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अंतस का झरना PDF Print E-mail
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Thursday, 11 September 2014 10:28

रचना त्यागी

जनसत्ता 11 सितंबर, 2014: कुछ समय पहले की बात है। मेट्रो में सफर करते समय एक अलग अनुभव हुआ। एक छोटी-सी बच्ची ने अपनी चुलबुली हरकतों से मेट्रो ट्रेन के उस पूरे डिब्बे को गुलजार कर रखा था। कभी वह अपने परिवार के लोगों के कहने पर तोतली जुबान में कोई फिल्मी गीत सुनाती, तो कभी किसी गीत के बोल पर ठुमके लगाती। उस डिब्बे में मौजूद लोगों के बीच जहां तक उसकी जीवंतता की लहरें पहुंच रही थीं, वहां तक हर चेहरे पर मुस्कान सज गई थी। निश्चित रूप से उसकी बाल-सुलभ चपलता और हाजिरजवाबी का आनंद उठाते सभी चेहरे किसी न किसी गंतव्य तक पहुंचने के लिए ही वहां थे या गंतव्य से वापस लौट रहे थे। उनमें नौकरीपेशा वर्ग, विद्यार्थी, गृहणियां और उन तमाम वर्गों के लोग शामिल थे, जो अपनी यात्रा के लिए मेट्रो का सफर मुनासिब या सुविधाजनक समझते हैं। जाहिर है, सभी के मन-मस्तिष्क में कुछ न कुछ चल रहा होगा! यानी समय पर कहीं पहुंचने की फिक्र, पहुंचने के बाद किसी से मिलने या काम करने की फिक्र, आॅफिस या घर के किसी काम या व्यक्ति के बारे में किसी बात पर ध्यान आदि। लेकिन उस बच्ची की प्यारी हरकतों ने कुछ समय के लिए उन सब गंभीर विचारों को मस्तिष्क से निकाल कर आसपास खड़े लोगों के बीच अपनी जगह बना ली थी। उसने कुछ क्षणों के लिए हम सबके अंदर सोए हुए बच्चे को जगा दिया था, जो उसके द्वारा उत्पन्न हुए आनंद के वातावरण का साझा अनुभव करने के लिए अनजाने में ही अपने सहयात्रियों की ओर देख कर भी मुस्करा या खिलखिला कर हंस देते थे। 

इन सबके बीच केवल एक महोदय का चेहरा था, जो निर्लिप्त था। ऐसा लग रहा था कि उसे कठोरता की परछाई छोड़ कर जाने को बिल्कुल तैयार नहीं थी। मुझे थोड़ा आश्चर्य भी हुआ उनकी उदासीनता पर। शायद कोई परेशानी रही हो, जो उन्हें इस मुस्कान से दूर रखे हुए थी। या फिर हो सकता है कि उनका स्वभाव ही ऐसा हो। मुझे ऐसे कुछ और चेहरे याद आने लगे, जिन्हें समय के हथौड़े की मार लगभग पाषाण बना देती है और उनके अंतस में बहने वाला नैसर्गिक झरना पूरी तरह या काफी हद तक सूख जाता है। झरना, जो हमें जन्म के समय प्रकृति की ओर से उपहारस्वरूप मिलता है... प्रेम, करुणा, वात्सल्य, सहानुभूति और तदानुभूति का। 

एक नवजात शिशु बहुत कोमल होता है, तन और मन दोनों से। वह इतना संवेदनशील होता है कि न्यूनतम प्रेम, भय और दुत्कार को भी भली-भांति समझता और अनुभव करता है। उसके प्रति


अपनी प्रतिक्रिया देता है। लेकिन ज्यों-ज्यों हमारी उम्र बढ़ती जाती है, यह संवेदनशीलता अलग-अलग गति से हम सबमें कम होती जाती है। कारण कई हो सकते हैं- पारिवारिक, सामाजिक, मानसिक या आर्थिक। बहुत हद तक हमारा कामकाज का क्षेत्र या व्यवसाय भी इसके लिए उत्तरदायी कारक होता है। उदाहरण के तौर पर जहां मनोरंजन और कला के क्षेत्र से जुड़े लोग अपनी संवेदनशीलता को बचाए रख पाने में सक्षम होते हैं, वहीं आज की कठोर दुनिया की वीभत्स सच्चाइयों को बटोरते हुए और दिन-रात उसी में माथा खपाते हुए पत्रकार धीरे-धीरे संवेदनशीलता से दूर होते चले जाते हैं। हालांकि इन दोनों उदाहरणों में अपवाद संभव हैं और यहां यह केवल एक स्थूल विचार है। यह बात अलग है कि ऐसे लोगों के व्यक्तित्व पर जमा विभिन्न पहलुओं की गर्द-ओ-गुबार की मोटी परतें हटाई जाएं, तो अंदर से उसी नैसर्गिक संवेदनशीलता का दर्पण अपनी प्राकृतिक आभा से चमकने लगता है। 

अब प्रश्न यह उठता है कि हम प्रकृति प्रदत्त इस मानवीय गुण को किस प्रकार सींचें, जिससे यह वक्त और समाज के बेरहम थपेड़ों से कुम्हलाने के बजाय हमेशा हरा-भरा रहे! जवाब बहुत आसान नहीं है और जो सूझता है, उस पर अमल के लिए काफी जद्दोजहद करनी पड़ती है। लेकिन इतना समझ में आता है कि इसके लिए हमें जरूरत है संवेदनाओं के संपर्क में रहने, भावनात्मक साहित्य पढ़ने, ऐसी फिल्में देखने, ऐसे मित्रों के साथ समय बिताने की, जिनके अंदर बचपना और भावनाएं अभी तक जीवित हैं। ऐसे संगीत सुनने की जरूरत है, जो हमें याद दिलाए कि हमारे अंदर भी एक हृदय धड़कता है। वे सब अनुभव, जो कभी हमारे अधरों पर मुस्कान तो हमारी आंखों में नमी का बादल ला दें। हमें इंसान बने रहने के लिए जरूरी है कि हमारे मन की बंजर धरती पर कभी-कभी संवेदनाओं के बादल उमड़ें और बरसात करें! 


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