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भय का पाठ PDF Print E-mail
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Friday, 05 September 2014 12:07

ओम वर्मा

जनसत्ता 5 सितंबर, 2014: सन 1967-68 में नौवीं कक्षा में हमें जीव-विज्ञान और रसायनशास्त्र पढ़ाते थे पंड्याजी। एक अन्य सेक्शन में यही विषय अवधेशजी पढ़ाते थे। अवधेश सर के पढ़ाने के तरीके के चलते उनके घर ट्यूशन पढ़ने वालों की भीड़ लगी रहती थी। कभी-कभी दूसरे सेक्शन के कुछ विद्यार्थी भी उनकी कक्षा में बैठने का लोभ संवरण नहीं कर पाते थे। उनकी इस लोकप्रियता से पंड्याजी जैसे शिक्षक ईर्ष्या रखते थे। मैं पढ़ने-लिखने में अपेक्षया आगे था। न जाने क्यों पंड्याजी को लगा कि मैं अवधेशजी से ट्यूशन पढ़ने जाता हूं। उन्होंने एक छात्र के माध्यम से मुझ तक अपने यहां ट्यूशन पर आने का संदेश भिजवाया। उनकी नाराजगी के डर से मैं दो माह उनके यहां ट्यूशन पढ़ने गया। इन दो महीनों के कुल चालीस रुपए देने के लिए उन दिनों मेरे पिताजी ने कैसे पेट काटा होगा, यह वही जानते होंगे। अगले वर्ष दसवीं कक्षा में रसायनशास्त्र में कार्बन का अध्याय पढ़ाते समय पहले दिन ही डरा दिया गया। मास्टर साहब ने कहा कि ‘कार्बन’ एक बहुत ही कठिन और ‘दादा’ टॉपिक है... इसमें अच्छे-अच्छे की हालत खराब हो जाती है। अब आप ही सोचिए कि चौदह-पंद्रह आयुवर्ग के विद्यार्थियों पर इस बात का क्या असर पड़ा होगा! वह भी ऐसे स्कूल में जहां आधे विद्यार्थी आसपास के गांवों से आए थे। यह खौफ मुझ पर समूचे विद्यार्थी जीवन में हावी रहा।

उन दिनों एक छमाही या अर्धवार्षिक परीक्षा होती थी। मैं दसवीं कक्षा का रसायनशास्त्र की परीक्षा का पर्चा दे रहा था। ढाई घंटे का समय। प्रश्न-पत्र हाथ में आते ही पांच-दस मिनट में आधा हॉल खाली हो गया। आधा घंटा भी नहीं बीता होगा कि मुझे छोड़ कर बाकी भी चले गए। कक्षा में मौजूद शिक्षक महोदय ने मुझे घूर कर देखा। फिर मेरे हाथ से उत्तर-पुस्तिका ही छीन ली। बोले- ‘तुम्हारे अकेले के लिए क्या हम ढाई घंटे तक बैठे रहेंगे?’ मुझे आज तक अफसोस है कि अपनी ग्रामीण पृष्ठभूमि, शिक्षक पिता का पुत्र और चौदह वर्ष की आयु होने के कारण मैं उनका विरोध करने की हिम्मत नहीं जुटा पाया। जबकि उनके जैसे शिक्षकों ने ऐसी हरकतों से न जाने कितने विद्यार्थियों की जिंदगी


में अवसाद पैदा कर दिया होगा, कॅरियर की दिशा बदल दी होगी! एक शिक्षक अक्सर विद्यार्थियों से सिगरेट मंगवाते थे। आज समझ में आता है कि अपनी युवावस्था में कुछ वर्ष मैं धूम्रपान की लत का शिकार रहा तो उसमें एक कारण गुरुजी को लाकर दी गई सिगरेट भी थी। शिक्षकों की बोलचाल से लेकर उनकी ‘बॉडी लैंग्वेज’ तक का विद्यार्थियों पर बड़ा प्रभाव पड़ता है। चौथी क्लास के मेरे वर्ग-शिक्षक को पलकें झपकाने की आदत थी। उन्हें देख कर कुछ बच्चे भी अपनी पलकें झपकाने लग गए थे। मध्य विद्यालय के एक गुरुजी नवरात्र के दिनों में कड़ा उपवास रखते थे, इसलिए नौ दिन पढ़ाना स्थगित रख वे चुपचाप बैठे रहते थे। पता नहीं, उन्हें इसका पुण्य-लाभ मिला या नहीं, पर बच्चों की पढ़ाई का नुकसान जरूर होता था।

इसी तरह, विज्ञान जैसे विषय में पुस्तक रख कर पढ़ाने या सिर्फ एक-दो ‘प्रिय’ विद्यार्थियों से ही बार-बार बात करने या पूछने वाले शिक्षक कभी विद्यार्थियों से सम्मान नहीं पा सके। बल प्रयोग भी अब न सिर्फ शिक्षक की अक्षमता में गिना जाता है, बल्कि अनैतिक और असंवैधानिक भी है। विद्यालयीन शिक्षा, खासकर शुरुआती कक्षाओं में सिर्फ पढ़ाने की कला और बालमनोविज्ञान की समझ ही शिक्षक को विद्यार्थी की नजरों में सम्माननीय बना सकती है। बहरहाल, अब तो यही कामना है कि सभी बच्चों में इतना साहस पैदा हो कि बिना वाजिब वजह के कॉपी छीनने वाले शिक्षक की वे शिकायत कर सकें।  


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