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प्रधानमंत्री का बैंक PDF Print E-mail
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Friday, 12 September 2014 11:33

कुमार प्रशांत

 जनसत्ता 12 सितंबर, 2014: प्रधानमंत्री ने पंद्रह अगस्त को लाल किले से अपनी जिन हसरतों का जिक्र किया,

उनमें एक थी कि इस देश के हर ग्रामीण और गरीब के पास अपना बैंक खाता होना चाहिए। फिर एक पखवाड़े से भी कम समय में, अट््ठाईस अगस्त को एक करोड़ से अधिक लोगों का बैंक खाता खुलना, उनका जीवन बीमा होना, उन्हें क्रेडिट कार्ड मिलना आदि कई बातें हुर्इं जिनकी दूसरी मिसाल खोजे नहीं मिलेगी। इन सारे कीर्तिमानों में जो सबसे बड़ी बात दिखाई दी वह यह कि अगर राजनीतिक इच्छाशक्ति हो तो यही नौकरशाही काम करती है। जहां तक देश को चलाने का सवाल है, खोट औजारों में नहीं, कारीगरों में रही है। बहुत समय तक खराब कारीगर ही अगर औजार का इस्तेमाल करते रहते हैं तो औजार भी खराब हो जाता है। हमारे यहां अधिकांशत: यही हुआ है।  

सबसे पहले हमें तय यह करना चाहिए कि बैंक हैं क्या? जनसेवा के उपकरण हैं या बाजार में कूद कर कमाई करने की पागल होड़ में पड़े तिकड़मबाजों का अड्डा हैं? प्रधानमंत्री बैंकों को कल्याणकारी राज्य के आर्थिक तंत्र को पुख्ता करने का उपकरण मानते हैं या समाज के सर्व-सामर्थ्यवान वर्ग के हाथ में एक दूसरा औजार कि जिससे वह औने-पौने ढंग से कमाई करे और फिर सरकार के साथ उसकी बंदरबांट कर ले? यह तय हो ले तभी यह भी तय हो सकेगा कि प्रधानमंत्री जन धन योजना में जन कौन है और धन किधर है!  

इंदिरा गांधी ने बैंकों का राष्ट्रीयकरण किया तो तथाकथित अर्थशास्त्रियों में तालियां बजाने वाले और धिक्कार करने वाले दोनों थे। इसमें अर्थशास्त्र बहुत कम था और अर्थशास्त्रियों की अपनी-अपनी राजनीति बहुत ज्यादा थी। लेकिन तब देश में एक आवाज जयप्रकाश नारायण की भी उठी थी कि सरकारीकरण को राष्ट्रीयकरण मानने की भूल हम न करें! उनका सीधा मतलब यह था कि बैंकों के राष्ट्रीय-सामाजिक उद्देश्य क्या हैं और वे कैसे प्राप्त किए जाएंगे, यह सुनिश्चित किए बिना बैंकों के राष्ट्रीयकरण के तीर से कांग्रेस की अंदरूनी राजनीतिक उठा-पटक में सिंडिकेट को हराया और मिटाया तो जा सकता है, लेकिन राष्ट्रीय धन का राष्ट्र-निर्माण में इस्तेमाल नहीं हो सकता है! 

तब जयप्रकाश नारायण ने कहा था, अब नरेंद्र मोदी कह रहे हैं कि बैकों के राष्ट्रीयकरण के सपने कहीं पीछे छूट गए और बैंक कहीं और ही निकल गए। क्यों निकल गए? किधर निकल गए? कैसे निकल गए? अगर इंदिरा गांधी के साथ ऐसा हुआ तो नरेंद्र मोदी के साथ ऐसा क्यों नहीं होगा? जवाब बैंकिंग के दिग्गजों को और तथाकथित अर्थशास्त्रियों को देना चाहिए।  

बैंकों के राष्ट्रीयकरण के बाद, येनकेन प्रकारेण निजी बैकों ने फिर से जगह बनानी शुरू की; हाल-फिलहाल में हमने देखा कि हमारी वित्त-त्रिमूर्ति मनमोहन-चिदंबरम-मोंटेक ने महसूस किया कि हमारे पास पैसों की नहीं, बल्कि बैंकों की कमी है! बहुत सारे बैंक होंगे तो हमारा धन जन तक पहुंचेगा। तो बैंक खोलने के आवेदन आमंत्रित किए गए और आप देखेंगे कि देश का शायद ही कोई कॉरपोरेट घराना होगा जो आवेदन लेकर लाइन में नहीं खड़ा हुआ! आखिर कॉरपोरेट घरानों को क्या हुआ कि वे सब के सब जनसेवा की बीमारी से ग्रस्त हो गए! यह आर्थिक इबोला कहां से फैला? 

हमने बहुत सारी व्यवस्थाओं की तरह बैंकिंग की व्यवस्था भी अंगरेजों से उठा ली है। बैकों को जनसेवा का उपकरण बनने देना न वे चाहते थे और न हमने कभी चाहा। उनके लिए बैंक उपनिवेशों का शोषण करने की व्यवस्था थी, हमारे लिए भी वही रही। 

कॉरपोरेटों के लिए बैंक एक उद्योग है जिसमें निवेश कर वे मुनाफा कमाना चाहते हैं; सरकार के लिए बैंक जन से धन एकत्रित कर, उसका राजनीतिक इस्तेमाल करने के साधन हैं। कॉरपोरेट घराने साधारण मुनाफे की तरफ आकर्षित नहीं होते, वे मुनाफाखोरी की संभावनाओं का आकलन करते हैं और चार लगा कर कम से कम चालीस पाने की जहां आशा न हो वहां वे फटकते भी नहीं हैं। ऐसे कॉरपोरेट अगर बैंक खोलने के लिए लाइन लगाते हैं तो इसका मतलब समझने के लिए हमारा खगोलशास्त्री होना जरूरी नहीं है। सामान्य समझ ही बहुत कुछ बता देती है।  

सरकार इतना ही आंकड़ा देश के सामने रखे तो बात आईने की तरह साफ हो जाएगी कि आजादी के बाद से अब तक, सरकारी और निजी बैंकों ने कॉरपोरेट घरानों को कितना, मझोले और लघु उद्यमियों को कितना ऋण दिया है; उनकी वापसी की दर कितनी रही है और किसके माथे कितना बकाया है? 

यह आंकड़ा भी कई सारे रहस्य खोल देगा कि समय-समय पर चुनावी फसलें काटने के लिए ‘ऋण-माफी तथा दूसरी जनहित की घोषणाओं’ के तहत बैंकों को कितना पैसा, कहां और किन्हें, किन शर्तों पर बांटने पर मजबूर किया गया है और बैंकों ने उसका कैसे वहन किया? 

एक बार यह तस्वीर देश के सामने रख ही दी जाए कि हमारे जितने भी वित्तीय संस्थान हैं उन सबके वित्तीय व्यवहार की सच्चाई क्या है? प्रधानमंत्री का इतना कहना काफी नहीं है कि अमीरों की तुलना में गरीबों को पांच फीसद से ज्यादा दर पर ऋण मिलता है बल्कि यह बताना भी जरूरी है कि अमीरों को ऋण किसलिए, किन शर्तों पर मिला और उनकी वापसी की स्थिति क्या है? यह भी बताया जाए श्रीमान कि सरकार और वित्तीय संस्थानों ने अब तक किसकी कितनी रकम खट्टूस- राइट ऑफ- कर दी है? 

यह सब एक बार देश के सामने आ जाए तब बैंकिंग व्यवस्था का पूरा चेहरा दिखाई देगा


और तब प्रधानमंत्री हमें यह बताएं कि उनकी सरकार इस चेहरे में से कौन-सा और क्या रखना और बदलना चाहती है और नया चेहरा क्या होगा! नहीं, प्रधानमंत्रीजी, आप यह काम योजना आयोग को भंग करने की तर्ज पर नहीं कर सकते। पहले पूरा वैकल्पिक खाका बनाना होगा, भूमिकाएं तय करनी होंगी और सरकार को जिम्मेवारी लेनी होगी तभी आप बैंकिंग व्यवस्था से छेड़छाड़ कर सकते हैं। ऐसा कोई संकेत आपकी बातों में दिखाई तो नहीं दे रहा है।       

बैंकों की बुनियादी संकल्पना यह थी कि यह एक ऐसी वित्तीय व्यवस्था होगी जहां नागरिक अपने पैसे सुरक्षित रख सकेंगे और जब जैसी जरूरत होगी, निकाल भी सकेंगे। नागरिकों के पैसों के एवज में बैंक उन्हें ब्याज देगा, कर्ज और दूसरी सुविधाएं देगा। बैंकों में जमा नागरिकों के पैसों का इस्तेमाल सरकार और दूसरे लोग अपनी योजनाओं के लिए ब्याज देकर कर सकेंगे और यही ब्याज बैंकों की अपनी कमाई होगी। बैंक जिस दर पर ब्याज कमाते हैं और अपने महाजन नागरिक को जिस दर पर ब्याज देते हैं उसमें न्यायतुल्य संतुलन होना ही चाहिए। बैंक बाजार में उतर कर हर तरह की कमाई के लिए हाथ-पैर मारेंगे तो स्वाभाविक है कि नागरिकों की उपेक्षा होगी, उनका शोषण होगा और इनके ही पैसों पर बैंकिंग उद्योग मौज करेगा। आज एकदम यही स्थिति है। 

सामान्य खाता-धारक को बैंक क्या ब्याज देता है, क्या सुविधाएं देता है, इसका हिसाब लगाएं हम। जिनके पैसों पर आप अंधाधुंध कमाई कर रहे हैं उन्हें एक चेकबुक भी आप सौजन्यतापूर्वक नहीं देते हैं। कमाल की लूट है! चेक के बिना हम अपना पैसा न ले सकते हैं न दे सकते हैं, यह व्यवस्था आप बनाएं और फिर चोर दरवाजे से यह शर्त भी लाद दें कि इस चेक का पैसा भी अदा करना होगा तो यह ईमानदारी की बात है या हमें विवश कर लूटने की? 

बैंक की कोई भी सेवा अब शुल्क के बिना नहीं मिलती। एक महाजन जैसे अजगर की तरह अपने कर्जदार को लपेटता जाता है ताकि अंतत: उसे बेबस कर सके, वैसा ही हाल बैंकों का है। बैकों की हर सेवा, हर योजना बड़ी पूंजी वालों के हित में बनने लगी है। बैंक में खाता खोलना सीबीआइ के दफ्तर में जाने सरीखा क्यों बन गया है भाई? कॉरपोरेटों का खाता खोलना हो, उनसे करोड़ों-अरबों की एफडी पानी हो, उन्हें कर्ज लेने के लिए तैयार करना हो तो बैंकों के बड़े-बड़े अधिकारी, उनके घरों-दफ्तरों में कारकूनों की तरह हाजिरी देते हैं; और आपके काउंटर पर खाता खोलने का फॉर्म लेकर जो नागरिक खड़ा होता है उससे आप ऐसा बर्ताव करते हैं मानो उसने यहां आकर आप पर कृपा न की हो, बल्कि अपराध किया हो। 

आपने कहा कि हम ऐसी व्यवस्था करेंगे कि आपको बैंक में आने की परेशानी न उठानी पड़े। हमने तो इसकी शिकायत की ही नहीं थी, लेकिन आपको खुले बाजार में किराया भारी पड़ रहा था, आप कम से कम लोगों में अपना काम चलाने की चालाकी में थे तो आपने एटीएम मशीनें लगार्इं। 

आपने फिर कहा कि हम आपको एसएमएस से आपके खाते की जानकारी दिया करेंगे, आप फोन से बैंकिंग का अपना पूरा काम कीजिए। इनमें से कुछ भी हमने नहीं मांगा था, अपनी सुविधा के लिए आपने हमें ये सुविधाएं दीं और फिर इन सबकी कीमत वसूलनी शुरू कर दी। एटीएम की फीस बढ़ती जा रही है, हम किसी भी बैंक के एटीएम से अपना पैसा निकाल सकते हैं, यह सुविधा भी कम-से-कम की जा रही है। मुंबई के स्टेट बैंक और आइसीआइसीआइ जैसे बैंकों के एटीएम का यह हाल है कि वहां से चेक डालने वाले बक्से हटा दिए गए हैं, स्टेशनरी का सामान, आलपिन कुछ भी उपलब्ध नहीं रहा है। 

हम देखते कि हमारे बैंकों की आर्थिक दशा इतनी कमजोर है कि वे बेचारे अपनी नाक पानी से ऊपर रखने की जद्दोजहद में पड़े हैं तो इन सारी चालाकियों को अनदेखा कर जाते। लेकिन हम देख तो यह रहे हैं कि हर बैंक आलीशान-से-आलीशान इमारतें खड़ी कर रहा है, चमकीली-से-चमकीली शाखाएं खोली जा रही हैं, बैंकों के वेतन देखिए, उनका प्रचार का बजट देखिए, उनके सेमिनार और दूसरे आयोजन देखिए तो विश्वास नहीं होगा कि यह संकट में पड़ा उद्योग है। बैंक आज नागरिकों का धन बटोर कर सबसे अकुशल, भ्रष्ट, दिशाहीन और निहित स्वार्थों से समझौता कर चलने वाला धंधा बन गया है। बैंकों के अकथ घोटाले हैं - सेबी की अदालत में खड़ी कंपनियों के अरबों-खरबों के घोटाले के मामलों में बैंकों की भूमिका की जांच तो करे कोई! नागरवाला कांड जैसे हुआ और जैसे उसे दफना दिया गया क्या वह भूलने लायक है?  


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