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लोकतंत्र में राजा PDF Print E-mail
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Friday, 12 September 2014 11:29

विष्णु नागर

जनसत्ता 12 सितंबर, 2014: पिछले दिनों मैं मुंबई, पुणे और मध्यप्रदेश के मालवा अंचल के कुछ शहरों-कस्बों में था। इस बीच चूंकि गणेशोत्सव था, मेरा सामना सैकड़ों ‘राजाओं’ से हुआ। मुंबई की एक गणेश मूर्ति तो गणेशोत्सव के समय ‘लालबाग चा (का) राजा’ के नाम से भारत भर में प्रसिद्ध हो चली है। प्रसिद्ध लोग और अधिक प्रसिद्ध होने के लिए उस प्रसिद्ध मूर्ति के दर्शनों के लिए जाते और जनता को अपना दर्शनलाभ करा आते हैं। जो प्रसिद्ध और धनवान नहीं हैं, वे इन लालबाग के राजा से आशीर्वाद लेने के लिए घंटों लाइन में खड़े रहते हैं। इसके अलावा भी वहां हर गली-मोहल्ले के अपने राजा हैं, जैसे ‘अंधेरी चा राजा’, ‘पार्ले चा राजा’, ‘गिरगाम चा महाराजा’ आदि। जिस महाराष्ट्र में अड़सठ लाख गणेश मूर्तियां इस बार स्थापित हुई हों और उनमें बीस लाख आकार में बड़ी हों, वहां कितनी ही गणेश मूर्तियां कहीं न कहीं की राजा जरूर बनी होंगी। मुंबई की देखादेखी सारे देश में गणेशजी को राजा बना दिया गया है। यानी उन्हें भगवान मानना काफी नहीं है, उनका गौरव किसी गली-मोहल्ले का तथाकथित राजा बनने पर ही बढ़ता है। 

हमारा लोकतंत्र अगर गहरी जड़ें जमा चुका हो तो भी उसका राजाओं और सामंतों से पीछा नहीं छूटा है, उन्होंने अब नए-नए मुखौटे पहन लिए हैं। वैसे बहुत से समझदार ‘राजा’ जो भारत के आजाद होने के कारण एक दिन के लिए भी अपनी टुन्नी-मुन्नी-सी रियासत के राजा नहीं रहे- आज भी पसंद यही करते हैं कि उन्हें ‘राजा’ कहा और माना जाए। इनमें से कुछ तो इतने हास्यास्पद हैं कि बाप के मरने पर बाकायदा धार्मिक और सामंती विधि-विधानपूर्वक तथाकथित ‘राजगद्दी’ पर बैठते और अपना ‘दरबार’ लगाते हैं। हमारे तमाम मुख्यमंत्री-मंत्री-प्रधानमंत्री भी बेधड़क दरबार लगाते हैं। एक स्वर्गीय हो चुके केंद्रीय मंत्री के बारे में बताया जाता है कि जो उन्हें ‘महाराजा’ नहीं कहते थे और उनके सामने उनकी प्रजा होने का अहसास नहीं दिलाते थे, उनकी तरफ वे ठीक से देखते भी नहीं थे। उज्जैन के बारे में माना जाता है कि वहां के राजा महाकाल (शिव) हैं और इसलिए सिंधियावंश के राजा वहां रात को नहीं ठहरा करते थे, जिनकी ग्वालियर रियासत का एक हिस्सा उज्जैन भी हुआ करता था, क्योंकि माना जाता है कि एक शहर में दो राजा एक साथ रात नहीं बिता सकते। 

राजतंत्र किस तरह हमारी मानसिकता में बैठा हुआ है इसका एक उदाहरण यह भी है कि गुजरात में जनता को सहज ही प्रजा कहा जाता है और हम हिंदीभाषी भी बिना सोचे-समझे कई बार लोकतंत्र को प्रजातंत्र कह बैठते हैं। जब प्रजा है ही नहीं तो कैसा प्रजातंत्र? और प्रजा के होते प्रजातंत्र हो भी कैसे सकता है, वहां तो राजतंत्र ही होगा। 

मुंशी प्रेमचंद अपने लेखन और जीवन में अंगरेजों और


सामंतवाद से लड़ते रहे, मगर वे आज भी वे ‘उपन्यास सम्राट’ की तरह याद किए जाते हैं और इस शैली में न जाने कितने लेखक न जाने किस-किस तरह के सम्राट बन चुके हैं। खुशकिस्मती है कि साहित्य से अब सम्राटों का दौर जा चुका है, मगर बाकी क्षेत्रों में सम्राट हैं। एक बिस्कुट सम्राट थे। ऐसे और भी कई सम्राट हैं। गुंडई के लिए कुख्यात कुछ भैयाओं के नाम के आगे और कुछ के पीछे राजा लगा हुआ है। राजा बेटा और रानी बिटिया तो प्राय: हर हिंदू घर में होते हैं। राजकुमार नाम भी काफी प्रचलन में रहा है। 

राष्ट्रपतिजी हमारे देश के प्रथम नागरिक माने जाते हैं, मगर राष्ट्रपतियों के तामझाम किसी राजा को भी मात कर देने वाले होते हैं। राजनीति में प्रधानमंत्री से लेकर सांसद-विधायक और सरपंच तक अपनी-अपनी दुनिया में राजा ही होते हैं। कई बड़े धर्माध्यक्ष किसी सनकी-सामंती-विलासी-हिंसक राजा की तरह ही व्यवहार करते हैं। बड़े-बड़े धनपतियों का व्यवहार भी किसी राजा से कम नहीं होता। कलेक्टर को अब भी जिले का राजा माना जाता है, इसलिए हर आइएएस का सपना कम से कम एक बार कलेक्टर बनने का जरूर होता है। अपने-अपने दफ्तर में वहां के अफसर से लेकर चपरासी तक सभी राजा होते हैं, वहां सरकारी कानून से ऊपर उनका अपना कानून होता है और वही चलता भी है। और हम सब भी- जो खाते-पीते वर्गों से हैं- उस सामंती परंपरा के अंग हैं, जिन्हें स्कूली-कॉलेजी पढ़ाई के बाद शारीरिक श्रम करना अपमानजनक लगता है। कई तो दफ्तर ही नहीं, घर में भी पानी तक खुद लेकर नहीं पीते। होटलों-रेस्तरांओं के बाहर जो चोबदार हमारे लिए दरवाजा खोले खड़े रहते हैं, वे लोकतंत्र की जड़ें गहरी होने का कितना सबूत देते हैं? जिनके पास ड्राइवर होते हैं, वे अक्सर अपनी कार का दरवाजा खुद खोलना अपमान समझते हैं। अपने घर में साफ-सफाई आदि के लिए आने वालों के साथ हमारा व्यवहार अक्सर क्या बताता है कि हम लोकतांत्रिक मानसिकता में ढले-बने हैं? 


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