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सौ दिन का खाता PDF Print E-mail
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Wednesday, 03 September 2014 12:11

जनसत्ता 3 सितंबर, 2014: किसी सरकार का मूल्यांकन केवल सौ दिनों के कामकाज के आधार पर करना शायद उपयुक्त न हो, पर उसकी दिशा और कार्यशैली का अंदाजा जरूर लगाया जा सकता है। मोदी सरकार के अब तक के प्रदर्शन को देखें तो मिश्रित तस्वीर ही उभरती है। उसके सौ दिनों के खाते में कुछ उत्साह जगाने वाली बातें हैं तो कुछ विवाद और सवाल भी। जब प्रधानमंत्री के रूप में नरेंद्र मोदी ने शपथ ली, उसके पहले देश की अर्थव्यवस्था सुस्ती के दौर से गुजर रही थी। लेकिन मोदी सरकार के आने की आहट से ही शेयर बाजार कुलांचे भरने लगा और तब से उसकी तेजी कुल मिला कर बनी रही है। मौजूदा वित्तवर्ष की पहली तिमाही में आर्थिक वृद्धि दर 5.7 फीसद दर्ज की गई, जो कि पहले जताई गई सामान्य उम्मीदों से भी कुछ अधिक है। लेकिन जहां तक महंगाई पर काबू पाने के वादे का सवाल है, सरकार अब तक इसमें नाकाम रही है। थोड़ी कमी दर्ज होने के बावजूद खुदरा महंगाई नौ फीसद के ऊपर है। काले धन के मामले में भी कोई ठोस प्रगति नहीं दिखी है। प्रधानमंत्री ने योजना आयोग की विदाई तो कर दी, पर उसके विकल्प को लेकर न सिर्फ अनिश्चितता है बल्कि कुछ अंदेशे भी हैं।

विकास दर को पटरी पर लाने के अलावा प्रधानमंत्री जन धन योजना के तहत देश की समूची आबादी को बैंक खाते की सुविधा मुहैया कराने का अभियान भी प्रशंसनीय है। प्रधानमंत्री ने विदेश नीति के मोर्चे पर इतने कम समय में ही जैसी सक्रियता दिखाई है वह अपूर्व है। इसकी धूमधाम भरी शुरुआत उनके शपथ ग्रहण समारोह से ही हो गई थी, जब सार्क देशों और मॉरीशस के राष्ट्राध्यक्ष भी मौजूद थे। मोदी की भूटान और नेपाल यात्रा ऐतिहासिक रही। परमाणु करार न हो पाने के बावजूद जापान की भी उनकी यात्रा सफल कही जाएगी। लेकिन सब कुछ अच्छा ही नहीं रहा है। पाकिस्तान के साथ होने वाली बातचीत रद्द करने के फैसले से दोनों देशों के बीच संबंध सुधार की कोशिशों को धक्का लगा है। शुरू में प्रधानमंत्री ने चीन को अपनी विदेश नीति में सर्वोच्च प्राथमिकता देने की बात कही थी, पर अब उन्हें चीन के विस्तारवाद पर सवाल उठाने


की जरूरत महसूस हो रही है। प्रधानमंत्री की तत्परता और प्रशासनिक चुस्ती पर उनके जोर देने से सकारात्मक संदेश गया है, पर जिस तरह सारी कार्यकारी शक्तियां प्रधानमंत्री कार्यालय में केंद्रित होती जा रही हैं वह हमारी लोकतांत्रिक प्रणाली के लिए शुभ संकेत नहीं है। तमाम मंत्री खुद अपने निजी सचिव नहीं चुन सके। नगा मसले पर वार्ताकार के लिए गृहमंत्री ने जो सिफारिश की थी उसे प्रधानमंत्री कार्यालय ने खारिज कर दूसरा नाम तय कर दिया। 

सत्ता के इस घोर केंद्रीकरण पर सवाल उठने शुरू हो गए हैं। और भी चिंताजनक यह है कि मोदी सरकार आने के बाद सांप्रदायिक तत्त्वों का हौसला बढ़ा है। पिछले तीन महीनों में जितने दंगे हुए हैं, शायद ही कभी हुए हों। यों प्रधानमंत्री ने पंद्रह अगस्त के अपने संबोधन में कहा कि अगर भारत को तेजी से विकास करना है तो दस साल तक लोग सांप्रदायिक और जातीय झगड़े भूल जाएं। पर दूसरी तरफ उनके ही लोग सांप्रदायिक ध्रुवीकरण की कोशिशों में मशगूल हैं। भाजपा को पहली बार पूर्वोत्तर में कामयाबी मिली। लेकिन इरोम शर्मिला की फिर से गिरफ्तारी ने पूर्वोत्तर के लोगों के बीच अच्छा संदेश नहीं दिया है। मोदी सरकार ने राष्ट्रपति के अभिभाषण के जरिए संवैधानिक संस्थाओं का मान रखने का भरोसा दिलाया था। मगर चाहे राज्यपालों को मनमाने ढंग से हटाना हो या एक पूर्व मुख्य न्यायाधीश को राज्यपाल पद की पेशकश, यह उस आश्वासन से उलट है। इससे सरकार की कथनी और करनी का फर्क ही उजागर हुआ है। 


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