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दावों की पोल PDF Print E-mail
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Friday, 12 September 2014 11:31

अनुज दीप यादव

जनसत्ता 12 सितंबर, 2014: नरेंद्र मोदी की तथाकथित विकासोन्मुखी सरकार के सौ दिन पूरे होने के साथ ही उनके उस ‘गुजरात मॉडल’ का सच देश के सामने आने लगा है, जिसके दम पर वे सोलहवीं लोकसभा में पूर्ण बहुमत के साथ आने में सफल हुए हैं। लोगों को वह नारा याद होगा, जिसमें नरेंद्र मोदी ने देवालय से पहले शौचालय की बात कही थी। गौरतलब है कि उनके मुख्यमंत्री रहते हुए 2003 में गुजरात सरकार ने उच्चतम न्यायालय में दायर एक हलफनामे में बताया था कि गुजरात पूरी तरह से स्वच्छ राज्य है, जहां एक भी मैला ढोने वाला नहीं है। लेकिन इसके बावजूद गुजरात सरकार ने केंद्र सरकार से मैला ढोने वाले लोगों के विकास और पुनर्वास के लिए करोड़ों रुपए लेना बंद नहीं किया। कुछ स्वयंसेवी संगठनों और फिल्मकारों ने समय-समय पर इस सच को उजागर किया, लेकिन तब से अब तक राज्य सरकार इसे झुठलाती और बड़े-बड़े दावे करती रही। स्वयंसेवी संगठनों ने उच्चतम न्यायालय के सामने इस सच को रखते हुए इसकी जांच की मांग उठाई। फिर न्यायालय के आदेश के मुताबिक इसकी स्वतंत्र संस्था से जांच कराई गई। जो सच्चाई सामने आई वह न केवल चौंकाने वाली रही, बल्कि बड़े पदों पर बैठे लोगों के दावों की पोल खोलने वाली साबित हुई। पच्चीस अगस्त 2014 को टाटा इंस्टीट्यूट ऑफ सोशल साइंसेज ने अपने अध्ययन के मुताबिक अकेले गुजरात में मैला ढोने के काम में लगे लोगों की तादाद बारह हजार से भी ज्यादा पाई और यह भी बताया कि इनमें से ज्यादातर वे लोग हैं, जो हाथों से साफ-सफाई का काम करते हैं।

इस रिपोर्ट ने इस तथ्य को सबके सामने रखा कि राजनेताओं के कहने से सब कुछ अच्छा नहीं हो जाता। उसके लिए जमीनी काम करना जरूरी होता है। रिपोर्ट से इस बात का भी अंदाजा लगता है कि कहीं आने वाले समय में भारत की समस्याओं का ऐसा ही ‘समाधान’ जनता के सामने न रख दिया जाए, जैसा कि इस मुद्दे पर किया गया। दूसरी ओर, इस समस्या के समाधान के लिए काम कर रही एक राष्ट्रीय संस्था ‘गरिमा’


के हवाले से कहा गया कि देश में मैला ढोने वालों की संख्या बारह लाख से भी ज्यादा है। ऐसे में प्रधानमंत्री देश में विकास की बैलगाड़ी को कैसे बुलेट ट्रेन में बदलेंगे, इस पर संशय है। इसके अलावा, देश के सौ शहरों को कैसे ‘स्मार्ट सिटी’ में बदला जाएगा, इसका भी भविष्य अंधियारे रास्तों से गुजरता हुआ दिखता है। इसके अलावा, इस रिपोर्ट के सामने आने के बाद उच्चतम न्यायालय गुजरात सरकार से क्या सवाल पूछता है और उसके ग्यारह साल पुराने हलफनामे पर उससे कैसे जवाब मांगता है, उसका इंतजार करना होगा। लेकिन यहां सवाल यह भी है कि ये झूठ बोले क्यों गए। क्या केवल राज्य की शान को और ऊंचाई पर दिखाने के लिए या एक महत्त्वपूर्ण समस्या को विकास के एजेंडे से बाहर रखने के लिए?

फिर उस धन का क्या हुआ जो सालों-साल केंद्र सरकार की ओर से मैला ढोने के काम में लगे लोगों के पुनर्वास और रोजगार के नाम पर राज्य सरकार को मिलता रहा? क्या यह किसी तरह के घोटाले और लापरवाही का एक पन्ना तो नहीं, जैसे उत्तर प्रदेश का एनआरएचएम घोटाला। अब यह देखना दिलचस्प होगा कि उच्चतम न्यायालय इस मसले पर क्या रुख अपनाता है। क्या इस मामले की और गहराई से जांच होगी या फिर मामले को ठंडे बस्ते में डाल दिया जाएगा?  


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