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सैलाब के सबक PDF Print E-mail
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Friday, 12 September 2014 11:35

जनसत्ता 12 सितंबर, 2014: जम्मू-कश्मीर में हालांकि बाढ़ का स्तर कुछ कम हुआ है, पर इसी के साथ त्रासदी की तस्वीर भी साफ होने लगी है। करीब तीन सौ लोगों की जान जा चुकी है। बाढ़ से घिरे हजारों लोगों को सुरक्षित स्थानों पर पहुंचाया जा चुका है, पर लाखों लोग अब भी संकट में फंसे हुए हैं। बेशक सेना और आपदा कार्रवाई बल के जवानों ने मुस्तैदी दिखाई है, पर बचाव और राहत का काम निहायत अनियोजित तरीके से चल रहा है। लोगों को मालूम नहीं कि कहां शिकायत करें, कहां से जानकारी मांगें और राहत कार्य में सहयोग के लिए कहां संपर्क करें। यह स्थिति प्रशासन के भीतर भी है। राज्य का प्रशासनिक तंत्र लुंज-पुंज नजर आता है। स्वाभाविक ही इससे नाराजगी फैली है। मदद न पहुंचने से खफा लोगों ने मुख्यमंत्री आवास के अलावा कहीं-कहीं बचाव दल पर भी पथराव किए हैं। जम्मू-कश्मीर में यों भी राज्यतंत्र पर किसी हद तक अविश्वास का भाव दशकों से बना रहा है। लोगों में आक्रोश को देखते हुए यह आशंका जताई जा रही है कि बाढ़ का पानी उतरने के बाद कहीं कानून-व्यवस्था की समस्या न खड़ी हो। बहरहाल, संकट की मौजूदा घड़ी में पहला तकाजा यह है कि संचार सेवाएं जल्द से जल्द बहाल की जाएं। दूसरे, बचाव और राहत के अभियान में तालमेल और समन्वय कायम किया जाए। 

इस सैलाब ने आपदा प्रबंधन में चली आ रही खामियों की तरफ ध्यान दिलाने के साथ ही पर्यावरण से जुड़े सबक भी दिए हैं। सवा साल पहले उत्तराखंड में आई अपूर्व बाढ़ से जैसी तबाही मची, वह काफी कम होती अगर नदियों के ऐन किनारों तक निर्माण-कार्यों की छूट न दी गई होती। अब एक और हिमालयी राज्य में आई अप्रत्याशित बाढ़ ने भी वैसा ही पाठ पढ़ाया है। नदियों और झीलों के किनारे और उनके आसपास हुए वैध-अवैध निर्माण, अतिक्रमण, तटीय क्षेत्रों को कचरे से पाटने और जंगलों की अंधाधुंध कटाई, पारिस्थितिकी के लिहाज से नाजुक क्षेत्रों में भी खुदाई और भूस्खलन के खतरे वाले इलाकों में भी सड़कें बनाने का सिलसिला लंबे समय से चलता रहा है। लिहाजा, नदियों और झीलों के तट सिकुड़ते गए और बाढ़ के पानी को जज्ब करने की उनकी क्षमता जाती रही। बाढ़ से बचाव के


लिए तटबंध बनाए जाते हैं, पर वे हल्की बाढ़ से ही राहत दिला सकते हैं, अप्रत्याशित बाढ़ का मुकाबला नहीं कर सकते। ग्लोबल वार्मिंग के चलते मौसम में तीव्र उतार-चढ़ाव का क्रम बढ़ रहा है। इसे हम जम्मू-कश्मीर से पहले उत्तराखंड और उससे पहले मुंबई, सूरत और बीकानेर में देख चुके हैं। इसलिए झीलों, तालाबों को पाटने, नदियों के किनारे अतिक्रमण और वहां इमारतों के निर्माण का सिलसिला बंद करना होगा। 

समस्या यह है कि जब भी ऐसी कोई पहल होती है, जमीन-जायदाद के कारोबारी उसके खिलाफ लामबंद हो जाते हैं। उन्हें राजनीतिकों का साथ मिल जाता है। कभी इसका कारण निहित स्वार्थ होता है, तो कभी तथाकथित विकास का व्यामोह। फलस्वरूप नदियों की बाबत तटीय नियमन अधिनियम की 1982 की अधिसूचना कभी लागू नहीं हो सकी। केंद्रीय जल आयोग की सिफारिशें भी ठंडे बस्ते में डाल दी गर्इं। समुद्र तटीय नियमन कानून को भी, सुनामी के कड़वे अनुभव के बावजूद, लचर बना दिया गया। मोदी सरकार ने वन संरक्षण अधिनियम, 1980 और पर्यावरण रक्षा कानून, 1986 की समीक्षा के लिए एक समिति गठित कर दी है, जो इन कानूनों को कमजोर करने की ही कवायद का संकेत है। यों यह बात हमारे नीति नियामक भी मानते हैं कि मौसम में उग्र बदलाव को ध्यान में रख कर नीतियां और योजनाएं बनाई जाएं। पर इस तकाजे को जब अमली जामा पहनाने का सवाल आता है तो वे उलट रुख अपनाते हैं। उत्तराखंड और अब जम्मू-कश्मीर की त्रासदी से सबक सीखने को वे कब तैयार होंगे!


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