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खाते की खातिर PDF Print E-mail
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Tuesday, 09 September 2014 11:40

विष्णु बैरागी

जनसत्ता 9 सितंबर, 2014: प्रधानमंत्री जन-धन योजना का स्वरूप और अंतिम लक्ष्य अभी तक स्पष्ट नहीं है, लेकिन बैंकरों में इसका आतंक छाया हुआ है। अखबारों में इससे संबंधित जो विज्ञापन आए, उनमें भी कोई बहुत बड़ी बात नजर नहीं आती, सिवाय इसके कि हरेक परिवार को ‘बैंकिंग’ से जोड़ा जाए। लेकिन इसमें ऐसा कुछ तो है, जिसके लिए जी-जान लगा कर भाग-दौड़ की जा रही है। उस दिन रविवार था, लेकिन मेरे कस्बे के लगभग सभी बैंक दिन भर और रात लगभग नौ बजे तक खुले रहे। अधिकारी स्तर के कई लोगों को भी दफ्तर में रोके रखा गया। हरेक बैंक को उन गांवों की सूची दे दी गई थी, जहां के निवासियों के खाते खुलवाने थे। इन्हें कहा गया था कि ये गांवों में जाएं और लोगों के खाते खुलवाने की अपनी कोशिशों के प्रमाण भी पेश करें, अखबारों में इनके समाचार भी छपवाएं। लिहाजा ये बैंक अधिकारी अपने-अपने बैंक के बैनर साथ गए थे। इन्होंने वहां मजमा जमाया, लोगों को इकट्ठा किया और फोटो खिंचवाए। 

मेरे कस्बे में यह आयोजन हुआ और कई बैंकों ने अपने-अपने दफ्तर के बाहर स्टॉल लगाए। मुझे जब यह जानकारी मिली तो जान-बूझ क र बैंकों में गया। रविवार था। जहां-जहां मैं गया, तमाम बैंक ‘आबाद’ तो थे, लेकिन ‘गुलजार’ नहीं थे। दहशत, गुस्सा और मातमी उदासी पसरी हुई थी। मालूम हुआ कि स्थानीय स्तर पर ही नहीं, लगभग सभी बैंकों के उच्चाधिकारी भी हलकान हुए निगरानी कर रहे हैं। फोन पर फोन आ रहे हैं। केवल खाते खोलने के लिए नहीं, ‘रविवार को भी खाते खोले गए हैं’, यह बताना भी जरूरी। लिपिकीय स्तर के कुछ निष्ठावान कर्मचारी भी जुटे थे।

दो मजेदार नमूने इस अभियान के ‘आतंक’ की कहानी अधिक प्रभावशील तरीके से कहते मिले। पहले नमूने में एक अधिकारी ने अपने भरोसे के एक ‘कार्यकर्ता’ को प्रति खाता दस रुपए के भाव से यह काम सौंप दिया। यह ‘कार्यकर्ता’ भी उत्साही था। उसने रविवार को एक ही गांव के तिहत्तर लोगों के फॉर्म भरवा लिए। उसने भरोसा दिलाया- ‘आप बेफिक्र रहो साब! आपका टारगेट पूरा कर दूंगा!’ अब स्थिति यह थी कि उच्चाधिकारी इस बैंक


के स्थानीय अधिकारी की निगरानी कर रहे थे और यह अधिकारी इस ‘कार्यकर्ता’ की। 

दूसरे नमूने को व्यंग्य भी कहा जा सकता है और कारुणिक विडंबना भी। अपराह्न चार बजे के आसपास मैं एक बैंक में पहुंचा तो शाखा प्रबंधक ने असमंजसी मुद्रा में मेरी अगवानी की। मुझे कुछ पूछना नहीं पड़ा। मैंने पूछा- कैसा चल रहा है? वे बोले- आप ही बताओ कि मैं रोऊं या हंसूं? आरएम साहब कह रहे हैं कि ‘यार! तुम फॉर्म बाद में भरवाना, पहले कंप्यूटर में सारे खाते खोल लो और फौरन जानकारी भेजो। ऊपर वाले सांस नहीं लेने दे रहे हैं।’

हालांकि मुझे ऐसा लगा कि सारे अधिकारी अधिक से अधिक खाते खोलने के ही दबाव में नहीं हैं, वे इस योजना के (अब तक) अघोषित लक्ष्य का अनुमान कर भी भयभीत हुए जा रहे हैं। इस योजना के विज्ञापन में ‘छह माह तक खाते के संतोषजनक परिचालन के बाद ओवरड्राफ्ट की सुविधा वाली बात से सभी बैंक अधिकारी भयभीत और नाखुश हैं। अलग-अलग चर्चा में सबने एक ही बात कही कि छह महीनों के बाद हरेक खाताधारक को पांच हजार रुपए के ओवरड्राफ्ट की सुविधा दी जानी है। यह ऐसा उधार होगा जो कभी नहीं चुकाया जाएगा। एनपीए के विशाल आकार से जूझ रहे बैंकों के लिए यह ऐसा खतरा है जिसकी जानकारी उन्हें है, लेकिन बचाव का कोई उपाय किसी के पास नहीं है।  


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