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प्रधानमंत्री की पोशाक PDF Print E-mail
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Thursday, 04 September 2014 11:35

राजकिशोर

जनसत्ता 4 सितंबर, 2014: प्रेस का कहना है, प्रधानमंत्री ने जापान का दिल जीत लिया। मैं नहीं जानता कि जापान का दिल कहां बसता है। यह तो पक्का ही है कि वह वेशभूषा में नहीं बसता होगा। जापान एक परिपक्व देश है। इसलिए उसका ध्यान हमेशा डॉलर पर केंद्रित रहता होगा। नरेंद्र मोदी ने जापान से कहा- हमारे यहां सामान बनाइए और दुनिया भर में बेचिए। इसमें हम आपको पूरा सहयोग देंगे। किसी भी निवेशक देश के लिए ये शब्द अत्यधिक आकर्षक होते हैं। मानो जापान से कहा जा रहा हो कि अपने औद्योगिक उपनिवेश का एक पौधा हमारे देश में भी रोप दीजिए- हमारे कृतज्ञ होने की सीमा नहीं रहेगी।

आधुनिक शहरों की स्थापना के पहले सबसे ज्यादा और साफ-सुथरे शहर भारत में ही थे। हड़प्पा और मुअनजोदड़ो की सभ्यता शहरी सभ्यता थी। दुनिया में और कहीं भी खुदाई में ऐसे व्यवस्थित और कलात्मक शहर नहीं मिले हैं। हमारे बंदरगाह अद्वितीय हुआ करते थे। हां, सामूहिक नहान की व्यवस्था नहीं थी, क्योंकि लोगों के पास नहाने का निजी प्रबंध था। बनारस भी ऐसा ही ऐतिहासिक शहर है। यह शहर उससे पहले का है, जब जापान के लोग जानते भी नहीं थे कि गांव और शहर में फर्क क्या होता है। लेकिन ज्यों-ज्यों वाराणसी की विद्या गिरती गई, वैसे ही, एक शहर के रूप में, वाराणसी की महिमा कम होती गई। आज वह शहर से ज्यादा गांव जान पड़ता है। इस अपने ढंग के अनोखे गांव को क्योटो जैसा शहर बनाने का सपना लेकर प्रधानमंत्री जापान से लौटे हैं। यह जापान से विस्तारित प्रार्थना है कि आप न केवल अपने उद्योग हमारे यहां लगाइए, बल्कि अपना एक शहर भी हमें दे दीजिए।

यहां हम प्रधानमंत्री के आर्थिक-सांस्कृतिक विचारों की समीक्षा करना नहीं चाहते। उनकी पोशाक पर टीका-टिप्पणी करना चाहते हैं। प्रधानमंत्री जब देश में होते हैं, तब कुरता-पाजामा पहनते हैं। यह एक तरह से हमारे देसी नेताओं की राष्ट्रीय पोशाक बन गई है। इसका नजारा तब देखने में आता है जब वे राजघाट पर गांधीजी को श्रद्धांजलि देने के लिए जमा होते हैं। तब कोट-पैंटधारी भी खादी के कुरता-पाजामे में नजर आते हैं। लेकिन यही नेता जब विदेश जाते हैं, तब उनकी पोशाक बदल जाती है। वे पैंट और कोट में समाए हुए मिलते हैं। मानो उन्होंने पोशाक नहीं बदली, तो विदेश का मंत्री उन्हें तीसरी दुनिया का आदमी मानने को तैयार ही नहीं होगा।

मेरी कल्पना जानना चाहती है कि प्रधानमंत्री ने जिस पोशाक में आधुनिक उद्योग-धंधे और एक स्मार्ट शहर जापान से मांगा, किसी और पोशाक में वे यह मांग नहीं कर सकते थे? अगर वे कुरता-पाजामे में ही वहां जाते, तो क्या उन्हें प्रधानमंत्री नहीं


माना जाता? या, उनकी वैसी खातिरदारी नहीं होती, जैसी कि हुई? पोशाक बदलने से मन और मस्तिष्क भी बदल जाते हैं या संस्कृति भी बदल जाती है, यह मैं नहीं मानता, पर यह जरूर कहना चाहता हूं कि हर पोशाक अलग से कुछ कहती है। यह कथ्य क्या भीतर से आता है? यह सवाल फिजूल है, क्योंकि आएगा तो और कहां से आएगा? ऐसा लगता है कि पोशाक परिवर्तन कथ्य परिवर्तन भी है। चूंकि पहला परिवर्तन कुछ समय के लिए होता है, इसलिए दूसरा परिवर्तन भी स्थायी नहीं होता।

गांधीजी इतने काम के आदमी हैं कि किसी भी प्रसंग में उन्हें याद किया जा सकता है। पोशाक के मामले में भी वे अद्वितीय थे। एक धोती होती थी, जिसके एक हिस्से को वे चादर बना लेते थे। इसी तसवीर को देख कर ब्रिटेन के राजनीतिक विंस्टन चर्चिल ने उन्हें ‘अधनंगा फकीर’ कहा था। एक पत्रकार ने जब इस पर गांधीजी की प्रतिक्रिया जानना चाहा, तब उन्होंने, शायद हंसते हुए, कहा- काश, मैं इससे ज्यादा नंगा हो पाता। गांधीजी का अभिप्राय क्या था, यह कौन बता सकता है? क्या वे चाहते थे कि लोग प्राकृतिक अवस्था में ही रहें? अगर हां, तो मैं उनका समर्थन करता हूं।

वर्तमान संदर्भ में गांधीजी का दूसरा कांड ज्यादा समीचीन है। दूसरे गोलमेज सम्मेलन में भाग लेने के लिए वे 1931 में लंदन गए। वहां सम्राट से मिलने का कार्यक्रम भी था। लंदन के अखबारों में सवाल यह उठा कि वे किस वेश में सम्राट से मिलेंगे। जब गांधीजी ने स्पष्ट कर दिया कि वे जिस वेश में रहते हैं, उसी में मिलेंगे, तब कोलाहल और तेज हो गया। सम्राट से अनुरोध किया गया कि वे गांधी से न मिलें। पर अंत में गांधीजी अपनी ही पोशाक में बरमिंघम पैलेस गए।

हर कोई गांधी नहीं हो सकता, पर वह वह तो हो सकता है जो वह अपने लोगों के बीच है।


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