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पाकिस्तान का संकट PDF Print E-mail
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Wednesday, 03 September 2014 12:11

जनसत्ता 3 सितंबर, 2014: आज पाकिस्तान जिस राजनीतिक संकट में फंसा दिखता है उससे कई सवाल उठे हैं। पाकिस्तान की सियासत पर इस घटनाक्रम का क्या असर पड़ेगा। क्या नवाज शरीफ की सरकार बनी रहेगी। क्या इस मौके का फायदा उठा कर फौज एक बार फिर सत्ता संचालन अपने हाथ में ले लेगी। पाकिस्तान को अपने इतिहास के आधे से ज्यादा समय सेना के अधीन रहना पड़ा है। जब सेना का सीधा नियंत्रण नहीं होता तब भी उसका हस्तक्षेप या उसकी दखलंदाजी का अंदेशा बना रहता है। जनतंत्र की कमजोर बुनियाद पर खड़े पाकिस्तान के हालात इस वक्त बड़े नाजुक हैं। इमरान खान और ताहिर उल-कादरी अपने-अपने हजारों समर्थकों के साथ कई दिनों से राजधानी इस्लामाबाद में डेरा डाले हुए हैं और प्रधानमंत्री नवाज शरीफ यह नहीं समझ पा रहे हैं कि उनके विरोध-प्रदर्शनों से कैसे निपटें। इमरान खान का आरोप है कि पिछले साल हुए चुनावों में नवाज शरीफ की पार्टी पाकिस्तान मुसलिम लीग (नवाज) ने जमकर धांधली की थी, इसलिए उनका चुनाव अवैध है। लिहाजा, शरीफ इस्तीफा दें और फिर से चुनाव कराए जाएं। 

पाकिस्तानी अवामी तहरीक के नेता कादरी भी चाहते हैं कि शरीफ पद छोड़ें। दूसरी तरफ नवाज शरीफ की पार्टी को संसद में बहुमत तो हासिल है ही, इस समय मुख्य विपक्षी पार्टी भी उनके समर्थन में है। इस्तीफे की मांग के आगे न झुकने के अपने रुख पर नवाज शरीफ अडिग हैं, पर विरोध-प्रदर्शनों से निपटना उनके लिए काफी मुश्किल साबित हो रहा है। खबर है कि सेनाध्यक्ष उनसे मिल कर यह सलाह दे चुके हैं कि प्रदर्शनकारियों से निपटने में वे संयम बरतें और संकट का समाधान बातचीत से निकालने की कोशिश करें। पर जहां प्रधानमंत्री के इस्तीफे से कम पर इमरान खान राजी नहीं हैं, वहां बातचीत से कोई रास्ता खुले भी तो कैसे। कादरी तो इंकलाब लाने की भी बात करते हैं। अगर शरीफ पद छोड़ भी दें, तो पाकिस्तान के आम लोगों की जिंदगी कैसे फौरन संवर जाएगी यह कादरी ही जानते होंगे। इमरान खान ने क्रिकेट के नायक के तौर पर मिली लोकप्रियता के


बल पर अपनी सियासी पारी शुरू की थी। उनकी छवि साफ-सुथरी रही है, जिसने भ्रष्टाचार के आरोपों से दागदार पाकिस्तान की राजनीति में उन्हें अलग पहचान दिलाई है। लेकिन तालिबान के प्रति उनके नरम रुख ने बहुत-से लोगों को निराश किया है। फिर नीतिगत मसलों पर उनका नजरिया साफ नहीं रहा है।

इमरान खान सामाजिक असंतोष को भुनाना और लोकलुभावन भाषा बोलना भले जानते हों, पर कई बार वे परिपक्व राजनेता की कसौटी पर खरे नहीं उतरते। प्रधानमंत्री के आवास की घेराबंदी का उनका आह्वान खुद उनकी पार्टी के अध्यक्ष को रास नहीं आया। रविवार को इमरान के समर्थक प्रधानमंत्री के आवास में घुस गए। फिर पुलिस की कार्रवाई में तीन लोग मारे गए और दो सौ से ज्यादा घायल हो गए। अगले रोज प्रदर्शनकारियों ने सरकारी टीवी चैनल के दफ्तर पर धावा बोल दिया, जिसके कारण प्रसारण कुछ देर के लिए बंद रहा। क्या इमरान यही चाहते हैं कि पुलिस अधिकारी अधिक से अधिक सख्त कार्रवाई के लिए मजबूर हों और फिर ऐसी स्थितियां बनें कि नवाज शरीफ और लाचार हो जाएं। लेकिन वैसे हालात में सेना के दखल की गुंजाइश बढ़ जाएगी। यह विडंबना ही है कि जो लोग चुनाव में धांधली का मसला उठा रहे हैं, वे अपने देश में लोकतंत्र के भविष्य को लेकर संवेदनशील नजर नहीं आते।


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