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जवाहिरी का जहर PDF Print E-mail
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Monday, 08 September 2014 11:52

अख़लाक़ अहमद उस्मानी

 जनसत्ता 8 सितंबर, 2014: किसी हिंदी सूफी संत ने कहा है कि कुछ लोग अपने नाम के मुताबिक होते हैं या उसके खिलाफ।

अरबी में ‘ऐमन’ लफ्ज का तजुर्मा सीधा और ‘जवाहिरी’ का अर्थ घटना होता है यानी ऐमन जवाहिरी का अर्थ होता है ‘सीधे रास्ते पर चलने वाला’ या ‘सीधी घटना का कारक’। लेकिन आतंकवादी संगठन अलकायदा यह सरगना अपने नाम के एकदम खिलाफ है; उतना ही इस्लाम के खिलाफ, जिसके नाम पर वह हत्या, जुल्म और ज्यादतियों को जायज ठहराने की कोशिश कर रहा है।

अल जवाहिरी के बयान से अधिक इसके समय और परोक्ष घटनाओं का महत्त्व है। पहले जवाहिरी के जहर को समझते हैं। इस महीने की चार तारीख की सुबह जवाहिरी ने कहा कि उसने भारतीय उपमहाद्वीप में जिहाद के लिए अलग दुकान खोल ली है। ठीक एक साल बाद आए एक वीडियो संदेश में वह कहता है कि अलकायदा के नए उपसंगठन ‘जमात कायदत अल जिहाद फी शिबही अलकुर्रत अलहिंदिया’ यानी ‘भारतीय उपमहाद्वीप में जिहाद के लिए अलकायदा’ का काम होगा कि जो सरहदें ब्रिटेन ने खींची थीं उन्हें मिटा कर एक खुदा के लिए लोगों को जमा करना। 

भारत को खास निशाने पर रख कर बनाई गई इस आतंकी योजना में जवाहिरी इस्लामी खिलाफत की परिकल्पना के लिए म्यांमा, कश्मीर, इस्लामाबाद और बांग्लादेश के नाम क्रम से बोलता है और कहता है ‘हम अलकायदा में तुम्हें भूले नहीं हैं; हम तुम्हें अन्याय और जुल्म से आजाद करवाएंगे। यह संदेश तुम भारत के मुसलमानों के लिए है कि हमें तुम याद हो।’ जवाहिरी ने जिन इलाकों के नाम लिए हैं वे बर्मा, असम, गुजरात, अमदाबाद, बांग्लादेश, कश्मीर और इस्लामाबाद के हैं। किसी और राज्य और शहर पर जवाहिरी ने इतना ध्यान नहीं दिया जितना गुजरात और अहमदाबाद पर। क्या यह संदेश मोदी को सुनाने के लिए है?

भारतीय उपमहाद्वीप के लिए अलकायदा की इस नई दुकान के मुखिया और पाकिस्तानी नागरिक असीम उमर और उसामा महमूद ने मिल कर इस योजना का घोषणापत्र भी लिखा है। उमर अलकायदा के लिए प्रचार सामग्री तैयार करने का काम करता है। वह लोकतंत्र का पक्का दुश्मन माना जाता है और इसके खिलाफ हथियारबंद आंदोलन का समर्थक है। पिछले साल उसने भारतीय मुसलमानों के लिए सीधे संदेश जारी करते हुए कहा था कि तुम मुसलमानों ने भारत पर आठ सौ साल राज किया, तुमने ही एक ईश्वर का प्रकाश-पुंज जलाया और जब दुनिया का मुसलमान जागृत हो रहा है तो तुम पीछे कैसे रह सकते हो? इस्लामी खिलाफत के लिए मुसलमान नौजवानों ने अपने प्राण न्योछावर कर दिए तो अब ऐसा क्यों नहीं हो सकता? 

उमर अपनी जहरीली जुबान से नौजवानों को उकसाने के लिए पाकिस्तान में जाना-माना नाम है। पाकिस्तान अलकायदा और इस जैसे वहाबी आतंकवाद की प्रयोगशाला है। वहां विचार, हथियार, धन और दिशा-निर्देश सब बाहर से आते हैं। पाकिस्तान इन्हें अंजाम देने में लग जाता है। एक वक्त तक जिहाद के नाम पर पाकिस्तान या उसके बहकावे पर अफगानिस्तान के लड़के ही फिदायीन आतंकवादी के रूप में दुनिया की नाक में दम किए हुए थे, लेकिन पिछली गर्मियों में जब से अलबगदादी और इसके संगठन आइएसआइएस का उभार हुआ है यह भ्रम भी टूट गया है कि मरने वालों में पाकिस्तान और अफगानिस्तान के ही लड़के होंगे। 

कनाडा से लेकर आॅस्ट्रेलिया, अमेरिका से लेकर ब्रिटेन तक, तुर्की से लेकर भारत और अफ्रीका के सहारा रेगिस्तान से लेकर काकेशिया की बर्फ तक जितने लड़के इब्न अब्दुल वहाब, सैयद कुत्ब और मौलाना अबुल आला मौदूदी की विचारधारा पर मरने चले आए हैं उसने अलकायदा के वजूद को झकझोर दिया है। 

अमेरिकी राष्ट्रपति बराक ओबामा दो अमेरिकी पत्रकारों की हत्या और इसका वीभत्स वीडियो सामने आने के बाद और दबाव में आ गए हैं। रिपब्लिकन सऊदी अरब के करीबी हैं और आजकल डेमोक्रेट पार्टी के माहिरीन नेता कतर के साथ पींगे बढ़ा रहे हैं। यह आइएसआइएस या अलकायदा की वर्चस्व की लड़ाई भर नहीं है। यह अमेरिका की घरेलू राजनीति के अंतरराष्ट्रीय प्रतिफल भी हैं। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी इसी महीने अमेरिका जा रहे हैं। जाहिर है अलकायदा की ताजा धमकी के बाद स्वाभाविक रूप से प्रधानमंत्री की अमेरिकी यात्रा के एजेंडे में अंतरराष्ट्रीय आतंकवाद से निपटने का मुद्दा सर्वोपरि होगा। 

जब से वहाबी आतंकवाद सऊदी अरब और कतर के खेमों में बंटा है, गांव-गांव गली-गली वहाबी विरासत का बंटवारा हो रहा है। सऊदी अरब से पोषित इस्लामिक स्टेट के आतंकवादियों ने अलकायदा की न सिर्फ बर्बरता को पीछे छोड़ दिया है बल्कि भारत से अब तक इस संगठन में पहुंचे अठारह लड़कों ने भारत की जमीन में डेढ़ सौ साल पहले बोए गए वहाबी पौधे के पहले फल देखे हैं।

उसामा बिन लादेन की मौत के बाद अलकायदा से छूटे और कई छोटे गुटों के नेताओं ने इस्लामिक स्टेट बनाया तो सऊदी अरब पोषित आतंकवाद को नई ऊर्जा मिली। लेकिन अलकायदा के वफादार कतर की तानाशाह सरकार के करीब आ गए हैं। यानी जिस वहाबी आतंकवाद का वैश्विक बंटवारा हुआ है उस योजना के तहत अलकायदा और उससे जुड़े स्थानीय आतंकवादी संगठन, मदरसे और बौद्धिक खाद देने वाले मौलाना अब कतर को रिपोर्ट करते हैं। भारत में यह बंटवारा स्पष्ट है और इसके साक्ष्य भी मौजूद हैं। कतर के वफादार मौलाना सऊदी अरब के भाड़े के वहाबी आतंकवाद और विचारधारा की आलोचना करते हैं और सऊदी अरब के तानाशाह अब्दुल्लाह और पूर्व खुफिया प्रमुख बंदर बिन सुल्तान के वफादार कतर पोषित


वहाबी आतंकवाद की। 

मोदी की अमेरिका यात्रा से पूर्व अलकायदा की धमकी दरअसल भारतीय आंतरिक सुरक्षा को कतर के पाले में धकलने की कोशिश भी है। इस पर मोदी की कट्टर हिंदुत्ववादी छवि का भी भरपूर इस्तेमाल करने की कोशिश की जा रही है। अलजवाहिरी की धमकी ने भारत की आंतरिक सुरक्षा संबंधी तैयारियों को नवीकृत करने के लिए मजबूर कर दिया है।

घरेलू आंदोलनों से परेशान और सऊदी अरब तानाशाह परिवार के बेहद करीबी पाकिस्तान के प्रधानमंत्री नवाज शरीफ अलजवाहिरी की धमकी से और दबाव में आ गए हैं। नवाज को कतर पसंद नहीं करता है। तहरीके तालिबान पाकिस्तान के प्रमुख फजलुल्लाह ने अलजवाहिरी के बयान का स्वागत किया है। फजलुल्लाह के साथ कई दौर की शांति वार्ता कर चुके नवाज इसका समाधान नहीं निकाल पाए हैं क्योंकि फजलुल्लाह आजकल कतर के खासमखास हैं। जवाहिरी के बयान से पाकिस्तान को फौरी तौर पर सिर्फ इतनी राहत है कि पाकिस्तानी अवाम को वहाबी योजना के इतने गहरे मतभेद की जानकारी नहीं है और भारत-विरोध के नाम पर कुछ दिन के लिए उनका ध्यान बंट सकता है। 

मिस्र में चुनी हुई मुसलिम ब्रदरहुड की सरकार के घोर वहाबी उर्फ सलफी एजेंडे के चलते मिस्री जनता और तत्कालीन सेनाध्यक्ष और वर्तमान राष्ट्रपति फतह अलसीसी ने मुरसी को चलता कर दिया था। अलसीसी को सऊदी अरब ने बहुत समर्थन दिया था लेकिन सीसी ने विचारधारा के अतिरिक्त सऊदी अरब की दी गई हर मदद लपक ली थी। यह घटना सऊदी अरब की तरफ से कतर को अंतरराष्ट्रीय स्तर पर दी गई सबसे बड़ी कूटनीतिक मात थी। इजराइल और हमास के बीच संघर्ष उस वक्त चरम पर पहुंचा जब इस्लामिक स्टेट का आतंक सिर चढ़ कर बोल रहा था। 

आजकल इजराइल सऊदी अरब के बहुत करीब है और कतर से बहुत दूर। जैसे ही गाजा का संघर्ष थमा, इस्लामिक स्टेट फिर हावी हो गया। भारत की नई सरकार इजराइल के बहुत करीब है और कई मसलों पर उसके साथ मिल कर चलना चाहती है। लेकिन इससे क्या इजराइल के दुश्मन भारत के दोस्त बने रहेंगे? कतर की तानाशाही के नजदीक आ चुके अलकायदा की धमकी कहीं भारत के लिए इजराइल से बेपनाह मुहब्बत में मिला गम न साबित हो?

इस्लामी आतंकवाद से निपटने में सबसे बड़ा खतरा उस देश में सांप्रदायिक विद्वेष फैलने का भी रहता है। मुसलमान आतंकवादियों को सजा दिए जाने को वहाबी तंजीमें मुसलिम दमन से जोड़ कर भरपूर जहर फैलाते हैं। ऐसे में भारत का तरीका क्या होना चाहिए, जहां मुसलमानों की दूसरी सबसे बड़ी आबादी रहती है? चेचेन्या में कट्टरता का गैर-संस्थानीकरण किया गया और वहाबी विचार के खिलाफ दूसरे सबसे बड़े विचार को ताकत दी गई। कोसोवो और चेचेन्या में वक्फ की मस्जिदों, मदरसों और संपत्तियों का प्रबंधन सूफी मत के लोगों को दिया गया। तंजानिया ने वहाबियों को संवैधानिक संस्थाओं से बाहर किया और उदारपंथियों को जगह दी। बांग्लादेश भी लगभग उसी तर्ज पर आगे बढ़ रहा है, मगर सऊदी अरब और कतर इस बात से बहुत खफा हैं। इसीलिए बांग्लादेश में वहाबी ‘स्लीपर सेल’ उदारपंथियों की हत्याएं कर रहे हैं। इन बातों में क्या भारत के लिए कुछ सीखने को है?

जवाहिरी का यह वीडियो सामने आने के फौरन बाद गृह मंत्रालय और खुफिया एजेंसियों की बैठक हुई और इस मुद््दे पर गहन विचार-विमर्श किया गया। इन ज्ञानियों ने मिल कर उन्हीं फॉर्मूलों पर बात की होगी जिन्हें अब तक आजमा रहे हैं, उसके आगे वे जा भी नहीं सकते। आज वहाबी आतंकवाद जितना विकृत, वीभत्स और विकराल हो चुका है उसकी सबसे बड़ी वजह वहाबी विचारधारा के संस्थानीकरण की है। जिन्हें पत्तियां तोड़ने पर दरख्त के खत्म होने का भ्रम रहता है, उनका वह भ्रम अब भी कायम है। जड़ों की जानकारी किसी आइबी या रॉ के पास नहीं है। चेचेन्या के राष्ट्रपति रमजान कादिरोव के फॉर्मूले की जरूरत है। जब समस्या इस्लाम के अंदर बिगाड़ करने से पैदा हुई तो इस्लाम के बाहर उसका निदान कैसे किया जा सकता है? खून में संक्रमण होने पर त्वचा पर क्रीम लगाने से मर्ज ठीक नहीं होता। 

इस्लाम की बुनियादी बातों को बदल कर इस वहाबी विचारधारा का संस्थानीकरण किया गया है; इस्लाम में ही जो लोग इसके खिलाफ बुनियादी लड़ाई लड़ रहे हैं, वही इसका उपाय भी बताएंगे। पत्तियां तोड़ने वाले माली कहलाते हैं और जड़ें जानने वाले काश्तकार। ईमानदार काश्तकार कभी धतूरे के बीजों को धान कह कर नहीं बोने देगा। माली अपना कर्तव्य भूल भी जाएं, लेकिन भारत समेत पूरी दुनिया के सूफी काश्तकार जानते हैं कि इस्लाम के बगीचे की जडें और बीज क्या हैं और अगर खरपतवार उग आए तो वह साफ कैसे की जाती है।


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