीके नाकाफी लगने लगते हैं तो वे अपनी चिंता का हल ढूंढ़ने अतीत में चले जाते हैं। वहां उन्हें कोई न कोई हल अवश्य मिल जाता है। 

आज खुद को सामाजिक कार्यकर्ता और देश के सेवक घोषित करने वाले जिस तरह के अनाचारों में लिप्त हैं; आक्षेपों-प्रत्याक्षेपों से वाग्युद्ध करते हुए पूरी पीढ़ी को उद्दंडता का प्रशिक्षण दे रहे हैं; समाज में बहू-बेटियों के साथ अनाचार हो जाता है और सत्ताधीश उसे अपने पक्ष में भुनाने लगते हैं; उन्हें भान तक नहीं होता कि जिस प्रभुत्व के लिए वे इतने बड़े पापाचार में लिप्त हो रहे हैं, वह कितनी देर उनके साथ रहेगा!... काशीनाथ सिंह को यह पीड़ा वर्षों से बेधती रही है। पर इस समय देश की जो दशा है, उसमें वे भी द्वापर के कृष्ण की पीड़ा से व्यथित हैं। 

यह उपन्यास भारत के राजनीतिक और प्रशासनिक ढांचे पर एक झन्नाटेदार तमाचा है कि खुद को भगवान समझने वाले जनरक्षको! कभी तुम भी कृष्ण की तरह अपने पालितों के आचरण से व्यथित होकर कुछ रास्ता निकालो। कृति के कथा-विधान और भाषा-शैली में धिक्कार-धमकी के सारे रूप बहुलता से मौजूद हैं। 

भारतीय साहित्य में ऐतिहासिक-पौराणिक संदर्भों पर कथात्मक पुनर्कथन की पुरानी परंपरा है। कई पुनर्कथन अब तक हो चुके हैं, पर अधिकतर प्रसंगों में देखा गया है


कि वहां कला-कौशल के हस्तक्षेप से इतिहास-पुराण की प्रामाणिकता खंडित हुई या फिर कथा की गति बाधित हो गई है। मगर ‘उपसंहार’ में पौराणिकता के साथ-साथ शिल्प की गति भी बनी हुई है। हर अंश में लेखक ने इस पौराणिक कथा की समकालीन उपादेयता बताई है। 

इस उपन्यास की कथाभूमि में काशीनाथ सिंह ने अलग से कुछ नहीं जोड़ा है, पर विलक्षण शिल्प और भाषा की रवानगी में नहा कर वे पौराणिक और मिथकीय प्रसंग तरोताजा और संपूर्ण उपादेयता के साथ समकालीन हो गए हैं। कृष्ण-गाथा से परिचित लोग इन शृंखलाबद्ध घटनाओं से परिचित हैं। पर काशीनाथ सिंह का रचना-कौशल यहां उनके विलक्षण अवलोकन का सबूत पेश करता है। 

युद्ध में जय-पराजय किसी भी पक्ष का हो, नुकसान तो दोनों का होता है। जिस महाभारत को धर्मयुद्ध कहा गया, उसकी शिराओं से अनर्थ के कितने अंखुवे फूटे, उसके बाद कृष्ण की मनोदशा क्या हुई, यह किसी इतिहास-पुराण में कृष्ण के वक्तव्य के रूप में दर्ज नहीं है। काशीनाथ सिंह ने भी इस उपन्यास में दर्ज करने की मशक्कत नहीं की है, पर प्रसंगों की उपस्थापन शैली से उन्होंने मानवीयता के पक्षधर कृष्ण की पीड़ा के रूप में और उनके द्वारा गठित द्वारका गणराज्य के लोकचेतना-संपन्न नागरिकों की जीवन-व्यवस्था के रूप में निरंतर स्पष्ट हुई है। 

बेटों की प्रतीक्षा में खड़े वृद्ध, पिताओं की प्रतीक्षा में खड़े बच्चे, पतियों की प्रतीक्षा में खड़ी ग्वालिनें, भाइयों की प्रतीक्षा में खड़े चरवाहों की मनोदशा भांप कर कृष्ण इस तरह बेचैन हुए कि उन्हें गोशाला में बंधी गउओं के रंभाने की ध्वनि तक सुनाई नहीं दे रही थी। युद्धोत्तर परिदृश्य के ऐसे स्वरूप, उनके प्रभुत्व-प्रचार के कारण यदुवंश की संततियों की ऐसी विवेकहीनता के बारे में कृष्ण जैसे नीतिज्ञ ने कभी पहले सोचा होगा? सवाल कृष्ण के सोचने, न सोचने का नहीं, आज के भारत की राजनीतिक-प्रशासनिक परिस्थिति का है। सारी नीतियों को ठोंक-बजा कर लागू करने वाले कृष्ण कुछ तो अपने विवेक चिंतन से, और कुछ परिजनों-प्रजाजनों के आक्षेपों से पीड़ित हैं, उन आक्षेपों से तो कुछ ज्यादा ही, जिसकी आड़ में यदुवंश की नई पीढ़ी निरंतर दुश्वृत्तियों के गड्ढे में गिरती जा रही थी। 

सर्वाधिक प्रेरक प्रसंग तो अधोकाल में देखे गए कृष्ण के वे सपने हैं, जिनमें प्रपंच से मारे गए एक-एक योद्धा उनके शयनकक्ष में आकर उनकी भूलें बताते हैं। कृष्ण के मस्तिष्क में जयद्रथ, कर्ण, दुर्योधन आदि की प्रपंचपूर्ण हत्याओं का लेखा-जोखा लगातार इस तरह कौंधता है कि वे सारे प्रसंग उनके सपनों के अंग बन गए हैं। वर्तमान व्यवस्था के पोषकों, पालकों, भुक्तभोगियों के लिए कृष्ण की वह स्वीकारोक्ति विराट प्रेरणा का स्रोत है, जिसमें वे अपने सारथि दारुक से कहते हैं- ‘मेरे उपदेश के बाद अर्जुन की दृष्टि भले कर्म पर टिकी रह गई हो, मेरी दृष्टि बराबर उसके परिणाम पर बनी रही- अपनी प्रतिष्ठा के लिए, अपनी मर्यादा के लिए, अपने ऐश्वर्य के लिए। मुझे हर हाल में युद्ध जीतना ही था- चाहे धर्म भंग हो, चाहे नियम टूटे। हार जाता तो कौन-सा मुंह दिखाता दुनिया को... उस समय मैंने यह नहीं सोचा था कि जो कर रहा हूं, उसे देर-सबेर द्वारका को, मेरे घर को भुगतना पड़ेगा।’ 

वरदान लिप्सा और अनिष्ट भय में बड़े-बड़े शूरमाओं की मिट्टी पलीद होने का ध्वनि-संकेत भी दुर्वासा के आदेश से कृष्ण-रुक्मिणि के निर्वस्त्र शरीर में खीर लगा कर छकरा ढोने में दिखता है। यानी आज के स्वघोषित देवताजन देख लें कि अपनी जिस प्रभुताई के विस्तार और भोग के आविष्कार में वे समस्त मानवीयता को दानवी चेष्टा से रौंद रहे हैं, आम नागरिक की इज्जत-आबरू, जान-माल, इच्छा-अभिलाषा से दलगत खेल खेल रहे हैं, नीति और विचारों की तस्करी कर रहे हैं, उसे कब तक कायम रख सकेंगे! अखिरकार कृष्ण के पैर में भी धनुर्धर जरा के तीर लग ही गए थे। 


उपसंहार: काशीनाथ सिंह; राजकमल प्रकाशन, 1-बी, नेताजी सुभाष मार्ग, दरियागंज, नई दिल्ली; 250 रुपए। 


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