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आरोपों की सच्चाई तो सामने आ ही गई PDF Print E-mail
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Tuesday, 09 September 2014 09:03



 मनोज मिश्र

नई दिल्ली। अब तो यह साफ होता जा रहा है कि दिल्ली में तुरंत कोई सरकार नहीं बन रही है। मंगलवार से पितृपक्ष शुरू हो रहा है, इस दौरान आम तौर पर छोटे-मोटे नए काम तक नहीं शुरू किए जाते हैं, ऐसे में सरकार और वह भी भाजपा बनाए यह संभव नहीं लग रहा है। अभी तो दिल्ली विधानसभा भंग करने के मुद्दे पर सुप्रीम कोर्ट के संविधान पीठ में मंगलवार को केंद्र सरकार को जवाब देना है। दूसरी ओर भाजपा पर आप विधायकों को तोड़ने का आरोप आप के नेता पहले से ही लगा रहे हैं। पहले भाजपा के नेता इसे आप का राजनीतिक स्टंट कहते थे मगर सोमवार को तो इसका प्रमाण आ गया।

आप के नेता अरविंद केजरीवाल के प्रेस कांफ्रेंस में लगाए गए आरोप के प्रमाण को किसी भाजपा नेता ने नहीं झुठलाया।  प्रदेश अध्यक्ष सतीश उपाध्याय ने जरूर कहा कि हमने किसी को इसके लिए अधिकृत नहीं किया, अगर ने किसी ने कोई बात की है तो उससे जवाब तलब कर रहे हैं। यह इसलिए भी हो रहा है कि यह माना जा रहा है कि अगर तुरंत चुनाव हो जाए तो आप सबसे ज्यादा फायदे में रहेगी। वास्तव में पहले दिन से ही सरकार बनाने की कवायद आप को कमजोर करने के लिए की जा रही है। दूसरे आप के ज्यादातर विधायक राजनीति में नए हैं, इसलिए लगता है कि उनको लोभ-लालच से तोड़ा जा सकता है। इसी कारण केजरीवाल बार-बार यही दुहराते हैं कि आप के सारे विधायक एकजुट हैं और चुनाव आने पर भाजपा को दिल्ली की जनता जबाब देने वाली है।

अभी जो हालात हैं उसके हिसाब से बीते 28 दिसंबर को आप की सरकार भी उसके दावों की कलई उतारने के लिए कांग्रेस ने बनवाई थी। अन्यथा जिस आप ने कांग्रेस को इतिहास में सबसे निचले पायदान पर पहुंचा दिया था, उसे बिना मांगे बिना शर्त समर्थन नहीं देती। कुल 49 दिनों में ही कांग्रेस की हालत ऐसी हो गई थी कि कैसे भी सरकार गिर जाए। केजरीवाल ने खुद ऐसे हालात बना कर सरकार से इस्तीफा दे दिया नहीं तो दिल्ली में कांग्रेस इतिहास बन जाती।  

उप राज्यपाल के सबसे बड़े दल को सरकार बनाने का न्योता देने प्रस्ताव से लगने लगा कि भाजपा गंभीर है। लेकिन सरकार बनने का कोई साफ फार्मूला न आने पर लगने लगा कि केवल नौ सितंबर को सुप्रीम कोर्ट की तारीख के लिए उप राज्यपाल से सारा नाटक करवाया गया है। नहीं तो यह कहना अजीब है कि अगर उप राज्यपाल न्योता देंगे तब पार्टी प्रयास करेगी। यह साफ है कि उप राज्यपाल ने अपनी रिपोर्ट तो भाजपा के कहने से ही भेजी। यह भी अजीब लग रहा है कि बिना संख्या बल के उप राज्यपाल सरकार बनवाने के लिए राष्ट्रपति को रिपोर्ट भेज दें। आप या कांग्रेस के दो तिहाई सदस्य टूट कर अलग दल बनाते और भाजपा को समर्थन देते तब तो कब की सरकार बन जाती। मगर


भाजपा नेतृत्व फैसला नहीं कर पाया जिससे बीती मई में सरकार नहीं बन पाई। संविधान में उप राज्यपाल को विधानसभा को संदेश भेजने का अधिकार है। उसी के तहत उप राज्यपाल ने आप की सरकार को विधानसभा में जन लोकपाल पेश करने से रोका और आप की सरकार ने इस्तीफा दे दिया था। इसी तरह उप राज्यपाल विधानसभा को सदन का नेता चुनने के लिए संदेश भेज सकते हैं। पहले संदेश पर और फिर नेता चुनने के लिए गुप्त मतदान हो सकता है। यह अभी तक केवल उत्तरप्रदेश विधान सभा में सुप्रीम कोर्ट के आदेश पर हुआ है। इसे दिल्ली में भी कराया जा सकता है इस पर कोई साफ विधान नहीं है।

राजनीति में कुछ भी आरोप लग सकते हैं लेकिन जो हालात हैं उसमें कुछ विधायकों से विश्वास मत पर क्रास वोटिंग कराए बिना भाजपा सदन में विश्वास मत हासिल कर ही नहीं सकती। भाजपा नेतृत्व अगर सही में सरकार बनाने पर गंभीर है तो सबसे पहले विधायक दल का नेता चुने फिर वह उन सीटों से आप विधायकों से इस्तीफा दिलवाए या मतदान के समय गैरहाजिर करवाए, जो भाजपा की पक्की सीटें हैं। संयोग से भाजपा की पक्की माने जाने वाली सीटों- रोहिणी, शालीमार बाग, ग्रेटर कैलाश, मालवीय नगर, कस्तूरबा नगर आप के पास हैं उनमें से बहुमत के लिए जितनी कम पड़ रही हो उतने विधायकों को बाद में पार्टी टिकट देकर उपचुनाव लड़वाए। तीन सीटें अभी खाली हैं। तीन या चार सीटें और खाली करवा कर 30 नवंबर से पहले उप चुनाव करवा कर भाजपा उन आप विधायकों को अपने खर्च पर चुनाव लड़वाए। यह भी साफ है कि कांग्रेस के किसी भी विधायक को भाजपा के टिकट से जिताने का जोखिम भाजपा नहीं ले सकती है। दलबदल विरोधी कानून से बचने के लिए कांग्रेस और आप का विभाजन कराना अब संभव नहीं दिख रहा है।

यह भी कहा जा रहा अभी उप राज्यपाल के प्रस्ताव पर भाजपा अल्पमत सरकार बनाए और जो समय दें उतने दिन में विश्वासमत हासिल करने की कोशिश करे, संभव न होने पर विधानसभा भंग करके चुनाव की घोषणा करा दे। पितृ पक्ष के बाद से प्रक्रिया शुरू करवाने से तो सितंबर वैसे ही पूरा हो जाएगा और तब तक हरियाणा आदि राज्यों के चुनाव की घोषणा हो जाएगी। फिर तो दिल्ली के चुनाव फरवरी तक टल जाएंगे। तब तक बिजली-पानी का मुद्दा कमजोर हो जाएगा। सब्जियों के दाम हर साल की तरह कम हो जाएंगे। कांग्रेस नेता चाहे जो दावे करें वे तो तुरंत चुनाव होने पर भाजपा से अधिक हरे हुए हैं। उनका भी लक्ष्य आप है। आप के नेताओं को लग रहा है कि चुनाव में देरी होने से उनके लोगों का उत्साह कम होगा लेकिन ऐसा है नहीं, एक बड़ा तबका उनके साथ बड़ी ही मजबूती से जुड़ा हुआ है और वह कुछ महीनों में उनसे अलग होने वाला नहीं है।

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