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सुविधा की खामोशी PDF Print E-mail
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Friday, 30 December 2011 10:16

जनसत्ता 30 दिसंबर, 2011: अखबार के पन्ने से झांकती, मुस्कराती-सी उस लड़की की तस्वीर किसी को भी असहज कर सकती थी। वजह यह कि अखबार में कहीं भी वह तस्वीर हो सकती थी, पर स्मृति-शेष या श्रद्धांजलि वाले उस पन्ने पर नहीं, जहां उस दिन थी। असहज करने वाली वजह एक और थी। दरअसल, उस लड़की का चेहरा बहुत जाना-पहचाना लगा था। वह सौम्या विश्वनाथन थी। एक युवा पत्रकार, जिसकी तमाम संभावनाएं और जिंदगी देश भर में महिलाओं के लिए सबसे असुरक्षित शहर के बतौर मशहूर हो रही उसी दिल्ली की कानून-व्यवस्था की भेंट चढ़ गई जो दुनिया के सबसे बडेÞ लोकतंत्रों में से एक की राजधानी होने के साथ-साथ विश्वस्तरीय शहर होने का दम भी भरती है। अब पता नहीं, इस शहर को ‘नेशनल कैपिटल’ के साथ ‘रेप कैपिटल’ कहा जाना भी कैसा लगता होगा! पर यहां के शासकों के बारे में मुतमइन हूं कि उन्हें इस बात से कोई फर्क नहीं पड़ता। याद है कि सौम्या की हत्या के बाद मुख्यमंत्री शीला दीक्षित के दिमाग में जो बात उठी थी वह कानून-व्यवस्था की विफलता की नहीं, बल्कि देर रात अकेले घर से बाहर होने की थी। उन्होंने महिलाओं को इतना ‘दुस्साहसिक’ न होने की सलाह भी दे डाली थी।
वह गुस्सा भी याद है जो इस शहर की मध्यवर्गीय आबादी के दिल में उबल पड़ा था; और वह नफरत जो हत्यारों से लेकर निकम्मे प्रशासकों तक के लिए पैदा हुई थी। सौम्या हिंदुस्तान के हाशिये पर पड़े किसी भूले-बिसरे गांव की बेचारी बेटी नहीं, देश की राजधानी में रहने वाली एक मध्यवर्गीय कामकाजी युवती थी। ऐसा हादसा अगर उसके साथ हो सकता था तो फिर सुरक्षित कौन है! उसके बाद टीवी चैनलों की बहसों में बह चला गुस्सा मोमबत्तियों की शक्ल में इंडिया गेट पहुंचा था। सरकार से जवाब-तलब के लिए मोर्चे निकाले गए थे। फिर गैरसंजीदा सरकारी आश्वासनों की तरह यह गुस्सा भी ठंडा पड़ गया था।
मध्यवर्गीय गुस्से की फितरत और नियति दोनों यही होती है। उबल पड़ना, फिर ठंडा हो जाना। पर इस गुस्से का एक और चरित्र होता है। यह फिर से उबल पड़ने की संभावनाएं तो तलाशता रहता है, पर इस कोशिश के साथ कि यह संभावना ‘चेहरों’ या ‘मुद्दे’ के बतौर ही पैदा हो, न कि मंजिल तक पहुंचाने वाले एक लगातार आंदोलन की शक्ल में। आंदोलन यों भी राजनीतिक होते हैं और राजनीति जैसी ‘गंदी’ चीज को मध्यवर्ग हाथ लगाए भी तो कैसे! इससे क्या फर्क पड़ता है कि राजनीति हमारा वर्तमान और भविष्य दोनों तय करती


है। इसीलिए कभी जेसिका तो कभी सौम्या या आरुषि के साथ हुई घटनाएं हमारे गुस्से का सबब बनती हैं। सवाल यह कि हमारा गुस्सा तमाम सदिच्छाओं के बावजूद सिर्फ हमारे अपने वर्ग के खिलाफ हुए हमलों पर क्यों पैदा होता है। हमारी आवाज निम्नवर्गीय महिलाओं पर होने वाले अत्याचारों पर इतनी ही बुलंद क्यों नहीं होती? इन सवालों को हल किए बिना यौनिक हिंसा के इस दुश्चक्र से मुक्ति क्या संभव है?
आखिरकार ये सारे हमले एक ही स्रोत, यानी उस पितृसत्तात्मक व्यवस्था से निकलते हैं जो हमारे ‘आधुनिक’ लोकतांत्रिक ढांचे के अंदर के समाज का पूर्व-आधुनिक सच है। यह व्यवस्था न केवल इन हमलों को संभव बनाती है, बल्कि इनके लिए खुद महिलाओं को ही दोषी ठहराती है। बेशक, महिलाओं के अंदर भी वर्गीय विभाजन हैं। पर यह व्यवस्था उनकी वर्गीय पहचानों को ध्वस्त कर सारी पहचान यौनिकता में सीमित कर देती है। सूजन ब्राउनमिलर इसी कड़वे सच की तरफ इशारा करती हैं कि ‘बलात्कार और कुछ नहीं, बल्कि पुरुषों द्वारा महिलाओं को शाश्वत भय के अंदर रखने की सचेत प्रक्रिया है।’ सभी पुरुष भले ही यौनिक हिंसा में सीधे शरीक न हों, पर ऐसी किसी भी घटना पर उनकी चुप्पी उन्हें इन अपराधों का सहभागी बना देती है। खासतौर पर तब, जब राष्ट्रीय अपराध रिकार्ड ब्यूरो के आंकड़ों के मुताबिक  2010 में अकेले दिल्ली में बलात्कार के चार सौ नवासी, यौन उत्पीड़न के साढ़े पांच सौ और अपहरण के एक हजार तीन सौ उनासी मामले दर्ज हों। मतलब यह कि अगर न दर्ज होने वाले मामलों को छोड़ भी दें तो हम बस तीन-चार पर गुस्सा होते हैं या हो पाते हैं।
बाकी बस खामोशी होती है। बसों में मेट्रो के महिला डिब्बों में घुसने वाले पुरुषों के व्यवहार या बाजारों में महिलाओं के साथ छेड़छाड़ और घरों के अंदर स्त्रियों के खिलाफ शारीरिक और मानसिक हिंसा पर खामोशी। ये मामले छोटे लग सकते हैं। पर बड़ी हिंसा की शुरुआत ‘छोटे’ मामलों से बच निकलने के दंभ से ही जन्म लेती हैं। इसीलिए ऐसी हर चुप्पी तय कर देती है कि किसी सौम्या को न्याय नहीं मिलेगा और शुरुआती गुस्से के बाद तमाम सौम्याएं उन फाइलों में बस एक आंकड़ा भर बन कर रह जाएंगी जो फिर कभी नहीं खुलेंगी। तमाम शुरुआती शोर के बावजूद ये लड़कियां धीरे-धीरे अखबारों के श्रद्धांजलि के लिए एक तस्वीर बन कर रह जाएंगी, जिन्हें उनके परिवारों के अलावा कोई याद नहीं करेगा।

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