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गंगा पर कठघरे में केंद्र PDF Print E-mail
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Thursday, 04 September 2014 08:40



जनसत्ता ब्यूरो

नई दिल्ली। गंगा को प्रदूषण मुक्त करने का नरेंद्र मोदी सरकार का महत्त्वाकांक्षी चुनावी वादाबुधवार को सुप्रीम कोर्ट की जांच के दायरे में आया। अदालत ने कहा कि ऐसा लगता है कि अभी तक किए गए उपाय दोसौ साल बाद भी देश की पवित्रतम नदी को स्वच्छ नहीं बना सकेंगे। शीर्ष अदालत ने केंद्र सरकार को निर्देश दिया कि तीन हफ्ते के भीतर गंगा नदी की सफाई कर उसका प्राचीन गौरव बहाल करने के लिए ‘चरणबद्ध योजना’ पेश की जाए।

न्यायमूर्ति तीरथ सिंह ठाकुर और न्यायमूर्ति आर भानुमती के खंडपीठ ने कहा-आपकी कार्य योजना देखने के बाद तो ऐसा लगता है कि दो सौ साल बाद भी गंगा साफ नहीं होगी। महत्त्वाकांक्षी परियोजना का मूल्यांकन कर आपको गंगा का प्राचीन गौरव बहाल करने के कदम उठाने हैं।

जजों ने कहा कि यह महत्त्वाकांक्षी परियोजना है। कृपया कोशिश करें कि अगली पीढ़ी नदी को अपने मूल रूप में देख सके। हमें नहीं मालूम कि हम देख सकेंगे या नहीं। शीर्ष अदालत ने कहा कि इस कार्य योजना के प्रति नौकरशाही वाला नजरिया गंगा नदी को स्वच्छ बनाने की प्रधानमंत्री की महत्त्वाकांक्षी परियोजना को पूरा करने में मददगार नहीं होगा। अदालत ने सरकार से कहा कि कलात्मक दृष्टिकोण के बजाए पावर प्वाइंट प्रजेंटेशन तैयार किया जाए। अदालत दूसरे देशों से मिलने वाली वित्तीय सहायता को लेकर चिंतित नहीं है। लेकिन उसकी चिंता है कि 2500 किमी लंबी नदी की सफाई परियोजना पर काम करने के बारे में आम आदमी को कैसे समझाएंगे। 

जजों ने जल संसाधन, नदी विकास और गंगा नवीनीकरण मंत्रालय के हलफनामे के अवलोकन के बाद महान्यायवादी रंजीत कुमार से कहा-हम समितियों की बारीकियों में नहीं जाना चाहते। लेकिन गंगा की सफाई की प्रक्रिया को लेकर आम आदमी की क्या अपेक्षा है। उसे यह तो पता


होना चाहिए कि सरकार कैसे काम कर रही है।

आपने नौकरशाही जैसा स्पष्टीकरण दे दिया है। हम आम आदमी की भाषा में समझना चाहते हैं कि परियोजना पर कैसे काम किया जाए। अदालत ने महान्यायवादी से कहा कि इस मामले में पूरक हलफनामा दाखिल किया जाए। अदालत ने कहा कि पावर प्वाइंट प्रजेंटेशन चरणबद्ध कार्य योजना को समझने में मददगार होगा। 

अदालत ने सरकार से विशेष रूप से कहा कि गंगोत्री से नीचे 135 किलोमीटर की नदी के पारिस्थितिकी दृष्टि से संवेदनशील क्षेत्र के लिए उठाए जा रहे कदमों के बारे में अवगत कराया जाए क्योंकि 2003 की अधिसूचना के बाद से कोई कदम उठाया ही नहीं गया है। शीर्ष अदालत ने सुनवाई 24 सितंबर के लिए स्थगित करते हुए कहा कि सरकार के मौजूदा हलफनामे में इस मसले पर सिर्फ मोटी रूपरेखा पेश की गई है और चरणबद्ध योजना के बगैर नदी को साफ करना मुश्किल होगा। अदालत ने अपने आदेश में इस तथ्य का भी जिक्र किया कि महान्यायवादी पूरक हलफनामा दाखिल करने के लिए तैयार हैं। जिसमें सरकार गंगा नदी की सफाई के लिए चरणबद्ध तरीके से किए जाने वाले संभावित कदमों का विवरण देगी। 

अदालत ने कहा कि सरकार से अपेक्षा है कि वह परियोजना पर चरणबद्ध तरीके से अमल का लक्ष्य तय करे। अदालत ने स्पष्ट किया कि अगर औद्योगिक इकाइयां कानून का पालन नहीं करती हैं तो शीर्ष अदालत कानूनी प्रक्रिया के माध्यम से सरकार की मदद करने में संकोच नहीं करेगी। सरकार ने कहा है कि 29 बड़े शहरों, 23 छोटे शहरों और 48 नगरों से गुजरने वाली गंगा नदी को प्रदूषण मुक्त कराने के चुनाव पूर्व वादे को पूरा करने के लिए वह कृतसंकल्प है।

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