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गुरु की राह PDF Print E-mail
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Friday, 05 September 2014 12:06

सुमेर चंद

जनसत्ता 5 सितंबर, 2014: अक्सर ऐसी खबरें आती रहती हैं कि किसी शिक्षक के व्यवहार से दुखी होकर विद्यार्थी ने आत्महत्या कर ली या स्कूल में अपने बच्चों के साथ दुर्व्यवहार से गुस्साए ग्रामीणों ने स्कूल में ताला जड़ दिया। आजकल स्कूली बच्चियों से छेड़छाड़ तक के मामले आने लगे हैं, जिसमें कई बार शिक्षक भी आरोपी होते हैं। सवाल है कि क्या हमारे स्कूलों और शिक्षकों के ऐसे आचरण से देश का निर्माण होता है, समाज में सद्भावना पनपती है? क्या ऐसे आचरण से खुद अध्यापक समुदाय का मान बढ़ता है? क्या इस तरह की खबरें और घटनाएं सामने आने के बाद भी विश्व के आध्यात्मिक गुरु के रूप में मशहूर देश का नाम कहीं सम्मानपूर्वक लिया जाता होगा?

मुझे इसी तरह की बातें कई बार सोचने पर मजबूर करती हैं कि अपने अधिकारों के लिए झंडा उठा कर आंदोलन करने वाला हमारा अध्यापक समुदाय अपने रास्ते से क्यों भटक गया है। हालांकि आज भी ऐसे भटके हुए शिक्षकों की तादाद बहुत कम है। लेकिन उनकी हरकतें समूचे शिक्षक समुदाय को कठघरे में खड़ा करती हैं। सवाल है कि जिस पढ़े-लिखे आदमी के जिम्मे सारे देश को पढ़ाना है, वह अपना दायित्व क्यों भूल गया? जिसके जिम्मे भटके हुए लोगों और समाज को भी राह बताने का काम होता है, वह खुद ऐसी स्थिति में क्यों आ गया कि उसे भी रास्ते पर चलने की सलाह देने की जरूरत पड़ रही है?

मुझे लगता है कि देश निर्माण का काम गलत हाथों में चला गया है। विद्यार्थियों से लेख लिखवाए जाते हैं कि ‘आगे चल कर तुम क्या बनोगे’। जवाब में शायद ही कोई भूला-भटका विद्यार्थी लिखता होगा कि ‘मैं अध्यापक बनूंगा’। फिर भी उन्हीं विद्यार्थियों में से बहुत सारे अध्यापक प्रशिक्षण पाठ्यक्रम में दाखिला लेते हैं। कई बार वे इसके लिए ‘जोड़ तोड़’ भी करते हैं। लेकिन मामला शायद रोजगार का है। मेरा तो मानना है कि भारत की फौज में भी ज्यादातर नौजवान सिर्फ बेरोजगारी के कारण ही जाते हैं। मगर प्रशिक्षण के बाद वे अच्छे लड़ाकू बन जाते हैं और देश की रक्षा का भार उन्हीं पर होता है। यह फर्क अध्यापक और फौजी के बीच क्यों है? अध्यापक प्रशिक्षण के बाद अच्छा और जिम्मेदार शिक्षक क्यों नहीं बनता? बस यही बात सोचने वाली है। जहां फौज का प्रशिक्षण खुद फौज के जिम्मे है, वहीं अध्यापक का प्रशिक्षण अब निजी संस्थानों के हाथों में जा रहा है। कोई अनजान व्यक्ति भी जानता है कि निजी संस्थाएं मोटी राशि वसूल कर ये पाठ्यक्रम चलाती हैं। यानी प्रशिक्षण के बजाय व्यापार करती हैं। फिर ऐसे व्यापार से हम कैसे ‘उत्पाद’ की आशा रखते हैं? बात यहीं खत्म नहीं होती है!


जहां फौज में जाते ही वेतन पक्का हो जाता है, वहां अध्यापक को रोजगार के लिए कई तरह की नौकरशाही की जटिलताओं से गुजरना पड़ता है।

हो सकता है कि अध्यापक बनना बेरोजगारी से पिंड छुड़ाना हो। लेकिन अध्यापक बनने के बाद असल काम देश के लिए चरित्रवान नागरिक तैयार करना होता है। ऐसे नागरिक ही देश की शक्ति हो सकते हैं। जब हममें से ज्यादातर लोग अनपढ़ थे, तब तक बहुत कम लोग बेईमान थे, झूठ कम बोलते थे, भाईचारा मजबूत था, बड़े-बुजुर्गों का मान-सम्मान था, देशप्रेम अब से ज्यादा था। इसके अलावा, अपराधों की संख्या भी बहुत कम थी। मगर आज के अध्यापकों ने हमें भारतीय होकर सिर ऊंचा करके चलना सिखाने के बजाय पतलून पहन कर मम्मी-डैडी और अंकल-आंटी बोलना सिखा दिया, लेकिन नैतिकता से दूर रहने और निष्ठा से दुश्मनी की ओर जाने से बचने का रास्ता नहीं दिखाया। हम चरित्र को धनाढ्य होने में न केवल रोड़ा मानते हैं, बल्कि मौका लगते ही इसे भुनाने से भी नहीं हिचकते। हालत यह है कि देशप्रेम बस पुस्तकों तक सीमित रह गया है।

अध्यापक सच्चा मार्गदर्शक समझा जाता है। कहा भी गया है- ‘वह बूंद को तूफान बना देता है/ हर मुश्किल को आसान बना देता है/ मिट्टी के पुतले को छूकर भी/ अध्यापक तेजस्वी इंसान बना देता है।’ लेकिन सच यह है कि आज का अध्यापक विद्यार्थियों का मार्गदर्शक नहीं, बल्कि केवल नौकरी निबाहने वाला एक मुलाजिम रह गया है। वह परीक्षाओं में ज्यादा से ज्यादा नंबर लाने, गाइड से पढ़ने, ट्यूशन पढ़ने के लिए प्रेरित करने को ही अपना मूल काम समझ बैठा है। उसके आचरण संबंधी शिकायतें जो आती रहती हैं, वह तो अलग है और समूचे समाज के लिए शर्मिंदगी का विषय है। लेकिन अब समूचे समाज को सोचना होगा कि यह स्थिति उसके लिए कितनी नुकसानदेह है। इससे पहले कि हम अंधकार के कुएं में और गहरे डूबें, शिक्षकों को अपना दायित्व समझना होगा।


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