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पुस्तकायन: सरोकार के सामने PDF Print E-mail
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Friday, 12 September 2014 17:32

अनुपमा शर्मा

 जनसत्ता 24 अगस्त, 2014: सदाशिव श्रोत्रिय ने अपने दूसरे निबंध-संग्रह सतत विचार की जरूरत में समय की मांग को समझते हुए पाठकों से सीधे संवाद स्थापित करने का प्रयास किया है। इसमें कुल तैंतीस निबंध हैं। हर निबंध मौजूदा समाज पर सटीक ढंग से विचार-मंथन करता है। लेखक का मानना है कि विचार भाषा की सीढ़ी चढ़ कर ही मंथरता पाते और परिष्कृत होते हैं। 

बदलते समाज और जीवन-मूल्यों में लोगों की आत्मकेंद्रिकता लेखक की सबसे बड़ी चिंता है, उनके हर निबंध में कमोबेश यह चिंता बनी रहती है। व्यक्ति ने अपनी प्रगति, उन्नति और लक्ष्य के लिए स्वास्थ्य, शिक्षा, संस्कृति, धर्म सभी को बाजार के बीच ला पटका और क्रय-विक्रय की वस्तु बना दिया है। इसी मूलभूत चिंता के इर्द-गिर्द उनके निबंध घूमते हैं। लेखक ने धर्म, बाजार, संस्कृति, पर्यटन, शिक्षण संस्थानों की भूमिका, स्त्री सशक्तीकरण पर बड़े वाजिब सवाल उठाए हैं, जिनमें उन्होंने निजी स्तर पर और समाज के स्तर पर भी सतत विचार, आत्ममंथन की जरूरत रेखांकित की है। 

लेखक के चिंतन के दायरे में मानव और प्रकृति का वर्तमान संबंध भी है। ‘संस्कृति पर सवार पर्यटन’ और ‘प्रकृति से विच्छेद’ लेखक की इसी चिंता को व्यक्त करते हैं। सांस्कृतिक विकास के केंद्र रहे मंदिरों में कला, संगीत, साहित्य, दर्शन, स्थापत्य आदि न केवल पल्लवित हुए, बल्कि संरक्षित रहे, पर उन तीर्थस्थानों को पर्यटन के अनुकूल बनाने के प्रयासों ने उनके मूल स्वरूप को नष्ट कर दिया। ‘प्रकृति से विच्छेद’ में भी लेखक यही संकेत करता है कि मनुष्य का प्रकृति से चिरकाल से चला आ रहा अटूट संबंध विच्छेद की ओर है, जो हमें आनंद, जीवन और पोषण के मूल स्रोतों से काट कर रख देगा। 

लेखक खुद धर्म के नाम पर तटस्थ हैं। वे न अंधविश्वासी के रूप में उपस्थित होते हैं और न ही मंदिरों की मुखालफत करते हैं। उनकी चिंता का सबब यही है कि भारतीय समाज पर, उसकी मानसिकता पर पूंजीवाद पूरी तरह से हावी हो चुका है। धर्म और आस्था को बाजार ने आ घेरा है। लेखक ने ‘चढ़ावे’ के स्थान पर ‘आय’ शब्द का प्रयोग किया है। आस्था, भक्ति, श्रद्धा जैसे शब्दों का व्यवसायीकरण हो गया है। यह बाजार, व्यापार, मुनाफे में तब्दील होने की ओर संकेत करता है, जहां मंदिरों को उद्योग की दृष्टि से देखा जाने लगा है। 

‘अतीत के द्वार’ निबंध में लेखक ने यही प्रकट किया है कि पर्यटन या भ्रमण एक उद्देश्य को लेकर हुआ करते थे, पर आज की तुरंता संस्कृति ने इसके मूल मंतव्यों को दरकिनार कर मनोरंजन, आनंद, लुत्फ और सैर-सपाटे को तरजीह दी है। जिसमें वे स्थान पिकनिक स्पॉट से अधिक कुछ नहीं रह गए हैं। लेखक के लगभग सभी निबंधों में कमोबेश उनकी अपनी पैतृक मिट्टी नाथद्वारा का जिक्र आता है, इसका बड़ा कारण यह भी है कि मनुष्य के आचार-विचार और अनुभव को विस्तार देने में आसपास, परिवार, पृष्ठभूमि की विशेष भूमिका होती है। वह अपनी अनुभूतियों, परिस्थितियों और परिवेश से ही सीखता है। लेखक ने अपने इस अभिन्न अंग को कृति में अनुभव और विचार के स्तर पर संजोया है, यह प्रशंसनीय कार्य है। 

नाथद्वारा में धर्म की जो स्थिति है वह लगभग पूरे भारत में है। उनका निबंध ‘कार वालों के रास्ते’ में लेखक ने मध्यवर्ग की उस भौतिकतावादी मानसिकता को उघाड़ा है, जिसमें सामाजिक प्रतिष्ठा का आधार आचार, विचार, व्यवहार न होकर साधन-संपन्नता है। कार मालिक होने की होड़ ने कारों की संख्या में सुरसा के मुंह की तरह बढ़ोतरी ने सड़कों को पार्किंग स्थलों में तब्दील कर दिया है। नाथद्वारा


में कार वालों को सुविधा मुहैया कराने के लिए किस प्रकार पर्यावरण और वन्य जीवों की अनदेखी की गई और तीस फीट चौड़ी सड़कें बना दी गर्इं। यह निबंध सांस्कृतिक केंद्रों का औद्योगिक केंद्रों में परिवर्तित होना परिलक्षित करते हैं, साथ ही भीतर तक मथते भी हैं कि शताब्दियों लंबी प्रक्रिया में लगभग पूरे भारत के जंगलों को इसी बर्बरता से काटा गया। 

‘शब्दों की जरूरत’ में लेखक ने स्पष्ट किया है कि ‘वस्तुएं शब्दों का विकल्प नहीं हो सकती’। लेखक का मानना है कि किसी भी जनतांत्रिक समाज के स्वस्थ, जागरूक और स्वतंत्र बने रहने के लिए उसके सदस्यों का भाषा पर पर्याप्त अधिकार आवश्यक है। ‘योग का बाजार’ निबंध में लेखक का कहना है कि पतंजलि ने जिस योग को आत्मिक और मानसिक संतुष्टि का मार्ग बताया था, उसे आज के बाजारवादी दौर में प्रतिष्ठित तो कर दिया गया है, पर इसकी आड़ में सैकड़ों व्यापारिक योगपीठ आसन लगाए बैठे हैं।  

‘मीडिया की भूमिका’ लेख में लेखक ने लोकतंत्र के चौथे स्तंभ को कठघरे में खड़ा किया है कि किस प्रकार वह अपने नैतिक दायित्व को भूल कर विज्ञापनों और सनसनीखेज खबरों का अंबार बनता जा रहा है। वह अपनी मूल प्रकृति रचनात्मकता और निष्पक्षता से कोसों दूर जा रहा है। 

उन्होंने ‘आधुनिक युवा’ और ‘कामकाजी पत्नियां’ निबंध में स्त्री सशक्तीकरण और स्त्री विमर्श के को केवल लेखिकाओं तक सीमित करके नहीं देखा है, बल्कि वे इसे गांव-देहात में पढ़ रही छात्राओं तक लेकर जाते हैं। वे शहरी वातावरण पर भी टीप देते हैं कि ‘यहां के कन्या महाविद्यालय में पढ़ने वाली पचास प्रतिशत से भी अधिक छात्राएं सिर्फ मौज-मस्ती और पारिवारिक श्रम से बचने के लिए प्रतिदिन वहां आती हैं।’ 

‘आधुनिक युवा’ में वे अपने अध्यापकीय अनुभव रखते हैं कि ‘छात्राओं के महाविद्यालय में अगर किसी दिन अरुणा राय जैसी किसी विदुषी की वार्ता रख दी जाए तो पचहत्तर प्रतिशत छात्राएं शायद उस दिन कॉलेज ही नहीं आएंगी।’ वे गहरे स्तर पर यह प्रश्न उठाते हैं कि केवल कॉलेज जाना शिक्षा नहीं है। उनका मानना है कि स्त्रियों में दायित्व-बोध का विकास होना चाहिए, जो सही मायने में पितृसत्ता को चुनौती दे सके। वे केवल कॉलेज स्तर पर पाक कला, कढ़ाई-बुनाई, मेहंदी आयोजनों तक खुद को सीमित न रखें, बल्कि अकादमिक गतिविधियों को भी जीवन में महत्त्व और स्थान दें। वे अपने आप को ऐसे विवेक से संपन्न करें, जिसमें अपने मूल्य हों, पितृसत्ता का पोषण ही निहित न हो। 

यह निबंध-संग्रह सामाजिक स्थितियों और परिदृश्यों को देखने की प्रेरणा और दिशा देता है। मानवीय संबंधों को बहुत गहराई और संवेदनशीलता से पकड़ता है। यह प्रशंसनीय है कि इस निबंध-संग्रह के माध्यम से सदाशिव श्रोत्रिय ने वर्तमान भारत की लगभग सभी गुप्त और प्रकट समस्याओं को सामने रखा है। 


सतत विचार की जरूरत: सदाशिव श्रोत्रिय; बोधि प्रकाशन, एफ-77, सेक्टर-9, रोड नं. 11, करतारपुरा इंडस्ट्रियल एरिया, बाईस गोदाम, जयपुर; 125 रुपए। 


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