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नफरत के सहारे PDF Print E-mail
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Thursday, 11 September 2014 10:32

आतिफ़ रब्बानी

जनसत्ता 11 सितंबर, 2014: तमाम हथकंडों के बीच, दूसरे अल्पसंख्यक धार्मिक समुदायों के बारे में झूठा प्रचार करना फासीवादियों या दक्षिणपंथी-सांप्रदायिक समूहों का पुराना हथकंडा रहा है। इसी संदर्भ में ‘लव जिहाद’ के मिथ्या प्रचार के मुताबिक मुसलमान हिंदू नवयुवतियों को प्यार के जाल में फंसा कर उनका धर्मांतरण तो कराते ही हैं, अपनी आबादी भी बढ़ाते हैं। पिछले कई सालों से विश्व हिंदू परिषद, अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद, हिंदू जन जागरण समिति आदि संगठन इस अफवाह-तंत्र को विकसित करने में लगे हुए हैं। पिछले साल मुजफ्फरनगर का ‘बहू-बेटी बचाओ आंदोलन’ और कुछ समय पहले मेरठ का धर्मांतरण का मामला इसी मिथ्या प्रचार की अगली कड़ी है। इससे पहले 2010 में दक्षिण कर्नाटक में हिंदू जनजागृति समिति ने यह प्रचार शुरू किया कि प्रांत में तीस हजार हिंदू नवयुवतियों को ‘लव जिहाद’ वालों ने अपने चक्कर में फंसा कर मुसलिम बना लिया है। लगभग ऐसा ही प्रचार केरल में भी शुरू किया गया था। केरल के उच्च न्यायालय ने बाकायदा इसकी जांच के आदेश भी दिए। मगर पुलिस को ऐसे किसी भी ‘जिहाद’ का कोई सबूत नहीं मिला और अदालत को यह मामला बंद करना पड़ा। वहीं कर्नाटक पुलिस की जांच से पता चला कि तीस हजार हिंदू लड़कियों के गुम होने का प्रचार सरासर गलत है। उस अवधि में चार सौ चार लड़कियां गुम हुर्इं और उनमें से तीन सौ बत्तीस को पुलिस ने ढूंढ़ निकाला। जांच में यह भी तथ्य उजागर हुआ कि ज्यादातर मामलों में हिंदू लड़कियां हिंदू लड़कों से शादी करने के लिए घर से गई थीं। 

गौरतलब है कि इस मिथ्या प्रचार का सिलसिला 1920 के दशक में आरएसएस के आविर्भाव के काल से ही अलग-अलग पेशबंदियों के तहत चल रहा था। 1924 में कानपुर में एक पुस्तिका प्रकाशित की गई, जिसका शीर्षक था- ‘हमारा भीषण ह्रास’। इसमें यह बताया गया कि ‘भारी संख्या में आर्य महिलाएं यवनों और म्लेच्छों (मुसलमानों) से निकाह कर रही हैं और गौभक्षकों को जन्म दे रही हैं। मुसलमानों की जनसंख्या बढ़ा रही हैं।’ 1928 में एक कविता प्रकाशित की गई, जिसे ब्रिटिश हुकूमत ने प्रतिबंधित कर दिया। लगभग इसी फार्मूले पर आज आरएसएस


के आनुषंगिक संगठन और हिंदू रक्षक समिति जैसे संगठन काम करते हैं। महाराष्ट्र के धुले जिले के ये गिरोह उन मोटरसाइकिलों पर भी नजर रखते हैं, जिन पर लड़के के पीछे लड़की बैठी हो। ये लोग मोटरसाइकिल का नंबर लेकर स्थानीय परिवहन दफ्तर से यह पता करते हैं कि मोटरसाइकिल हिंदू की है या मुसलिम की। यह मान लिया जाता है कि अगर मोटरसाइकिल मुसलिम की है तो पीछे बैठी लड़की हिंदू ही होगी! 

‘लव जिहाद’ का मामला सिर्फ मुसलमानों के खिलाफ मिथ्या प्रचार का नहीं, बल्कि पूरे समाज में नारी-विरोधी पुरुषवादी सामंती सोच को बढ़ावा देने का भी है। ऐसी मानसिकता न सिर्फ वयस्क युवक-युवतियों के अपने जिंदगी के फैसले खुद करने के अधिकार को नकारती है, बल्कि यह औरतों के बच्चा पैदा करने संबंधी अधिकार को भी नहीं मानना चाहती। यह प्रचार दरअसल एक खौफ दिखा कर बहुसंख्यक समाज के उपेक्षित, तिरस्कृत और शोषित तबके का ध्यान उनकी मूल समस्याओं से हटा कर उन्हें अपने साथ खड़ा करने का हथकंडा है। जरूरत इस बात की है कि कट्टरपंथी सांप्रदायिक तत्त्वों के इस झूठ को बेनकाब किया जाए और गंगा-जमुनी तहजीब के उस पहलू को अंगीकार किया जाए, जिसके बारे में नवाब वाजिद अली शाह ने कहा था- ‘हम इश्क के बंदे हैं, मजहब से नहीं वाकिफ/ गर काबा हुआ तो क्या, बुतखाना हुआ तो क्या।’    


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