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कर्तव्य संस्कृति से साक्षात्कार PDF Print E-mail
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Thursday, 04 September 2014 11:40

लक्ष्मीधर मालवीय

 जनसत्ता 4 सितंबर, 2014: प्रियवर नरेंद्र मोदीजी नमस्कार, जापान के एक विश्वविद्यालय में नियुक्त हो यहां आए

मुझे पचास बरस होते हैं। वहां से अवकाश पाकर मैं पिछले पचीस वर्ष से क्योतो जिले के इस ठेठ पहाड़ी गांव में निवसित हूं। मेरी किशोरावस्था बीती अब से तीन चौथाई शतक, पचहत्तर साल पहले के बनारस में। आपके क्योतो आगमन का पता चलते ही ऐसा लगा जैसे अपने घर का प्राणी मेरे यहां आ रहा है। 

जापान में पदार्पण किया आपने तोक्यो या हिरोशिमा में नहीं बल्कि क्योतो में! क्योतो में कोई बड़ा उद्योग-धंधा नहीं, बड़े कल-कारखाने नहीं, नदियों के किनारे चार मंजिल या इससे अधिक ऊंची इमारत नहीं, विज्ञापन के बड़े साइन बोर्ड तक नहीं! हैं तो, मंदिर, शिंतो समाधि, मंदिर, और मंदिर! और है यहां रसी-बसी जापान की पुरानी संस्कृति- जो क्योतो की बोली तक में अनूठी मिठास भर कर उसकी अलग पहचान बनाती है! इस गांव में एक ही दूकान है, बिसाती की। दूकान में ग्राहक के घुसते ही गल्ले के पीछे खड़ी महिला का स्वागत वचन ‘ओइदे यासु!’ कानों में पड़ते ही मालूम हो जाता है, यह क्योतो की कन्या है! क्योंकि पूरे जापान में केवल क्योतो में यह बोली बोली जाती है! 

आपके द्वारा क्योतो का चुनाव करते ही प्रगट हो गया, आप किस मन से क्योतो पहले आए हैं। वैसे ही गुजरात और दिल्ली को छोड़, वाराणसी का चुनाव करने से भी आपका इरादा स्पष्ट हो जाता है! 

अब से ढाई हजार साल पहले एक भिक्षु बोधिवृक्ष से पाटलिपुत्र नहीं, वाराणसी चल कर गया था, धर्म प्रवर्तन करने के लिए! वरुणा नदी पार करने के लिए उसके पास देने को द्रव्य न था! गेरुआ वस्त्र पहने देख केवट ने उन्हें मुफ्त में पार पहुंचा दिया! उस दिन से आज दिन तक काशी के मल्लाह गेरुआ वस्त्रधारी संन्यासियों से किराया नहीं लेते! 

लगभग इसी समय दूर शलातुर (अब पेशावर के पास चार सड्डा) से चल कर पूरा मध्य प्रदेश पार कर, एक युवक 3959 पंक्तियों की पोथी बगल में दबाए हुए पाटलिपुत्र की शास्त्रकार सभा के आगे उसे प्रस्तुत करने पहुंचा था। सारे एकत्रित विद्वानों ने इस ‘अष्टाध्यायी’ को सिर झुका कर स्वीकार किया। विश्व के इस प्रथम व्याकरण में ढाल कर हमारी भाषा ‘संस्कृत’ कहलाई। लेकिन काशी के पंडितों ने इसमें भी संशोधनों का पख लगा दिया- इन संशोधनों को ‘काशिका’ कहते हैं और इनके बिना संस्कृत व्याकरण का ज्ञान अधूरा रह जाता है! 

गोस्वामी तुलसीदास ने सन् 1631 में ‘रामचरितमानस’ लिखना शुरू किया था, अयोध्या में! उसे अधूरा लेकर वे चले आए थे, वाराणसी। ‘असी गंग के तीर’ एक बनारसी बजरे में रहते हुए उन्होंने ग्रंथ पूरा किया था और उसे बाबा विश्वनाथ को समर्पित किया! 

बादशाह औरंगज़ेब के कानों में यह खबर पहुंचाई गई कि बनारस के ब्राह्मण अपनी पाठशालाओं में अपनी किताबें पढ़ाते हैं और उनमें दूर-दूर से विद्यार्थी और जिज्ञासु आते हैं। ये पाठशालाएं गंगा किनारे-किनारे फैली थीं। बादशाह के हुक्म से 2 सितंबर 1669 को ये सारी पाठशालाएं गिरा दी गर्इं- इसी झपेटे में विश्वनाथ मंदिर भी ढहा दिया गया। 

पंडित मदन मोहन मालवीय का स्वप्न था, एक विश्वविद्यालय की स्थापना। इसके लिए आवश्यक भूमि, जितनी भी वे चाहते, उन्हें बीकानेर में महाराज गंगा सिंह से मिल सकती थी। वैसे ही मनोवांछित भूमि उन्हें मिथिला में दरभंगा नरेश रामेश्वर सिंह से भी मिल सकती थी मगर उन्होंने गांव मांगे महाराज बनारस से- दक्षिणा के रूप में!

ऊपर मैंने जितने भी दृष्टांत दिए, सब में एक ही तत्त्व समान है- ‘शब्द’! काशी ही वह पवित्र स्थान है, जहां शब्द हो जाता है शास्त्र ही नहीं शस्त्र भी! गौतम बुद्ध के शब्द हिमालय की दुर्लंघ्य पर्वत श्रेणियों को लांघ, अगम्य गोबी का रेगिस्तान भी पार कर चीन, कोरिया और जापान तक व्याप्त हुए। 

जापान में ज़ेन, ‘धम्म’, जापानी वर्णमाला तक एक भारतीय भारद्वाज गोत्रीय, केरल निवासी भिक्षु, बोधिसेन की देन है! जापान में हजार-डेढ़ हजार साल पुरानी समाधियों के सिरहाने लगे पंच तत्त्व के प्रतीक पांच पत्थरों पर नागरी लिपि के पांच अक्षर उकेरे हुए मिलते हैं!

‘स्मार्ट’ कहने में मुखसुख मिलता हो तो कह लें, पर मुझे तो क्योतो ‘स्वच्छ’ दिखलाई देता है, और अपनी पुरानी काशी स्वच्छ ही नहीं, स्फूर्त भी! और यह गांव भी क्योतो जितना ही स्वच्छ है। 

ऐसा इसलिए कि यहां मनुष्य ही नहीं, हर वस्तु ठीक-ठिकाने पर है। घरों की दो पट्टियों के एक सिरे पर जालियों से घिरा हुआ घूरा है, जिस पर हफ्ते के नियत दिन, नियत रंग की थैली में नियत किस्म का कूड़ा रखा जाता है- नियत समय पर गाड़ी कूड़ा उठा ले जाती है। हर परिवार की पारी बंधी है, एक माह घूरे को धोकर साफ रखने की। वैसे ही हर मनुष्य का स्थान और काम भी नियत है। थोड़ी समझ आ जाने के बाद बच्चा भी जानता है कि घर में भोजन की चौकी पर बैठने का उसका स्थान कहां है, व्यंजन परसे जाने पर उसकी बारी कब आएगी। किसे माफी कराना चाहिए, और किसे माफ करना, यह भी पूर्व निश्चित है। 

डाक टिकट लिफाफे के ऊपरी दाएं कोने पर लगाना है। दूध के डिब्बे पर जहां निशान बना है, डिब्बा वहीं से खोला जाता है। ऊंची इमारत से कूदकर आत्महत्या करने वाले भी जूता हो या सैंडिल, उन्हें जोड़ा बनाकर छोड़ जाते हैं। बुलेट ट्रेन नियत समय से 10 सेकेंड देरी कर स्टेशन पर पहुंचे तो उसके ड्राइवर पर क्या बीतेगी, कभी पता करें। सड़क किनारे सिगरेट के बुझे हुए टोटे नहीं दिखाई देते क्योंकि कोई फेंकता नहीं, इस डर से कि कोई दूसरा व्यक्ति उसका चेहरा देखेगा- ‘चेहरा दिख जाना’ नक्कू बनना है। एक जापानी के लिए जीवन प्राण है, ‘चेहरा’!

सारा जापान कैसे और कितने समय में यों स्मार्ट बना होगा, भला! यह अनुशासन हुआ है, पिछले चार-पांच सौ साल लंबी सख्त तानाशाही शासन के तले रहते हुए! सन् 1868


से पहले आम जापानी का नाम ही होता था, मोदी, अबे या मालवीय जैसे उपनाम से रहित! जापान में ‘मैं’ कहीं है ही नहीं, सर्वत्र ‘हम’ है- ‘हमारा देश’, ‘हमारी जापानी भाषा’।

इसे थोड़ा विस्तार से इसलिए लिखा कि हम भारतवासियों का ‘जैसी पड़ै सो सहि रहै’ का स्वभाव इतना बद्धमूल है कि किसी दूसरे के लिए निज हित का त्याग करना तो बहुत दूर, वह अपने ही हित के लिए भी हाथ-पांव नहीं डुलाना चाहता! जापानवासियों ने जो भी हासिल किया है, वह बहुत सारे स्वार्थों का बलिदान कर!

हम भारतीयों का मस्तिष्क तो भरा है शब्दों से, उससे हम मनन, चिंतन और तर्क करते हैं- एक-एक शब्द के दर्जनों पर्याय हैं- हम एक ही अक्षर में मात्राएं लगाकर उसे दस गुना कर लेते हैं। जापानी भाषा में मात्रा तो दूर, अक्षर भी गिनती के हैं! हमारे वर्गीय बारह अक्षरों ‘क’ ‘का’ आदि की जगह केवल पांच। पर्यायवाची शब्द तो सूर्य और जल के भी नहीं! जापान में ‘वाक्पटु’ को लबार झूठा और दगाबाज माना जाता है। इस देश में बहस तो दूर, बोलने तक की जरूरत कम ही पड़ती है! व्यक्ति जिस स्थान पर नियुक्त है, वहां वह अपना कर्तव्य पूरा कर रहा है- इस प्रकार सारा जापान एक विशाल यंत्र के समान है, जिसका हर पुर्जा ठीक से काम कर रहा है। जापानी लोग भाषा के सहारे विचार न कर, अपनी कलाई के आगे की हथेलियों और उंगलियों से ‘कर्म’ करते हैं, भूलें करके भी उससे सीखते हैं। फिर फिर कर्म करने की प्रक्रिया में कर्म और कर्ता मिलकर एक हो जाते हैं! वह चाहे सामुराई की तलवार बनाने वाला लोहार हो या डेढ़ हजार वर्ष अडिग खड़े रहने वाले पंचखंडा मंदिर शिखर का निर्माता सिद्धहस्त बढ़ई- लोहार पृथक नहीं रहा, वह तलवार में है। ऐसे ही बढ़ई भी। जापानी जन के जीवन में यही है ज़ेन (ध्यान)!

जिस देश के केवल एक पांचवें हिस्से पर सारी आबादी बसती हो, जहां कोई भी खनिज पदार्थ न हो, जहां आए दिन भूकंप से धरती डोलती हो, ज्वालामुखी का विस्फोट, भुरभुरे पर्वत तूफानी बारिश में ढह-ढह पड़ते हों, वहां सदा चौकन्नी रहने वाली व्यवस्था कायम न रखी जाए तो आदमी जिए तो कैसे?

हमारी और जापानियों की बनावट कितनी जुदा-जुदा है! शब्दों में जीने वाले हम, इससे शब्द जब अपनी पहचान खो देते हैं तो शिव शव हो जाता है। काशी में यही हुआ है और अन्यत्र भी। इससे कूड़ा नजर के सामने होने पर भी नजर में नहीं आता! हमारे देश का हिंदी भाषी भाग ही मदुराई, गोवा और केरल की तुलना में इतना अधिक गंदा क्यों है!

भगवान् शेष के अवतार पतंजलि ने इसी से ‘शब्द’ को इहलोक-परलोक की कामनाएं पूरी करने वाला कहा है-

एक: शब्द: सम्यक् ज्ञात: संप्रयुक्त: स्वर्गे लोके च कामधुग् भवति

मैं पिछली बार काशी गया था, तीस वर्ष से ऊपर होते हैं, सन् 81 में। मेरी दो बुआएं वहां ब्याही गई थीं। गुदौलिया मिश्रों के मुहल्ले में एक सज्जन से मिलने गया। हम बातें कर रहे थे कि बीच में बिजली चली गई। लालटेन थी। लौटने को हुआ तो लालटेन लेकर वे साथ चले। घूरे का ढेर और गोबर से बचने को लालटेत दिखाते, चौड़ी सड़क तक।

अगले दिन जल्दी उठकर बनारस का सूर्योदय देखने को पैदल गंगा तट तक गया। मणिकर्णिका घाट। जलती हुई चिताओं की चिरायंध गंध। गोल चरणपादुका को देर तक देखता रहा। नवंबर सन् 46 में यहां आया था, पितामह की पार्थिव देह इसी चरणपादुका पर अग्नि संस्कार पाकर पंचतत्त्वों में लीन हुई थी! तब तो गंगा में बहते या घाट किनारे लगे सड़े-गले शव दिखलाई न दिए थे। अब सुनते हैं, विदेशी सैलानी ऐसे शवों के वीडिओ उतारकर यू-ट्यूब पर दिखाते हैं! काशी पहले की सी स्वच्छ हो जाए तो हार्दिक मनोकामना है, एक बार फिर किशोर वय वाली अपनी काशी का दर्शन करने की!

मेरा अब तक का सारा जीवन हिंदी साहित्य के अध्ययन-अध्यापन में बीता है। अब अस्सी वर्ष की वय में आकर मन किसी दूसरी ओर नहीं जाता। आप हिंदी के समर्थक हैं, यह जानते हुए आपसे एक अनुरोध दूर क्योतो में रहते हुए कर रहा हूं।

एक कांग्रेसी नेता ने प्रदर्शनी लगाने के इरादे से नागरी प्रचारिणी सभा, काशी, के पुस्तकालय की अलमारियां खाली कराने के लिए हजारों हस्तलिखित पोथियां और पुस्तकें बोरों में भरवा दी थीं! प्रदर्शनी तो हो गई, बोरों में बंद अमूल्य हस्तलेख बीस-पच्चीस वर्ष बाद अब भी बोरा बंद फर्श पर पड़े हैं! इससे बड़ी लज्जाजनक बात और क्या होगी कि जो संस्था हिंदी की उन्नति के लिए स्थापित हुई थी, वह हिंदी के अति दुर्लभ ज्ञान भंडार की कब्रगाह हो गई!

आपसे साग्रह अनुरोध करता हूं, दीमकों का आहार बनने से जो भी हस्तलेख बच रहे हों उन्हें वहां से कैसे भी क्यों न हो, निकलवा कर सुरक्षित स्थान पर भिजवा दें। नहीं तो काशी पर वाग्देवी सरस्वती का शाप लगा रहेगा।

काशी का बांकापन प्रसिद्ध है। आपने जो बीड़ा उठाया है, वह भी कम टेढ़ा नहीं। आप चिर युवा बने रहें, उद्यम में कभी न थकें- यह मेरी हार्दिक शुभकामना है।  


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